नीतू कपूर और कपिल शर्मा की फिल्म दादी की शादी एक ऐसे विषय को उठाती है, जो भारतीय परिवारों में अक्सर दबा दिया जाता है, बुजुर्ग माता-पिता का अकेलापन। कहानी दिल को छूने की कोशिश करती है और शुरुआत में ऐसा लगता है कि दर्शकों को एक भावुक और यादगार पारिवारिक फिल्म देखने को मिलेगी। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, इसकी कमजोर पटकथा और खिंचा हुआ ड्रामा इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। शानदार विषय होने के बावजूद फिल्म वह भावनात्मक असर पैदा नहीं कर पाती, जिसकी इससे उम्मीद थी।
फिल्म की कहानी शिमला में अकेली रहने वाली विमला आहूजा यानी नीतू कपूर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक अपने परिवार के सामने दूसरी शादी करने का फैसला घोषित कर देती हैं। सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब यह खबर उनकी पोती कनिका की रोका सेरेमनी वाले दिन सामने आती है। परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर उनके दोनों बेटे तुरंत शिमला पहुंच जाते हैं और मां को शादी का फैसला वापस लेने के लिए मनाने लगते हैं।
फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यही है कि यह सवाल उठाती है कि क्या बच्चों के अपने परिवार बस जाने के बाद माता-पिता सिर्फ अकेलेपन के लिए छोड़ दिए जाते हैं? विमला का किरदार इसी दर्द को सामने लाता है।
उनके बेटे जीवन और नाग अपनी-अपनी फैमिली के साथ शिमला पहुंचते हैं। वहीं कनिका के होने वाले पति टोनी कालरा के किरदार में कपिल शर्मा कहानी में हल्कापन और कॉमिक राहत लाते हैं। बाद में विमला की बेटी सुनैना भी अपने बच्चों के साथ वहां पहुंचती है और परिवार का तनाव और बढ़ जाता है।
फिल्म लगातार यह जानने की उत्सुकता बनाए रखती है कि आखिर विमला किससे शादी करना चाहती हैं और इसके पीछे की असली वजह क्या है।
निर्देशक आशीष आर. मोहन की कहानी का मकसद साफ है। फिल्म यह दिखाना चाहती है कि आधुनिक जिंदगी में बच्चे अपने माता-पिता से भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। यह मुद्दा काफी संवेदनशील और जरूरी भी है।
लेकिन समस्या फिल्म की पटकथा में है। कहानी कई जगह जरूरत से ज्यादा लंबी और घुमावदार महसूस होती है। इमोशनल दृश्यों में वह गहराई नहीं आ पाती, जो दर्शकों को अंदर तक छू सके। कई जगह फिल्म बनावटी लगती है और भावनाएं जबरदस्ती डाली हुई महसूस होती हैं। हालांकि कॉमेडी वाले कई दृश्य मुस्कुराने पर मजबूर जरूर करते हैं। खासकर कपिल शर्मा की मौजूदगी फिल्म को हल्का और मनोरंजक बनाए रखती है।
नीतू कपूर ने विमला आहूजा के किरदार को सादगी से निभाया है। उनका अभिनय ठीक-ठाक है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा चमकने का मौका नहीं देती।
कपिल शर्मा फिल्म के सबसे जीवंत कलाकारों में नजर आते हैं। उनका किरदार टोनी कालरा दर्शकों को राहत देता है और कई दृश्यों में वही फिल्म को संभालते दिखाई देते हैं।
दीपक दत्ता ने जीवन आहूजा के रोल में बेहद स्वाभाविक अभिनय किया है और शायद वही फिल्म के सबसे मजबूत कलाकार साबित होते हैं। जितेंद्र हुड्डा ने भी नाग आहूजा के किरदार में अच्छा साथ दिया है। वहीं ऋद्धिमा कपूर साहनी ने सुनैना के रूप में ठीक-ठाक डेब्यू किया है। सादिया खतीब, तेजस्विनी कोल्हापुरे और अदिति मित्तल भी अपने-अपने किरदारों में प्रभाव छोड़ने की कोशिश करती हैं।
फिल्म का संगीत खास प्रभाव नहीं छोड़ता। गुलराज सिंह, पायल देव, आदित्य देव और अन्य संगीतकारों के गाने याद नहीं रह पाते। बैकग्राउंड स्कोर भी भावनात्मक दृश्यों को मजबूत बनाने में असफल रहता है।
निर्देशन की बात करें तो आशीष आर. मोहन कहानी के भावनात्मक पक्ष को पूरी ताकत से पर्दे पर उतारने में सफल नहीं हो पाए। फिल्म में कई ऐसे मौके आते हैं जहां दर्शक रो सकते थे, लेकिन प्रस्तुति की कमजोरी के कारण वे दृश्य असरहीन हो जाते हैं।
दादी की शादी का विषय मजबूत है और यह भारतीय परिवारों की एक सच्चाई को सामने लाती है। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और फीके इमोशनल मोमेंट्स इसे एक यादगार फैमिली ड्रामा बनने से रोक देते हैं।
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DAADI KI SHAADI (2026)
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निर्देशक: आर मोहन
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गीतकार: मनोज यादव, ज्योतिका टांगरी, पायल देव, आदित्य देव, यंगवीर, मोहसिन शेख
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संगीतकार: गुलराज सिंह, पायल देव, आदित्य देव, गोल्डबॉय, जॉय बरुआ
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कलाकार: नीतू कपूर, कपिल शर्मा, आर सरत कुमार, रिद्धिमा कपूर, दीपक दत्ता, जीतेंदर हुड्डा
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