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तेरे इश्क में रिव्यू: कृति-धनुष की इंटेंस लव स्टोरी की चमक, कमजोर लेखन से पड़ी फीकी

समय ताम्रकर
शुक्रवार, 28 नवंबर 2025 (15:02 IST)
‘तनु वेड्स मनु’ सीरिज की जोरदार सफलता के बाद निर्देशक आनंद एल राय ने शाहरुख खान स्टारर ‘जीरो’ और अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंधन’ जैसी कुछ कमजोर फिल्में दीं। इन असफलताओं के बाद अब वे कमर्शियल सिनेमा की जमीन पर वापस लौटने की कोशिश करते हैं और इसी कोशिश का नतीजा है ‘तेरे इश्क में’। इस बार उन्होंने उन सभी मसालों और ट्रेंड्स को ध्यान में रखा है जो आजकल दर्शकों को लुभाते हैं, जैसे अल्फा मेल हीरो, इंटेंस रोमांस, स्टूडेंट लाइफ और हाई ड्रामा। कहानी हिमांशु शर्मा और नीरज यादव ने मिलकर लिखी है, जिसमें आज के समय का लोकप्रिय कमर्शियल फ़ॉर्मूला साफ दिखता है।
 
फिल्म की कथा दिल्ली के एक कॉलेज से शुरू होती है जहाँ पढ़ रहा है शंकर (धनुष) एक ऐसा लड़का जिसे अपने गुस्से पर जरा भी कंट्रोल नहीं। आए दिन वह किसी न किसी से उलझता रहता है। इसी कॉलेज में मुक्ति (कृति सेनन) एक रिसर्च स्कॉलर हैं, जो हिंसक व्यक्ति को बदलने पर अपना शोध कर रही हैं।
 
मुक्ति को शंकर में ही अपना रिसर्च सब्जेक्ट नजर आता है। वह उसे अहिंसक और संतुलित इंसान बनाने का लक्ष्य रखती है। बदले में शंकर उससे एक ही शर्त रखता है, मुक्ति उसे प्यार करे। मुक्ति साफ कह देती है कि वह केवल प्यार का ‘नाटक’ कर सकती है। दिलचस्प बात यह है कि इसी नाटक के भरोसे शंकर खुद को बदलना शुरू कर देता है।
 
कहानी यहां तक बेहद सहज रूप से बहती है। शंकर का बिंदास मिज़ाज, मुक्ति की प्रैक्टिकल सोच और दोनों के बीच बनने वाले सीन फिल्म को एक मजबूत पकड़ देते हैं। इसके बाद कहानी अचानक पटरी से उतरने लगती है। शंकर और मुक्ति के बीच की गलतफहमी को लेखक अच्छी तरह संभाल नहीं पाते और चरित्रों के फैसले अस्वाभाविक लगने लगते हैं।
 
सबसे बड़ा सवाल दर्शक के मन में यही उठता है कि जब मुक्ति के मन में शंकर के लिए प्यार है ही नहीं, तो वह उसे अपने पिता से मिलने के लिए क्यों बुलाती है?
 
फिर मुक्ति के पिता की ओर से मिलने वाली अनोखी शादी की शर्त पर भी मुक्ति का प्रतिक्रिया न देना बेहद अजीब लगता है। यदि शंकर वह शर्त पूरी कर लेता, तो उसकी शादी मुक्ति से संभव होती, यह बात खुद शंकर फिल्म में बोलता भी है। लेकिन लेखक इन स्थितियों को तर्कसंगत बनाने में नाकाम रहते हैं।
 
फिल्म की गड़बड़ी सबसे अधिक मुक्ति के चरित्र-लेखन में दिखाई देती है। शुरुआत में उसे समझदार, लक्ष्यों पर केंद्रित और बेहद प्रैक्टिकल दिखाया गया है। लेकिन आगे चलकर वही लड़की असामान्य रूप से कन्फ्यूज्ड दिखने लगती है।
 
वह शंकर को चाहती नहीं, फिर भी बार-बार उससे मिलने की कोशिश क्यों करती है? फिर अचानक तीन साल तक उससे कोई संपर्क नहीं रखती। और जब शंकर दोबारा सामने आता है तो वह उसकी दीवानी-सी क्यों हो जाती है?
उसकी भावनाओं का सफर और शंकर के प्रति उसका बदलता नजरिया बेहद उलझा हुआ लगता है, जिससे दर्शक उसके साथ कनेक्ट नहीं कर पाते।
 
सेकंड हाफ में कहानी टूटने लगती है। कुछ सीन इतने अति-नाटकीय हैं कि फिल्म के टोन से मेल ही नहीं खाते, जैसे शंकर के पिता का कई लोगों के पैर पकड़कर माफी मांगना।
 
क्लाइमैक्स में युद्ध का ट्रैक और उसके प्रभाव की चर्चा केवल कहानी खत्म करने के लिए जोड़ दी गई लगती है। इन घटनाओं का मुख्य प्रेमकथा से बहुत ज्यादा भावनात्मक संबंध नहीं बन पाता। कई जगह कहानी ऐसे मोड़ लेती है जिन पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।
 
फिल्म कई दृश्यों में अपील करती है तो इसका श्रेय जाता है आनंद एल राय को। उन्होंने विजुअल्स खूबसूरती से फिल्माए हैं, संगीत और बैकग्राउंड स्कोर का बेहतरीन उपयोग किया है और कलाकारों से उम्दा परफॉर्मेंस निकलवाए हैं।
 
धनुष के इंटेंस किरदार को गढ़ने में उनकी मेहनत झलकती है, लेकिन कृति के किरदार को उन्होंने उतनी गहराई नहीं दीऔर इसी असंतुलन का असर फिल्म की पकड़ पर पड़ता है।
 
धनुष फिल्म की जान हैं। आंखों और बॉडी लैंग्वेज के ज़रिये उन्होंने प्यार, गुस्सा, बेचैनी और दर्द को शानदार ढंग से व्यक्त किया है। कृति सेनन का अभिनय भी उम्दा है, लेकिन उनके किरदार की असंगत लिखावट उनकी मेहनत पर पानी फेर देती है।
 
प्रकाश राज हमेशा की तरह स्वाभाविक लगे। मोहम्मद जीशान अय्यूब का किरदार कहानी को नए रंग देने की कोशिश करता है, लेकिन उसकी उपयोगिता सीमित रह जाती है। फिर भी जीशान अपनी छोटी-सी भूमिका में भी शानदार काम करते हैं।
 
ए.आर. रहमान का संगीत और इरशाद कामिल के बोल फिल्म के सबसे बड़े प्लस पॉइंट हैं। गाने किरदारों की मनोदशा को व्यक्त करते हैं और कहानी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। सिनेमाटोग्राफी ध्यान खींचती है। तकनीकी पक्ष मजबूत है। फिल्म की लंबाई थोड़ी ज़्यादा महसूस होती है।
 
‘तेरे इश्क में’ एक ऐसी फिल्म है जो कई स्तरों पर प्रभाव छोड़ सकती थी। इसमें इंटेंस लव स्टोरी का आकर्षण है, दमदार परफॉर्मेंस हैं और संगीत शानदार है। लेकिन कमजोर लेखन, मुक्ति के उलझे हुए किरदार और सेकंड हाफ की बिखरी हुई कहानी फिल्म को औसत बना देती है। आनंद एल राय निर्देशन में कई खूबसूरत पल रचते हैं, पर कहानी की कमजोर नींव फिल्म को वह ऊंचाई नहीं लेने देती जिसकी उम्मीद थी।

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