Publish Date: Sat, 14 Feb 2026 (14:23 IST)
Updated Date: Sat, 14 Feb 2026 (16:26 IST)
Tarique Rahman Bangladesh: बांग्लादेश की राजनीति में 12 फरवरी 2026 का दिन एक नए युग की शुरुआत के रूप में दर्ज हो गया है। आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के चेयरमैन तारिक़ रहमान अब देश की कमान संभालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 17 साल के लंबे लंदन निर्वासन के बाद उनकी वतन वापसी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही।
25 दिसंबर 2025 को जब रहमान ढाका एयरपोर्ट पर उतरे, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी मिट्टी को नंगे पैर महसूस किया—यह एक भावुक संकेत था कि वे अपनी जड़ों से फिर जुड़ गए हैं। उन्होंने ढाका-17 और बोगुरा-6, दोनों ही महत्वपूर्ण सीटों से चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता साबित कर दी है।
'डार्क प्रिंस' की छवि और संघर्ष का सफर
तारिक रहमान का सफर कांटों भरा रहा है। 2005 में विकिलीक्स ने उन्हें 'द डार्क प्रिंस' कहा था और उनकी छवि एक कठोर नेता की बनाई गई थी। 2007 में जेल के दौरान उन्हें भीषण यातनाएं दी गईं, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई। शेख हसीना के 15 साल के शासन के दौरान उन पर भ्रष्टाचार और पाकिस्तान-परस्त होने के आरोप लगे, जिन्हें रहमान ने अपनी वापसी के बाद सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में अपने पिता जनरल जिया-उर-रहमान के बलिदान को याद दिलाते हुए एक 'समावेशी बांग्लादेश' का वादा किया है।
5 बड़े नतीजे : भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
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स्थिरता की चाह : 60% मतदान ने दिखाया कि जनता अराजकता के बजाय अनुभव पर भरोसा करती है। उन्होंने छात्र नेताओं के बजाय एक स्थापित पार्टी (बीएनपी) को चुना।
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जमात-ए-इस्लामी का उभार : जमात का दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनना भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है। जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने साफ किया है कि वे नई सरकार पर 'नजर रखेंगे'।
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छात्र आंदोलन की विफलता : जिन युवाओं ने हसीना सरकार को उखाड़ फेंका, वे चुनावी राजनीति में विफल रहे। यह साबित हुआ कि सड़क पर क्रांति और सरकार चलाना अलग बातें हैं।
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कांटों भरा ताज : रहमान को भ्रष्टाचार के पुराने दाग धोने होंगे और एक मजबूत विपक्ष (जमात) के साथ संतुलन बिठाना होगा।
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भारत के लिए 'रीसेट' का मौका : पीएम नरेंद्र मोदी का बधाई संदेश एक नई शुरुआत का संकेत है। भारत को अब बीएनपी के साथ गंगा जल संधि और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर नए सिरे से बातचीत करनी होगी।
उल्लेखनीय है कि 'जुलाई चार्टर' के तहत होने वाले संवैधानिक बदलावों के कारण अब प्रधानमंत्री की शक्तियां पहले के मुकाबले कम हो सकती हैं, जिससे लोकतंत्र में संतुलन की उम्मीद बढ़ी है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala