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मनमोहन देसाई: वह फिल्मकार जिसने बॉलीवुड को 'इंटरटेनर नंबर वन' का मतलब सिखाया

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Manmohan Desai Death Anniversary
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने केवल फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि दर्शकों की सोच और सिनेमा देखने का तरीका ही बदल दिया। उन्हीं विरले नामों में एक हैं मनमोहन देसाई। 1 मार्च 2026 को उनकी पुण्यतिथि पर आज भी करोड़ों सिनेप्रेमी उस निर्देशक को याद कर रहे हैं, जिसने सिनेमा को दुखों से राहत और जिंदगी से प्यार करने का जरिया बनाया।
 
मनमोहन देसाई के लिए सिनेमा सिर्फ कहानी कहना नहीं था, बल्कि त्योहार, सपना और उम्मीद था। उनकी फिल्में देखने लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अपने गम भूलने के लिए सिनेमाघरों में जाते थे। 26 फरवरी 1937 को जन्मे मनमोहन देसाई का बचपन कैमरे, लाइट और रीलों के बीच बीता। 
 
उनके पिता किक्कू देसाई हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का जाना-माना नाम थे और 1930 में एक फिल्म का निर्देशन भी कर चुके थे। वह पारामाउंट स्टूडियो के मालिक थे, इसलिए मनमोहन देसाई के लिए सिनेमा कोई दूर की दुनिया नहीं थी—वह उनके घर का हिस्सा था।
 
यही वजह रही कि बहुत कम उम्र में ही मनमोहन देसाई ने तय कर लिया था कि वह जिंदगी फिल्मों को ही समर्पित करेंगे। साल 1960 में, महज 24 वर्ष की उम्र में, मनमोहन देसाई को अपने भाई सुभाष देसाई द्वारा निर्मित फिल्म छलिया के निर्देशन का मौका मिला। फिल्म में राज कपूर और नूतन जैसे दिग्गज कलाकार थे, लेकिन इसके बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
 
हालांकि, इस फिल्म के गाने—कल्याणजी-आनंदजी के संगीत में—‘छलिया मेरा नाम’ और ‘डम-डम डिगा डिगा’ आज भी सदाबहार माने जाते हैं। यही वह दौर था, जब असफलता ने मनमोहन देसाई को कमजोर नहीं, बल्कि और ज्यादा जिद्दी बना दिया।
1964 में उन्हें फिल्म राजकुमार के निर्देशन का मौका मिला। इस फिल्म में उनके करीबी मित्र शम्मी कपूर लीड रोल में थे। फिल्म की सफलता ने साबित कर दिया कि मनमोहन देसाई सिर्फ भव्य सोच ही नहीं रखते, बल्कि दर्शकों की नब्ज भी पहचानते हैं। यहीं से उनका नाम इंडस्ट्री में एंटरटेनमेंट स्पेशलिस्ट डायरेक्टर के तौर पर लिया जाने लगा।
 
1970 में रिलीज़ हुई सच्चा झूठा मनमोहन देसाई के करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। इस फिल्म में उस दौर के सुपरस्टार राजेश खन्ना दोहरी भूमिका में नजर आए। यहीं से मनमोहन देसाई का मशहूर ‘खोया-पाया फार्मूला’ पूरी तरह स्थापित हुआ—बिछड़े हुए परिवार, भावनात्मक मिलन और दर्शकों को रुला देने वाला क्लाइमैक्स। फिल्म सुपरहिट रही और मनमोहन देसाई दर्शकों के फेवरेट डायरेक्टर बन गए।
 
साल 1977 को हिंदी सिनेमा कभी भूल नहीं सकता। इसी एक साल में मनमोहन देसाई की चार बड़ी हिट फिल्में परवरिश, धरमवीर, चाचा भतीजा और अमर अकबर एंथनी रिलीज हुई। खासकर अमर अकबर एंथनी ने उन्हें अमर बना दिया। फिल्म का गीत ‘हमको तुमसे हो गया है प्यार’ आज भी संगीत की अमूल्य धरोहर है, क्योंकि इसमें पहली और आखिरी बार लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार एक साथ गाए थे।
 
इसके बाद मनमोहन देसाई ने तय कर लिया कि वह आगे की फिल्मों में अमिताभ बच्चन को जरूर लेंगे। फिर आई— नसीब, कुली, मर्द। ‘नसीब’ के गाने ‘जॉन जॉनी जनार्दन’ में बॉलीवुड के सितारों की पूरी फौज नजर आई—जिससे प्रेरित होकर बाद में ओम शांति ओम का आइकॉनिक सॉन्ग फिल्माया गया।
 
1988 में आई गंगा जमुना सरस्वती और फिर तूफान बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। इन नाकामियों ने मनमोहन देसाई को भीतर से तोड़ दिया और उन्होंने निर्देशन से दूरी बना ली। कम लोग जानते हैं कि उन्होंने राजकुमार, किस्मत जैसी फिल्मों की कहानी लिखी और ब्लफ मास्टर का स्क्रीनप्ले भी उन्हीं का था।
 
1 मार्च 1994 को बालकनी से गिरने के कारण मनमोहन देसाई का निधन हो गया। लेकिन उनका सिनेमा आज भी जिंदा है—हर उस दर्शक के दिल में, जिसने उनकी फिल्मों में अपनी कहानी देखी।

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