बहुत दिनों बाद कोई ऐसी फिल्म देखी जिसमें हर किरदार सीधे दिलो-दिमाग पर छा गया। असलम चौधरी से लेकर अरशद पप्पू के पठान गुंडों तक, हर एक ने अपने रोल को इतनी धार दी कि भूलना मुश्किल है। जिस दौर में लोग 30 सेकंड की रील भी स्किप कर देते हैं, वहाँ आदित्य धर ने 3 घंटे 34 मिनट की फिल्म बनाकर साबित कर दिया कि अगर कंटेंट में दम हो तो लंबाई कोई मायने नहीं रखती।
और सबसे ऊपर तो रहमान डकैत ने महफिल लूट ली। औसत कद-काठी वाला ये शख्स छह-छह फुट के तगड़े चौधरी असलम और हमज़ा अली से टक्कर लेता है और उनकी नाक में दम कर देता है। अक्षय खन्ना ने बिना किसी भारी मेकअप, खास प्रॉप्स या ओवर-ड्रामेटिक डायलॉग्स के इतनी खतरनाक तरीके से रहमान डकैत को जिया है कि उनसे नफरत होना लाजमी हो जाता है।
उसकी चाल में बड़ा डॉन वाला रुआब, एक इशारे में सबको सहमा देना और जब वो शब्द चबा-चबाकर कहता है – “रहमान डकैत की दी हुई मौत बड़ी कसाईनुमा होती है”, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अरशद पप्पू का खौफनाक अंत अपने आप आँखों के सामने घूमने लगता है। शुरुआत में डायलॉग भी कम दिए गए क्योंकि इतना बड़ा आदमी सब कुछ खुद थोड़े बोलता है। उसका आदमी उसकी बात भी बोलता है।
बलोचिस्तान पहुँचकर ब्लैक सूट में अरबी गाने पर किया गया वो डांस और वो नेक्स्ट-लेवल जमाल कूंडा वाला लुक, बॉबी देओल (एनिमल) के बाद दूसरी बार किसी विलेन ने इतना दबदबा बनाया है। सचमुच, अक्षय खन्ना ने इनरनल एक्टिंग की पराकाष्ठा कर दी। गुस्सा, आँसू, खौफ – सब इतना रियल कि लगा रहमान डकैत सच में जीवित हो गया है।
रणवीर सिंह यानी हमज़ा अली अब्बासी/सरदार जसकीरत सिंह रँगी किसी हीरो की एंट्री होती है तो लार्जर देन लाइफ होती है। लेकिन यहाँ ल्यारी में पहली रात ही अरशद पप्पू का गैंग हमज़ा को बुरी तरह पीटता है, उसकी इज्जत तक लूटने की कोशिश करता है। पहले तो लगा, ये क्या? अपने हीरो को ऐसा मार रहे हैं? फिर समझ आया, यही तो मास्टरस्ट्रोक है। अगर हमज़ा उस रात सबको मार-मारकर मिशन उजागर कर देता तो कहानी शुरू होने से पहले खत्म हो जाती। देश का मिशन उसकी इज्जत से बड़ा था।
और फिर वो सीन जब पुलिस स्टेशन में रणवीर पीठ करके बैठा है और उज़ैर पुलिस वालों को उल्टा लटकाकर पैट्रोल से नहला रहा है, वहाँ भी असली बॉस कौन है, ये डायरेक्शन एक सेकंड में बता देता है। चौधरी असलम को मद्धम लेकिन कठोर आवाज में दी गई धमकी, बिना चिल्लाए, बिना आँख में आँख डाले, रीढ़ में सिहरन पैदा कर देती है। रणवीर ने कमाल कर दिया।
बाकी कलाकार संजय दत्त ठीक-ठाक हैं (उनसे गाली भी ठीक से नहीं बुलवाई गई), लेकिन राकेश बेदी ने काइयां पॉलिटिशियन के रोल में आग लगा दी, अब तक ये टैलेंट कहाँ छिपा था भाई? माधवन हमेशा की तरह दमदार। अर्जुन रामपाल का लुक और प्रेजेंस शानदार। हीरोइन या किसी महिला का खास रोल नहीं है, पर जरूरत भी नहीं पड़ी। आदित्य धर ने उरी की याद ताजा कर दी। वही मेजर विहान वाला इमोशनल कनेक्शन, वही देशभक्ति का जोश।
फाइनल वर्डिक्ट, धुरंधर वो फिल्म है जो विलेन के दम पर भी पूरी थिएटर को हिला सकती है। अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत को अमर कर दिया। अगले पार्ट के लिए बारूद तैयार है – 19 मार्च को सिनेमाघरों में धमाल मचने वाला है! रेटिंग: 4.5/5 (बाकी 0.5 इसलिए काटा क्योंकि संजय दत्त से और उम्मीद थी) देखिए, पछताएँगे नहीं।