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31 मई 1893 भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

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Pictured is Swami Vivekananda, a young sanyasi from India, in saffron attire
- अमित राव पवार, देवास (म.प्र.)
युवा लेखक-साहित्यकार

भारत के इतिहास में कुछ तिथियां केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। 31 मई 1893 ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे 'स्वामी विवेकानंद।'
 
उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की आध्यात्मिक धरोहर, उसके वेद, उपनिषद, दर्शन और सनातन संस्कृति को पिछड़ेपन का प्रतीक बताने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसे कठिन समय में एक युवा संन्यासी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा की कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाली आध्यात्मिक चेतना है।
 
अमेरिका के शिकागों नगर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण उनके लिए केवल एक अवसर नहीं था, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा का प्रश्न था।'किंतु यह यात्रा किसी भी दृष्टि से सरल नहीं थी।' उनके पास पर्याप्त धन नहीं ओर न ही कोई बड़ा संगठन उनके साथ, यात्रा की व्यवस्थाएं अनिश्चित थीं। समुद्री यात्रा लंबी और कठिन थी। फिर भी उनके भीतर एक अदृश्य शक्ति कार्य कर रही थी, अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा और भारतमाता की पुकार। 
 
'31 मई 1893' की वह सुबह भारतीय इतिहास की सबसे भावनात्मक सुबहों में से एक कही जा सकती है। जब स्वामी विवेकानंद ने भारत से प्रस्थान किया, तब उनके मन में केवल एक संकल्प था—विश्व को भारत की आत्मा से परिचित कराना। कहा जाता है कि उस समय उनकी आंखों में करुणा भी थी और तेज भी।

वे जानते थे कि वे किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए नहीं जा रहे, बल्कि करोड़ों भारतीयों की मौन आकांक्षाओं को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। बंदरगाह पर खड़े लोग शायद यह सोच भी नहीं सकते थे कि यह साधारण-सा दिखने वाला संन्यासी आने वाले समय में भारत के गौरव को विश्व के शिखर तक पहुंचा देगा। 
 
उस क्षण भारत की सांस्कृतिक चेतना समुद्र के रास्ते विश्व की ओर यात्रा कर रही थी। यह केवल शरीर की यात्रा नहीं थी, यह भारतीय आत्मविश्वास की यात्रा थी। यह उस सभ्यता का प्रस्थान था जिसने हजारों वर्षों से विश्व को सहिष्णुता, मानवता और आध्यात्मिकता का संदेश दिया था। स्वामीजी के पास धन की कमी थी, पर विचारों की समृद्धि अपार थी। उनके पास भौतिक साधन सीमित थे, पर आत्मबल असीम था।
 
स्वामी विवेकानंद की विदेश यात्रा जाने की योजना में उनके शिष्यों तथा अनेक शुभचिंतकों ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। विशेष रूप से चेन्नई के भक्तों और राजस्थान के खेतड़ी राज्य के राजा अजीत सिंह जी जो कि स्वामी जी के परम भक्त और समर्थक थे, ने आर्थिक सहायता की।

स्वामी विवेकानंद ने मुंबई से अपनी ऐतिहासिक समुद्री यात्रा प्रारंभ की वे जापान, चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका पहुंचे किंतु विदेशी भूमि पर रहने और सम्मेलन तक पहुंचने के लिए वह एकत्रित किया गया धन पर्याप्त नहीं था। फिर भी उन्होंने कठिनाइयों को अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। 
 
इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागों नगर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेना था। वहां वे भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और वेदांत दर्शन का प्रचार करना चाहते थे। यात्रा के दौरान वे पहले कनाडा के वेंकूवर पहुंचे। इसके बाद उन्होंने रेलमार्ग से यात्रा की और 30 जुलाई 1893 को शिकागों पहुंचे। बाद में विश्व धर्म सम्मेलन में दिए गए उनके प्रेरणादायक भाषण ने संपूर्ण विश्व को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता से परिचित कराया।
 
उनके जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि जब उद्देश्य महान हो, तब अभाव भी व्यक्ति को रोक नहीं सकते। समुद्र के लंबे सफर के दौरान शायद अनेक बार उनके मन में भारत की छवि उभरती होगी, गरीब किसान, संघर्षरत युवा, दीन-हीन जनता और वह प्राचीन संस्कृति, जो अपनी असली पहचान के लिए व्याकुल थी।

वे जानते थे कि यदि विश्व भारत को सम्मान देगा, तो भारत स्वयं भी अपने प्रति सम्मान अनुभव करेगा। इसलिए उनकी यात्रा केवल शिकागो तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी, वह भारत को आत्मगौरव लौटाने की यात्रा थी।
 
शिकागो पहुंचने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। सम्मेलन में भाग लेने के लिए आवश्यक औपचारिकताएं, परिचय-पत्रों का अभाव और आर्थिक संकट उनके सामने दीवार बनकर खड़े थे। कई दिनों तक उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। (उन्हें कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ा) परंतु वे विचलित नहीं हुए। उनके भीतर यह अटूट विश्वास था कि वे सत्य व मानवता के संदेशवाहक हैं, और सत्य का मार्ग अंततः स्वयं बन जाता है।
 
वास्तव में, 31 मई 1893 को आरंभ हुई वह यात्रा केवल शिकागो तक नहीं अपितु वह करोड़ों भारतीयों के हृदय तक पहुंची। उसने गुलाम भारत में आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित किया, युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि भारत की संस्कृति विश्व को दिशा दे सकती है। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रेरणास्रोत बन गए।

आज जब भारत विश्व पटल पर अपनी नई पहचान बना रहा है,  तब 31 मई 1893 की वह यात्रा हमें पुनः स्मरण कराती है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मा में होती है। स्वामी विवेकानंदजी ने जिस भारत का स्वप्न देखा था, वह आत्मविश्वास, संस्कारित, सहिष्णु और मानवता के लिए समर्पित भारत था। इसलिए 31 मई केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के विश्व की ओर प्रस्थान का दिवस है। 
 
यह वह क्षण था जब एक युवा संन्यासी ने समुद्र पार करते हुए भारत के गौरव को विश्व के शिखर तक पहुंचाने का संकल्प लिया और उसे पूर्ण भी किया। आज भी जब हम स्वामी विवेकानंदजी को स्मरण करते हैं, तब उनके साथ वह ऐतिहासिक यात्रा भी हमारी स्मृतियों में जीवित हो उठती है, एक ऐसी यात्रा, जिसने भारत को स्वयं अपनी शक्ति का बोध कराया।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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