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शाकंभरी माता की आरती हिंदी– अर्थ, लाभ और पाठ विधि | Shakambari mata ki aarti

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हमें फॉलो करें Shakambari mata ki aarti in hindi mein, शाकंभरी माता की आरती हिंदी

WD Feature Desk

, शुक्रवार, 9 जनवरी 2026 (17:57 IST)
Shakambari mata ki aarti in hindi mein
Shakambari mata aarti: माँ शाकंभरी की आरती मुख्य रूप से उनके करुणावतार पर केंद्रित है। आरती के शब्दों में उस समय का वर्णन मिलता है जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई थी और अकाल पड़ गया था। तब देवी ने भक्तों की पुकार सुनकर अवतार लिया और अपने शरीर से फल, फूल और शाक (सब्जियां) उत्पन्न कीं ताकि समस्त जीवों की भूख मिट सके। सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) स्थित प्रसिद्ध सिद्धपीठ और राजस्थान के सांभर में स्थित मंदिर में इस आरती का बहुत भव्य आयोजन होता है।
 

1. शाकंभरी आरती का अर्थ

माँ शाकंभरी की आरती हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो का अर्थ उनके परोपकारी स्वरूप और सृष्टि को जीवनदान देने की गाथा है। उनकी आरती के माध्यम से भक्त देवी के उस उपकार को याद करते हैं जब उन्होंने धरती को अकाल से मुक्त किया था।
 

2. शाकंभरी आरती पाठ विधि

आरती समय: प्रातः काल: सूर्योदय के समय देवी का पूजन और आरती मानसिक शांति देती है। संध्या काल: सूर्यास्त के समय की गई आरती घर में धन-धान्य की वृद्धि करती है।
विशेष अवसर: पौष मास की पूर्णिमा (शाकंभरी पूर्णिमा) और चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी/नवमी को पाठ करना अत्यंत शुभ है। बुधवार और शुक्रवार माता का विशेष दिन है।
आवश्यक सामग्री: ताजी हरी सब्जियाँ (जैसे पालक, लौकी, तोरई) और मौसमी फल, पीतल का दीपक, घी, लाल या नीले रंग के फूल माता को प्रिय हैं और चमेली या गुलाब का इत्र।
शुद्धि: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। इस दिन हरे रंग के वस्त्र पहनना माता की कृपा पाने के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।
आसन: कुश या ऊन के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
शाक अर्पण: आरती शुरू करने से पहले माता की प्रतिमा के सम्मुख कुछ कच्ची हरी सब्जियां और फल रखें। यह उन्हें "शाकंभरी" रूप में सम्मान देने का तरीका है।
दीप प्रज्ज्वलन: दीपक जलाएं और अगरबत्ती या धूप से वातावरण को सुगंधित करें।
ध्यान: सबसे पहले माता के शताक्षी रूप (सौ नेत्रों वाली देवी) का ध्यान करें।
आरती गायन: खड़े होकर पूरी श्रद्धा के साथ आरती गाएं। हाथों से तालियां बजाएं या घंटी का प्रयोग करें। आरती के दौरान लय का विशेष ध्यान रखें।
प्रदक्षिणा: आरती के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार गोल घूमें (प्रदक्षिणा करें)।
शाक का वितरण: आरती के बाद जो सब्जियां और फल आपने भोग में रखे थे, उन्हें घर में पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें या किसी जरूरतमंद को दान दें।
क्षमा प्रार्थना: अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें- "हे माँ! हम अज्ञानी हैं, पूजा की विधि नहीं जानते, यदि कोई भूल हुई हो तो हमें क्षमा करें और हमारे घर को अन्न-धन से भरपूर रखें।"
विशेष सुझाव: शाकंभरी देवी की पूजा में स्वच्छता का बहुत महत्व है। जहाँ माता की पूजा होती है, वहां जूठन या गंदगी नहीं होनी चाहिए। भक्तों का मानना है कि जो व्यक्ति शाकंभरी नवरात्रि (9 दिन) तक प्रतिदिन आरती करता है, उसके घर में कभी अकाल या दरिद्रता नहीं आती।
 

3. शाकुम्भरी आरती Lyrics

हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
ऐसी अद्भुत रूप हृदय धर लीजो
शताक्षी दयालु की आरती कीजो
तुम परिपूर्ण आदि भवानी मां, सब घट तुम आप बखानी मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
 
तुम्हीं हो शाकुम्भर, तुम ही हो सताक्षी मां
शिवमूर्ति माया प्रकाशी मां,
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
 
नित जो नर-नारी अम्बे आरती गावे मां
इच्छा पूर्ण कीजो, शाकुम्भर दर्शन पावे मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
 
जो नर आरती पढ़े पढ़ावे मां, जो नर आरती सुनावे मां
बस बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे
शाकुम्भरी अंबाजी की आरती कीजो।
 

4. शाकंभरी आरती के लाभ

भंडार: माँ शाकंभरी 'अन्नपूर्णा' का ही रूप हैं। जिस घर में प्रतिदिन उनकी आरती होती है, वहाँ भंडार हमेशा भरे रहते हैं। अकाल, भुखमरी या आर्थिक तंगी उस घर के द्वार तक नहीं आती।
दरिद्रता:यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से आर्थिक संकट या कर्ज से जूझ रहा है, तो माँ की आरती और पूजन से दरिद्रता दूर होती है।
शताक्षी: आरती में देवी के 'शताक्षी' (सौ नेत्रों वाली) रूप का वर्णन आता है, जो भक्तों पर अपनी दया दृष्टि रखती हैं। 
अकाल मृत्यु: उनकी कृपा से असाध्य रोगों का नाश होता है और भक्त की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
तनाव: माँ शाकंभरी की आरती करने से मन का तनाव कम होता है, क्रोध शांत होता है और घर के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
गृह-क्लेश: देवी की आरती और सेवा से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ता है और आपसी मनमुटाव या गृह-क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
चंद्रमा और शुक्र: माँ की आरती से विशेष रूप से चंद्रमा और शुक्र ग्रह से जुड़े दोष शांत होते हैं, क्योंकि ये दोनों ग्रह भोजन, ऐश्वर्य और शांति से संबंधित हैं।
मनोकामनाएं: यदि आप शुक्रवार के दिन माँ शाकंभरी की आरती के बाद किसी जरूरतमंद को हरी सब्जी या फल दान करते हैं, तो आपकी मनोकामनाएं बहुत शीघ्र पूर्ण होती हैं।
 

5. शाकंभरी माता के बारे में पूछे जाने वाले प्रश्न-उत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: माँ शाकंभरी कौन हैं?
उत्तर: माँ शाकंभरी, आदिशक्ति मां दुर्गा के शक्तिशाली अवतारों में से एक हैं जिनके सौ नेत्र हैं। उन्हें 'वनस्पतियों की देवी' और 'अन्नपूर्णा' का स्वरूप माना जाता है। उन्होंने पृथ्वी पर अकाल को समाप्त करने और जीवों को भोजन प्रदान करने के लिए अवतार लिया था।
 
प्रश्न 2: माता का नाम 'शाकंभरी' कैसे पड़ा?
उत्तर: जब पृथ्वी पर 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ा, तब भक्तों की करुण पुकार सुनकर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने अपने शरीर से अनंत शाक (साग-भाजी), फल और मूल (जड़ें) उत्पन्न कीं ताकि समस्त संसार की भूख मिट सके। 'शाक' को धारण करने के कारण ही उनका नाम शाकंभरी पड़ा।
 
प्रश्न 3: माता को 'शताक्षी' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: अकाल के समय जब माता प्रकट हुईं, तो संसार की दयनीय स्थिति देखकर उनकी आँखों से लगातार आँसू बहने लगे। माना जाता है कि उस समय उनके शरीर पर सौ नेत्र (100 आँखें) प्रकट हुए थे। उन्हीं नेत्रों से निकले आंसुओं से पृथ्वी की नदियां फिर से भर गईं और सूखा समाप्त हो गया। इसीलिए उन्हें शताक्षी (सौ आँखों वाली) कहा जाता है।
 
प्रश्न 4: माँ शाकंभरी ने किस असुर का वध किया था?
उत्तर: माता ने 'दुर्गम' नामक असुर का वध किया था, जिसने चारों वेदों को चुरा लिया था और देवताओं को शक्तिहीन कर दिया था। दुर्गम का वध करने के कारण माता को 'दुर्गा' भी कहा जाता है।
 
प्रश्न 5: शाकंभरी देवी का मुख्य मंदिर कहाँ स्थित है?
उत्तर: माँ शाकंभरी का सबसे प्रसिद्ध सिद्धपीठ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित है। इसके अलावा राजस्थान के सांभर और कर्नाटक के बादामी में भी इनके प्राचीन और भव्य मंदिर हैं।
 
प्रश्न 6: 'शाकंभरी नवरात्रि' कब मनाई जाती है?
उत्तर: शाकंभरी नवरात्रि पौष मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर पौष पूर्णिमा तक चलती है। इसे 'शाकंभरी उत्सव' के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है।
 
प्रश्न 7: माता को किसका भोग सबसे प्रिय है?
उत्तर: माता को ताजी हरी सब्जियाँ, फल और शाक का भोग सबसे अधिक प्रिय है। कई मंदिरों में इस दिन माता का भव्य श्रृंगार भी सब्जियों और फलों से ही किया जाता है।
 
प्रश्न 8: शाकंभरी पूर्णिमा का क्या महत्व है?
उत्तर: पौष पूर्णिमा को माता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दान-पुण्य करने और माता की पूजा करने से घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।

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