
वर्ष 2017 में जब एक लंबे अंतराल के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत मिला तो 19 मार्च 2017 को योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर, आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े और राजनीति के लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील सूबे के मुखिया का दायित्व संभाला। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने पीठ की लोककल्याण की परंपरा और संस्कार के फलक को अपने पद के अनुसार लगातार विस्तार दिया। उन्होंने साबित किया कि जनकेंद्रित राजनीति के केंद्र में भी धर्म हो सकता है। उनके दादा गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ के समय में जिस ‘हिंदू और हिंदुत्व’ को प्रतिगामी माना जाता था उसे योगी ने बहस के केंद्र में ला दिया।
इस तरह उन्होंने धर्म और राजनीति को लोक कल्याण का जरिया बनाकर साबित किया कि संत, समाज का वैचारिक मार्गदर्शन करने के साथ सत्ता का कुशलता से नेतृत्व भी कर सकता है। यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के खाते में ढेर सारी उपलब्धियां दर्ज हैं। 2019 में एक प्रतिष्ठित पत्रिका के सर्वे में उनको देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री माना गया। यूपी में लगातार सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी योगी के नाम दर्ज है।
योगी आदित्यनाथ ने 1998 से 2017 तक लगातार गोरखपुर संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया, जबकि फिलहाल वह गोरखपुर शहर विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब वह पहली बार सांसद बने तो सबसे कम उम्र के सांसद थे। अपने समय में वह देश के उन चुनिंदा सांसदों में थे जो सर्वाधिक सत्र अटेंड करते थे। कुछ साल पूर्व फेम इंडिया ने एक सर्वे में उनको प्रधानमंत्री के बाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय लोगों में रखा। इसके पहले भी इंडिया टूडे ने अपने सर्वे में उनको देश के सबसे रसूखदार लोगों में शामिल किया था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में यूपी में लगभग हर क्षेत्र में रिकार्ड बने हैं। दरअसल वह विजनरी हैं। अपने विजन को अमली जामा पहनाने के लिए वह दिन-रात मेहनत करते हैं। उनकी डिक्शनरी में ना नाम का शब्द है ही नहीं। लिहाजा वह हर चुनौती को अवसर मानते हैं। और चुनौती मिलते ही उसे अवसर में बदलने के लिए पूरी ताकत से जी-जान से जुट जाते हैं। कोरोना का अभूतपूर्व संकट भी इसका अपवाद नहीं रहा। उनके लिए राजधर्म और पीठ की परंपरा के अनुसार लोककल्याण सर्वोपरि रहा है। कोविडकाल में अपने पिता के अंतिम संस्कार में जाने के बजाय प्रदेश की 23 करोड़ जनता की सेवा को तरजीह देकर उन्होंने राजधर्म की मिसाल कायम की। साथ ही लोककल्याण की पीठ की परंपरा क्या है, इसे भी साबित किया। जिसके बारे में वह अक्सर कहते रहे कि पीठ से जुड़े पीठाधीश्वरों ने मोक्ष की जगह हरदम लोककल्याण को प्राथमिकता दी।
योगी जी से लेकर उनके गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ और दादा गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ का जीवन इसकी नजीर है। लोकल्याण से जुड़े मुद्दे स्वास्थ्य, शिक्षा और समाज के सबसे वंचित तबके वनटांगिया, मुसहर, थारू और घुमंतू जातियों के हित में किए गए काम इसके प्रमाण हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद पद के अनुसार बढ़े फलक के अनुरूप पीठ की परंपरा के अनुसार लोककल्याण का यह काम पूरी शिद्दत से जारी है। मुख्यमंत्री बनने के बाद लगभग हर क्षेत्र में बने रिकॉर्ड इसे साबित करते हैं। योगी आदित्यनाथ मिथक तोड़ने में भी यकीन रखते हैं। कई बार नोएडा जाकर उन्होंने इसे साबित किया। दरअसल, नोएडा को लेकर राजनेताओं में एक पुराना अंधविश्वास रहा है, जिसे 'नोएडा जिंक्स' कहा जाता था। इस मान्यता के अनुसार, अगर कोई मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान नोएडा का दौरा करता है, तो वह अगली बार सत्ता में नहीं आ पाता।
इसी तरह जिस अयोध्या और राम मंदिर के नाम मात्र से पूर्व के तमाम मुख्यमंत्रियों को करेंट लगता था, उससे उन्होंने अपना लगाव पूर्ववत ही जारी रखा। पर्यावरण और प्रकृति के प्रति उनका प्रेम अद्भुत है। इसकी वजह संभवतः प्राकृतिक रूप से बेहद संपन्न देव भूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड से उनका रिश्ता वन विभाग में पिता की नौकरी रही हो। उनके इस प्रेम का विस्तार बच्चों, बेजुबानों खासकर गोवंश के प्रति दिखता है। यही वजह है कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदेश की हरीतिमा बढ़ाने के लिए उनके निर्देश पर हर साल रिकॉर्ड पौधरोपण होता है। गोरखपुर स्थित गोरखनाथ का करीब 52 एकड़ का हरा भरा और साफ सुथरा परिसर भी योगी के पर्यावरण प्रेम का उदाहरण है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद निराश्रित गोवंश की सुरक्षा और देशी गायों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उन्होंने ढेरों कदम उठाए। निराश्रित गोवंश के लिए बने गो-आश्रयों को अब स्वावलंबी बनाने पर योगी सरकार का फोकस है। गोरखनाथ मंदिर में भी देशी गोवंश की एक समृद्ध गोशाला है। योगी जब भी गोरखनाथ मठ में रहते हैं। उनकी सुबह की दिनचर्या में गोशाला जाना अनिवार्य है। गोशाला के गोवंश भी उनकी प्रतीक्षा करते हैं। इसे जिसने देखा है वही महसूस कर सकता है।
पहले कार्यकाल में योगी का फोकस प्रदेश के बाबत देश-दुनिया में जो खराब परसेप्शन था, उसको बदलने का था। इसमें कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस जैसी नीतियां कारगर रहीं। दूसरे कार्यकाल में फोकस प्रदेश की पहचान बदलने पर रहा। यूपी अब नए भारत के नए उत्तर प्रदेश के रूप में सबके सामने है। आज उत्तर प्रदेश की पहचान एक अपराधग्रस्त या दंगाग्रस्त प्रदेश के रूप में नहीं है। आज देश के अंदर यूपी बेहतर कानून व्यवस्था के रूप में जाना जाता है और अलग-अलग राज्यों में उत्तर प्रदेश के मॉडल को उतारने और उसको जानने की उत्सुकता भी रहती है।
बीते 8 वर्षों में उत्तर प्रदेश को देश की सातवीं से दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के बाद अब लक्ष्य विकास के हर मानक पर नम्बर एक होने की है। नोएडा में फिल्म सिटी, डेटा पार्क, अयोध्या और जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, हेल्थपार्क, लेदर पार्क, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, मेट्रो रेल का विस्तार, रैपिड रेल विस्तार, ओडीओपी और एमएसएमई के जरिए निर्यात को दोगुना करने, ब्रांड उप्र को देश और दुनिया में स्थापित करने जैसे बहुआयामी कार्यक्रमों से उत्तर प्रदेश के विकास को और रफ्तार देने की तैयारी है। प्रयागराज के महाकुंभ के रूप में दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समागम के सफल आयोजन ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिया।
नाथपंथ में दीक्षित होने के पहले योगी आदित्यनाथ का नाम अजेय था। दीक्षा के बाद नाम तो बदल गया, पर पुराने नाम 'अजेय' के अनुरूप योगीजी 1998 में जबसे राजनीति में आए अजेय ही रहे हैं। उन्होंने कभी खुद किसी इंटरव्यू में कहा था, 'मैं कभी हारा नहीं' । गोरखपुर से संसदीय चुनावों में वह अजेय रहे हैं तो पहली बार 2022 में विधानसभा चुनाव लड़कर उन्होंने अपनी अपराजेय लोकप्रियता को पुनः प्रमाणित किया।
बाल्यकाल से राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित अजेय सिंह बिष्ट का जुड़ाव नब्बे के दशक में राम मंदिर आंदोलन से हो गया। इसी दौरान वह मंदिर आंदोलन के शीर्षस्थ नायकों में शुमार गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए। महंत जी के सानिध्य और उनसे प्राप्त नाथपंथ के बारे में मिले ज्ञान ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि गढ़वाल विश्वविद्यालय से स्नातक (विज्ञान) तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय कर लिया। इसी क्रम में वह 1993 में गोरखनाथ मंदिर आ गए और नाथ पंथ की परंपरा के अनुरूप धर्म, अध्यात्म की तात्विक विवेचना और योग साधना में रम गए।
उनकी साधना और अंतर्निहित प्रतिभा को देख महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें 15 फरवरी 1994 को गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी के रूप में दीक्षा प्रदान की। उस समय उनकी उम्र महज 22 साल थी। गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने पीठ की लोक कल्याण और सामाजिक समरसता के ध्येय को सदैव विस्तारित किया। उनका जन्म 5 जून 1972 को उत्तर प्रदेश अब उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले स्थित यमकेश्वर तहसील के पंचुर गांव में हुआ था। उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट वन विभाग में रेंजर थे। माता सावित्री देवी सामान्य गृहिणी थीं।
महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के उपरांत वह 14 सितंबर 2014 को गोरक्षपीठाधीश्वर (महंत) के रूप में पदासीन हुए। इसी भूमिका के साथ ही वह इसी तिथि से अखिल भारतीय बारह भेष पंथ योगी सभा के अध्यक्ष भी हैं। अपने गुरु के ब्रह्मलीन होने के बाद अपने पहले साक्षात्कार में योगी ने कहा भी था, ‘गुरुदेव के सम्मोहन ने संन्यासी बना दिया।’ दोनों का एक दूसरे पर अटूट भरोसा था। यही वजह रही कि पीठ के उत्तराधिकारी के रूप में धार्मिक विरासत सौंपने के कुछ साल बाद ही ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ ने अपने प्रिय शिष्य (योगी) को अपनी राजनीतिक विरासत भी सौंप दी।
जंगे आजादी जब चरम पर थी, तब योगी आदित्यनाथ के दादागुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर थे। वह मेवाड़ के ठिकाना कांकरवा में पैदा हुए थे। पर, 5 साल की उम्र में गोरखपुर आए तो यहीं के होकर रह गए। यकीनन देश भक्ति का जोश, जज्बा और जुनून उनको मेवाड़ की उसी माटी से मिली थी जहां के राणा प्रताप ने अपने समय के सबसे ताकतवर मुगल सम्राट के आगे तमाम दुश्वारियों के बावजूद घुटने नहीं टेके। प्रताप का संघर्ष उनकी विरासत में शामिल तो था ही, किशोरवय होते दिग्विजयनाथ पर आजादी को लेकर महात्मा गांधी के आंदोलन का भी काफी प्रभाव था। नतीजा दिग्विजयनाथ भी जंगे आजादी में कूद पड़े। उन्होंने जंगे आजादी के लिए जारी क्रांतिकारी आंदोलन और गांधीजी के नेतृत्व में जारी शांतिपूर्ण सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक ओर जहां उन्होंने समकालीन क्रांतिकारियों को संरक्षण, आर्थिक मदद और अस्त्र-शस्त्र मुहैया कराया, वहीं गांधीजी के आह्वान वाले असहयोग आंदोलन के लिए स्कूल का परित्याग कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दोनों तरीकों में शामिल रहने का उनका एकमात्र उद्देश्य था कि चाहे जैसे मिले पर देश को आजादी मिलनी चाहिए।
चौरीचौरा जनक्रांति (चार फरवरी 1922) के करीब साल भर पहले आठ फरवरी 1921 को जब गांधीजी का पहली बार गोरखपुर आगमन हुआ था, वह रेलवे स्टेशन पर उनके स्वागत और सभा स्थल पर व्यवस्था के लिए अपनी टोली स्वयंसेवक दल के साथ मौजूद थे। नाम तो उनका चौरीचौरा जनक्रांति में भी आया था, पर वह ससम्मान बरी हो गए। बाद के दिनों में मुस्लिम लीग को तुष्ट करने की नीति से उनका कांग्रेस और गांधीजी से मोह भंग होता गया। इसके बाद उन्होंने वीर सावरकर और भाई परमानंद के नेतृत्व में गठित अखिल भारतीय हिंदू महासभा की सदस्यता ग्रहण कर ली। जीवन पर्यंत वह इसी में रहे। उनके बारे में कभी सावरकर ने कहा था, 'यदि महंत दिग्विजयनाथ की तरह अन्य धर्माचार्य भी देश, जाति और धर्म की सेवा में लग जाएं तो भारत पुनः जगतगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हो सकता है।
ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराण प्रताप से कितने प्रभावित थे, इसका सबूत 1932 में उनके द्वारा स्थापित महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद है। इस परिषद का नाम महाराणा प्रताप रखने के पीछे यही मकसद था कि इसमें पढ़ने वाल विद्यार्थियों में भी देश के प्रति वही जज्बा, जुनून और संस्कार पनपे जो प्रताप में था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण और बहुआयामी परिवर्तन किए हैं। राज्य की छवि एक 'बीमारू' राज्य से हटकर देश की अर्थव्यवस्था के 'ग्रोथ इंजन' के रूप में उभरी है। अयोध्या में भव्य दीपोत्सव, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाले उनके कदम भी उल्लेखनीय हैं। उनका नेतृत्व एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और तेज गति से कार्य करने वाली सरकार की विरासत स्थापित कर रहा है, जो यूपी की राजनीति और शासन के लिए एक नया मानक तय करता है।