Publish Date: Tue, 30 Dec 2025 (08:20 IST)
Updated Date: Tue, 30 Dec 2025 (09:29 IST)
Putrada Ekadashi 2025: पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह व्रत संतान सुख और उसकी उन्नति के लिए समर्पित है। 30 दिसंबर 2025, मंगलवार को आने वाली यह एकादशी धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी मानी जा रही है। यहाँ पुत्रदा एकादशी व्रत के चार प्रमुख लाभ और इसके महत्व का विस्तृत विवरण दिया गया है।
पुत्रदा एकादशी व्रत के 4 दिव्य लाभ
1. मनोकामनाओं की पूर्ति और ईश्वरीय कृपा
शास्त्रों में वर्णित है कि पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से साधक की सभी सांसारिक और आध्यात्मिक इच्छाएं पूरी होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में छाई नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-शांति का वास होता है। यह व्रत केवल फल प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि श्री हरि की विशेष कृपा प्राप्त करने का भी माध्यम है।
2. संतान की समस्याओं का समाधान
यह व्रत न केवल संतान प्राप्ति के लिए है, बल्कि उन माता-पिता के लिए भी अत्यंत लाभकारी है जिनकी संतान पहले से है। यदि आपकी संतान के जीवन में स्वास्थ्य, शिक्षा या करियर से जुड़ी समस्याएं आ रही हैं, तो इस व्रत के पुण्य प्रभाव से वे बाधाएं दूर होती हैं। संतान को 'दीर्घायु' और 'आरोग्य' का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
3. वाजपेयी यज्ञ के समान पुण्यफल
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से मिलने वाला पुण्यफल किसी कठिन 'वाजपेयी यज्ञ' के अनुष्ठान के समान होता है। प्राचीन काल में राजा और ऋषि-मुनि महान फलों की प्राप्ति के लिए यह यज्ञ करते थे, लेकिन कलियुग में एकादशी का व्रत ही उस फल को देने में सक्षम माना गया है। इससे व्यक्ति के संचित पापों का नाश होता है।
4. नि:संतान दंपतियों के लिए वरदान
जो दंपति संतान सुख से वंचित हैं, उनके लिए यह व्रत किसी वरदान से कम नहीं है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ श्रीकृष्ण के 'बाल स्वरूप' (लड्डू गोपाल) की पूजा का विशेष विधान है। यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ दंपति मिलकर यह व्रत करते हैं, तो उन्हें योग्य और गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
व्रत रखने की विधि:
पुत्रदा एकादशी का व्रत दो प्रकार से किया जा सकता है, जो व्यक्ति की शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है:-
निर्जला व्रत: जो लोग पूर्णतः स्वस्थ और सक्षम हैं, वे बिना जल ग्रहण किए 'निर्जला' उपवास रख सकते हैं। यह अत्यंत कठिन और तपस्या पूर्ण माना जाता है।
फलाहारी या जलीय व्रत: सामान्यतः लोग फलाहार (फल और दूध) या जल ग्रहण करके यह व्रत रखते हैं। इसमें अन्न का पूरी तरह त्याग करना अनिवार्य है।
पूजा के विशेष नियम
बाल स्वरूप की पूजा: संतान सुख की कामना के लिए पंचामृत से लड्डू गोपाल का अभिषेक करें और उन्हें पीले वस्त्र व भोग अर्पित करें।
पारण का महत्व: एकादशी का व्रत अगले दिन (द्वादशी तिथि) शुभ मुहूर्त में पारण करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है।
दान-पुण्य: इस दिन जरूरतमंदों को पीला अन्न या वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ होता है।
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