Publish Date: Mon, 02 Mar 2026 (21:22 IST)
Updated Date: Mon, 02 Mar 2026 (21:43 IST)
डॉ. ब्रह्मदीप अलूने
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार
ईरान के संविधान में असली शक्ति उन 88 धर्म गुरुओं के हाथों में है, जिन्हें जनता हर आठ वर्ष में चुनती है। यह भी दिलचस्प है की कोई भी धर्म गुरु जनता का प्रतिनिधित्व ऐसे ही नहीं कर सकता,उसके लिए बाकायदा एक नियम बनाया गया है। उम्मीदवारों की योग्यता की जांच गार्जियन काउंसिल द्वारा की जाती है जो यह सुनिश्चित करती है की केवल मान्यता प्राप्त इस्लामी विद्वान ही चुनाव लड़ सकते हैं। इन धर्मगुरुओं से मिलकर बनती है,मजलिस-ए-ख़ुबरेगान जो ईरान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। यह संस्था 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद बने ईरान के संविधान के तहत स्थापित की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य देश के सर्वोच्च नेता की नियुक्ति और निगरानी करना है। इसके सदस्य इस्लामी न्यायशास्त्र के विशेषज्ञ होते हैं,वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सर्वोच्च नेता धार्मिक रूप से योग्य हो।
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेता राष्ट्रपति से भी अधिक शक्तिशाली होता है। इसलिए असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स का महत्व बहुत बड़ा है,क्योंकि वही इस पद को नियंत्रित करने वाली एकमात्र संवैधानिक संस्था है। ईरान की सत्ता संरचना में यह संस्था धार्मिक और राजनीतिक अधिकार का संगम दर्शाती है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 28 फरवरी 2026 से अपनी मौत तक अर्थात् साढ़े 36 साल तक इस पद को संभाला।
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ऐसी बनाई गई जिसमें धार्मिक नेतृत्व को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। सर्वोच्च नेता खामनेई ने अपने लंबे कार्यकाल में संस्थागत ढांचे को इस प्रकार संतुलित किया है कि सत्ता केवल व्यक्ति-आधारित न रहकर संरचनात्मक रूप से सुरक्षित रहे।
ईरान में मजलिस-ए-ख़ुबरेगान के 88 सदस्य औपचारिक रूप से सर्वोच्च नेता का चयन करते हैं। यह धारणा प्रचलित है कि इन सदस्यों में अधिकांश वैचारिक रूप से रूढ़िवादी या व्यवस्था-समर्थक हैं,क्योंकि उनके चुनाव से पहले गार्जियन काउंसिल उनकी वैचारिक और धार्मिक पात्रता की जांच करता है। इसी प्रकार यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि खामनेई ने संस्थाओं के माध्यम से ऐसी निरंतरता सुनिश्चित की है कि उनके बाद भी सत्ता संरचना अचानक नहीं बदलेगी। खामनेई की मौत के बाद भी अभी तक ईरान इसीलिए प्रतिकार कर रहा है क्योंकि ईरान में सत्ता केवल एक व्यक्ति के हाथ में नहीं,बल्कि धार्मिक प्रतिष्ठान,रिवोल्यूशनरी गार्ड,न्यायपालिका और निगरानी परिषदों के संयुक्त तंत्र में निहित है।
अमेरिका-ईरान संबंध दशकों की वैचारिक टकराहट, प्रतिबंधों,परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय राजनीति पर आधारित हैं। यदि खामनेई के बाद वही वैचारिक निरंतरता बनी रहती है,तो स्थितियां नहीं बदल सकती। ईरान एक बड़ा, संसाधन-संपन्न और क्षेत्रीय रूप से प्रभावशाली देश है,जिसकी मजबूत सैन्य और अर्धसैनिक संरचना है। ईरान की राजनीतिक संस्कृति में व्यवस्था की स्थिरता सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन के समय भी संस्थाएँ सक्रिय रहती हैं और शक्ति का हस्तांतरण नियंत्रित ढंग से होता है।
अयातुल्ला खामनेई को ईरान की इस्लामी क्रांति की वैचारिक धारा का दृढ़ समर्थक माना जाता था। वे अमेरिका को अक्सर वैश्विक अहंकार और ईरान विरोधी प्रतिबंधों व हस्तक्षेपों के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे। इज़राइल को उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता का स्रोत बताया और फ़िलिस्तीन के समर्थन को ईरान की स्थायी नीति बनाया। वे भले ही मारे गए हो लेकिन जब तक खामनेई जैसे मानसिक रूप से तैयार और अमेरिका तथा इजराइल के प्रति घृणा से भरे हुए 88 धर्म गुरुओं के हाथों में देश की सत्ता और प्रशासन का संचालन है, ईरान लड़ता रहेगा। जाहिर है खामनेई की मौत के बाद सब कुछ नहीं बदल जायेगा,अभी यह लड़ाई लम्बी चलेगी। Edited by : Sudhir Sharma