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सावधान! आपके नल से मौत तो नहीं आ रही? देश के 34 राज्यों में 70% जल स्रोत जहरीले, डराने वाले हैं ये आंकड़े

जल जीवन मिशन की रिपोर्ट : हर 4 में से 1 पानी का सैंपल मानकों पर खरा नहीं उतरता है

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Indore water
water sources are polluted in India: भारत में एक पुरानी कहावत रही है... जल पियो छानकर और गुरू बनाओ जानकर। लेकिन भारत में पानी छानकर पीना ही काफी नहीं है, यहां की भूमि में इतना जहर मिल चुका है कि जल भी प्रदूषित हो चुका है। हाल ही में इंदौर में दूषित पानी से हुई 30 से ज्‍यादा मौतें इस बात की गवाही दे रही है। इस घटना के बाद देश के कई राज्‍यों और शहरों में खराब या दूषित पानी को लेकर खबरें आम हो गई हैं। लब्‍बोलुआब यह है कि दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र वाले देश भारत में आम नागरिकों को स्‍वच्‍छ पानी पीने का बुनियादी अधिकार भी नहीं मिल रहा है।

जानकर हैरानी होगी कि देशभर में हर साल खराब या दूषित पानी की वजह से 2 लाख मौतें हो जाती हैं। देश के 34 राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पानी की गुणवत्‍ता की जो हकीकत सामने आ रही है, वो भयावह है। भारत में लोग साफ दिखने या उसमें से दुर्गंध नहीं आने पर पानी को साफ मानकर पी लेते हैं। जहां हजारों परिवार पानी को कपड़े से छानकर पी लेते हैं, वहीं हजारों परिवार पानी को उबालते ही नहीं। जल जीवन मिशन की रिपोर्ट बताती है कि हर पानी के 4 सैंपल में से 1 सैंपल मानकों पर खरा ही नहीं उतरता है। इसके साथ ही हाल ही में जो भू-जल गुणवत्ता रिपोर्ट, नीति आयोग की रिपोर्ट और जल जीवन मिशन रिपोर्ट सामने आई हैं, वो भारत में पानी की भयावह हकीकत को बयान कर रही है।

देश का सबसे स्‍वच्‍छ शहर इंदौर दूषित पानी सप्‍लाय करने का सबसे बड़ा उदारहण है। यहां जहरीले पानी से 30 से ज्‍यादा मौतें हो चुकी हैं। कई बीमार हैं। हमने इंदौर में जहरीली पानी के पीछे की वजहों को टटोलते हुए देशभर में पानी की स्‍थिति को लेकर यह रिसर्च की है। इसमें भू-जल गुणवत्ता रिपोर्ट, नीति आयोग की रिपोर्ट और जल जीवन मिशन रिपोर्ट के आंकड़ों को शामिल किया है। जिससे साफ पता चल रहा है कि देश के ज्‍यादातर राज्‍यों में पानी की गुणवत्‍ता की क्‍या स्‍थिति है।
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  • देश के लगभग 70% जल स्रोत प्रदूषित हैं
  • भारत 'ग्लोबल वॉटर क्वालिटी इंडेक्स' में काफी निचले (120/122) पायदान
  • देश में दूषित पानी से हर साल 2 लाख मौतें होती हैं
  • नीति आयोग, भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट (CGWB) और जल जीवन मिशन रिपोर्ट में उजागर हुई हकीकत
  • पानी की किल्लत नहीं, पानी का जहर है असली दुश्मन: देश के 70% जल स्रोत प्रदूषित
  • इंदौर ही नहीं, देश के 34 राज्‍यों में पानी की भयावह हकीकत
वार्षिक भू-जल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 (CGWB) के मुताबिक
प्रदूषण का स्तर : भारत के भूजल के 28.3% नमूने सुरक्षित मानकों (BIS) से बाहर पाए गए हैं।

यूरेनियम का खतरा : इतना ही नहीं, पानी में यूरेनियम की मात्रा ज्‍यादा पाई गई। पंजाब (62.5% नमूने), हरियाणा और दिल्ली में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित सीमा (30 ppb) से कहीं अधिक निकली है।

नाइट्रेट : यह सबसे व्यापक प्रदूषक है, जो उर्वरकों और सीवेज के रिसाव के कारण 20% नमूनों में पाया गया। राजस्थान (50.5%) और कर्नाटक (45.5%) इसमें सबसे ऊपर हैं।

भारी धातुएं : दिल्ली में लेड (Lead) और पश्चिम बंगाल/बिहार में आर्सेनिक (Arsenic) का स्तर चिंताजनक है।

देश के 70 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित 
क्‍या कहती है नीति आयोग (NITI Aayog) की रिपोर्ट : ठीक इसी तरह नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस बारे में हकीकत बयां कर रही है। रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 60 करोड़ लोग पानी की कमी या गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। वहीं हैरान करने वाली बात है कि देश के लगभग 70% जल स्रोत प्रदूषित पाए गए हैं, जिसके कारण भारत 'ग्लोबल वॉटर क्वालिटी इंडेक्स' में काफी निचले पायदान (120/122) पर है। रिपोर्ट कहती है कि दूषित या खराब पानी से देश में हर साल तकरीबन 2 लाख मौतें हो रही हैं। इस रिपोर्ट पर यकीन करें तो यह आंकड़ा डराने वाला है।
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जल जीवन मिशन रिपोर्ट : 34 राज्‍यों में पानी की हकीकत  
इंदौर के इस जहरीले पानी कांड के बीच इंडियास्पेंड में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने देश के 34 राज्‍यों पीने के पानी की गुणवत्‍ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में जो तस्‍वीर सामने आई है, वो चिंताजनक है

माइक्रोबायोलॉजिकल मानकों पर खरा नहीं पानी : जल जीवन मिशन की 2024 की एक राष्ट्रीय आकलन रिपोर्ट कहती है कि भारत में घरों के नल से लिए गए पानी के हर चार सैंपलों में से एक माइक्रोबायोलॉजिकल मानकों पर खरा नहीं उतरा। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 76% सैंपल लैब टेस्ट में पास हुए, जबकि सिर्फ 24% फेल पाए गए। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 75% परिवार पीने से पहले पानी को किसी भी तरह से उबालते या फिल्टर नहीं करते। इसके पीछे की वजह प्रशासन का नागरिकों को जागरूक करने का मिशन विफल माना जाना चाहिए। 92.4% परिवारों ने नल के पानी की गुणवत्ता पर संतोष जताया। हालांकि यह रिपोर्ट साल 2024 की है। लेकिन इतनी अवधि में पानी की गुणवत्‍ता को लेकर कोई बदलाव हुआ हो यह मुमकीन नहीं है।

घरों से ज्‍यादा खराब संस्थानों की हालत : चौंकाने वाली बात यह है कि सार्वजनिक संस्थानों की स्थिति घरों से भी खराब पाई गई। स्कूलों, आंगनवाड़ियों और स्वास्थ्य केंद्रों से लिए गए पानी के केवल 73% सैंपल ही पास हुए। इसका मतलब है कि बच्चे, गर्भवती महिलाएं और इलाज कराने वाले लोग भी मानक से कम गुणवत्ता का पानी पी रहे हैं। जो उनके स्‍वास्‍थ्‍य को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।

जांच व्यवस्था हुई ध्‍वस्‍त : रिपोर्ट में सामने आया है कि देश के कई राज्‍यों में गांवों में पानी की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले फील्ड टेस्ट किट (एफटीके) 73% गांवों में उपलब्ध नहीं थे। यानी अधिकांश गांवों में लोग यह जांच ही नहीं कर सकते कि उनका पानी सुरक्षित, पीने योग्‍य है या नहीं। हालात यह हैं कि जब तक पानी साफ दिखता है, स्वाद और गंध ठीक लगती है, लोग उसे सुरक्षित मानकर पी रहे हैं। ऐसे निष्कर्ष पहले नॉर्वे, कनाडा और भारत के कई राज्यों में हुए अध्ययनों में भी सामने आ चुके हैं।

कहां और कैसे हुआ आकलन : बता दें कि यह आकलन जुलाई से अक्टूबर 2024 में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 761 जिलों के चयनित गांवों में किया गया। हर गांव में 12 घरों और सभी सार्वजनिक संस्थानों, स्कूल, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र का सर्वे किया गया।

रख-रखाव और कुशल स्‍टाफ की कमी : रिपोर्ट के अनुसार केवल 55% गांवों में ही ‘विलेज वाटर एंड सैनिटेशन कमेटी’ या पानी समिति सक्रिय है। जल जीवन मिशन के तहत ग्राम पंचायतों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे पानी की योजना और प्रबंधन करें।

खराब सैंपलों की संख्या ज़्यादा हो सकती है : दरअसल 58.1% गांवों में ही संचालन और रख-रखाव के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध हैं। यानी चार में से एक से ज़्यादा गांवों में सिस्टम संभालने के लिए कुशल कर्मचारी नहीं हैं। केवल 26.8% गांवों में पानी सेवा के लिए उपयोग शुल्क लिया जाता है। 27.2% गांवों में ही टेस्ट किट उपलब्ध हैं, जबकि 70.3% गांवों में क्लोरीनीकरण की व्यवस्था है। लेकिन क्लोरीन से सिर्फ जैविक प्रदूषण कम होता है, रासायनिक प्रदूषण की सफाई नहीं होती। इसलिए असल में खराब सैंपलों की संख्या ज़्यादा हो सकती है।

नल कनेक्‍शन की स्‍थिति : 28 जनवरी 2026 तक जल जीवन मिशन के तहत करीब 15.8 करोड़ ग्रामीण परिवारों (81.6%) को नल कनेक्शन दिया जा चुका है। यह जानकारी सरकार ने लोकसभा में दी है। इनमें से 98% परिवारों के पास कनेक्शन है, 87% ने बताया कि कनेक्शन चालू है, 84% को नियमित पानी मिल रहा है और 80% को पर्याप्त मात्रा (प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर से ज्यादा) मिल रही है।

बदहाल पाइपलाइन और खराब पंप : जिन घरों में नल कनेक्शन काम नहीं कर रहा था, उनमें 32% मामलों में पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने की वजह सामने आई। 30% मामलों में पंप ख़राब थे। जनवरी 2025 में ग्रामीण महाराष्ट्र में भी अनियमित पानी आपूर्ति की रिपोर्ट आई थी, जहां लोगों को निजी स्रोतों से पानी खरीदना पड़ रहा था।

लोग पानी उबालते और कपड़े से छानते हैं : 2024 के एक अध्ययन में भी कहा गया कि केवल नल कनेक्शन देने से नियमित पानी की गारंटी नहीं होती। परियोजना में देरी, संचालन की कमी और स्थानीय समस्याएं भी बाधा बनती हैं। जो परिवार पानी को शुद्ध करते हैं, उनमें 13.2% पानी उबालते हैं और 11.2% कपड़े से छानते हैं।

राज्‍यों में पानी के सैंपल पास होने की दर राष्ट्रीय औसत से कम 
राज्यों में बड़ा अंतर : राज्यों के बीच पानी की गुणवत्ता में बड़ा अंतर देखा गया। लद्दाख में 99% पानी के सैंपल पास हुए, जबकि त्रिपुरा में केवल 31.1%. पास हो सके। उत्तर प्रदेश (66.4%), मध्य प्रदेश (63.3%), केरल (56.4%) और गुजरात (47.3%) जैसे बड़े राज्यों में भी पानी के सैंपल के पास होने की दर राष्ट्रीय औसत 76% से कम रही।
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क्‍या हुआ था इंदौर में? 
इंदौर का जहरीला जल कांड : इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुई दूषित पानी की त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। स्वच्छता में नंबर-1 रहने वाले शहर में इस तरह की घटना ने नगर निगम और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

दिसंबर 2025 में करीब 21 और 26 दिसंबर के आसपास भागीरथपुरा क्षेत्र के निवासियों ने नलों से आने वाले पानी के मटमैले होने और उसमें से दुर्गंध आने की शिकायत की थी। इसके कुछ ही दिनों के भीतर, क्षेत्र में उल्टी, दस्त (डायरिया) और पेट दर्द के सैकड़ों मामले सामने आने लगे।

हताहतों के आंकड़े (फरवरी 2026 तक) : मौतों के आंकड़ों को लेकर प्रशासन और विपक्षी दलों के बीच मतभेद रहे हैं। आधिकारिक पुष्टि के अनुसार मध्य प्रदेश विधानसभा में सरकार ने 22 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है (20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार)।

विपक्ष और स्थानीय लोगों का दावा : कांग्रेस और स्थानीय निवासियों का दावा है कि मरने वालों की संख्या 35 तक पहुंच गई है। 2 हजार 450 से अधिक लोग बीमार हुए, जिनमें से लगभग 450 को गंभीर हालत में अस्पतालों (MY अस्पताल और निजी अस्पतालों) में भर्ती कराना पड़ा।

क्‍या है त्रासदी की वजह : जांच रिपोर्टों और ऑडिट में जो कारण सामने आए वो चौंकाने वाले हैं।

सीवेज का मिश्रण: मुख्य पेयजल पाइपलाइन एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजर रही थी। पाइपलाइन में रिसाव (leakage) के कारण सीवेज का गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया।

बैक्टीरिया का संक्रमण: पानी के नमूनों की जांच में E.coli, Salmonella और Vibrio cholera जैसे घातक बैक्टीरिया पाए गए।

पुरानी पाइपलाइन : क्षेत्र में पाइपलाइनें कई दशक पुरानी और जर्जर थीं। CAG की रिपोर्ट में पहले ही शहर की जल वितरण प्रणाली में 65% तक पानी की बर्बादी और लीकेज की चेतावनी दी गई थी। लापरवाही बरतने वाले नगर निगम के अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई है। इंदौर नगर निगम (IMC) के कमिश्नर का भी तबादला किया गया।

हाई कोर्ट ने लिया स्‍वत: संज्ञान : मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया और एक न्यायिक जांच आयोग (रिटायर्ड जज एसके गुप्ता की अध्यक्षता में) का गठन किया है।

2019 की कैग रिपोर्ट ने किया था खुलासा, नहीं जागा इंदौर प्रशासन : इंदौर जल कांड के बाद भारत के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की साल 2019 की रिपोर्ट में सामने आई थी। कैग ने इंदौर और भोपाल में नगर निगम द्वारा सप्लाई किए जा रहे पीने के पानी का परफॉर्मेंस ऑडिट किया था। उस रिपोर्ट में कईं कमियां बताई गई थीं। CAG की रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों नगर निगमों में फिल्ट्रेशन प्लांट पर पानी की क्वालिटी और टैंकों से लोगों तक पहुंचने वाले पानी की क्वालिटी में बड़ा अंतर था। पाइपलाइन लीकेज पर नजर रखने के लिए लीकेज डिटेक्शन सेल की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। रिपोर्ट के अनुसार, पीने के पाइपलाइन लीकेज की मरम्मत में काफी देरी हुई। शिकायतों के बाद समाधान के कई मामलों में 22 दिन से लेकर 182 दिन तक का समया लगा रहे थे।। इसका कारण यह था कि सालाना कॉन्ट्रैक्ट की जगह हर बार अलग-अलग टेंडर निकाले जाते थे। कैग ने बताया कि 2013 से 2018 के बीच 4,481 पानी के सैंपल 'खराब' क्वालिटी (BIS 10500) के मानकों पर खरे नहीं उतरे। स्वतंत्र जांच में लिए गए 54 सैंपलों में से 10 गंदगी और मल कोलीफॉर्म के कारण खराब पाए गए। इससे भोपाल और इंदौर के करीब 8.95 लाख लोगों को दूषित पानी सप्लाई हुआ। इसी दौरान पानी से होने वाली बीमारियों के 5.45 लाख मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जांच किए गए 45 ओवरहेड टैंकों में से 23 की नियमित सफाई नहीं हुई। साथ ही जरूरी गाद के सैंपल भी नहीं लिए गए। इंदौर नगर निगम बिना जांच के बोरवेल का पानी सप्लाई कर रहा था। जांच में कई बोरवेल सैंपलों में आयरन, नाइट्रेट, कैल्शियम और फीकल कोलीफॉर्म तय मानकों से ज्यादा पाए गए। कैग के अनुसार, ऐसे दूषित पानी से लिवर, दिल, पैंक्रियाज से जुड़ी बीमारियां, डायबिटीज, दस्त, उल्टी, पीलिया, टाइफाइड और किडनी स्टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

क्‍या हासिल हुआ : देशभर में पानी की गुणवत्‍ता के ये हाल हैं। कुल मिलाकर भारत में पीने के पानी की गुणवत्ता वर्तमान में एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। देश की तेजी से बढ़ती आबादी, अनियंत्रित शहरीकरण और औद्योगिक कचरे ने जल स्रोतों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उस पर स्‍थानीय प्रशासनों की नाकामी और लापरवाही ने इसे और ज्‍यादा भयावह बना दिया है। भारत में पानी की उपलब्धता से कहीं बड़ी समस्या उसकी गुणवत्ता है। जब तक जल वितरण प्रणाली का आधुनिकीकरण और अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) कड़ाई से लागू नहीं किया जाता, तब तक सुरक्षित पेयजल का लक्ष्य दूर नजर आता है।

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