Publish Date: Mon, 01 Jun 2026 (15:24 IST)
Updated Date: Mon, 01 Jun 2026 (15:36 IST)
China Nuclear Expansion: चीन के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक बार फिर वैश्विक चिंता बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters द्वारा विश्लेषित हालिया उपग्रह तस्वीरों में चीन के उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तानी इलाकों में तेजी से विकसित हो रहे विशाल सैन्य ढांचे का खुलासा हुआ है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मिसाइल तैनाती का विस्तार नहीं, बल्कि चीन की परमाणु युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव है।
तस्वीरों के अनुसार, चीन अपने परमाणु मिसाइल साइलो के आसपास लॉन्च पैड, भूमिगत बंकर, संचार केंद्र, हवाई रक्षा तंत्र और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सुविधाओं का विशाल नेटवर्क तैयार कर रहा है। ये वही साइलो हैं जिनमें चीन की लंबी दूरी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) तैनात की जाती हैं, जो अमेरिका के किसी भी शहर तक मार करने में सक्षम हैं। उल्लेखनीय है कि हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के दौरान दोनों के बीच काफी तल्खियां नजर आई थीं। ऐसे में चीन की इस योजना ने अमेरिका के भी कान खड़े कर दिए हैं।
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80 से अधिक लॉन्च पैड, हजारों वर्ग किलोमीटर में फैलता नेटवर्क
उपग्रह तस्वीरों में 80 से अधिक ऐसे लॉन्च पैड दिखाई दिए हैं जिनका इस्तेमाल मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यूनिट और कमांड सेंटर के रूप में किया जा सकता है। निर्माण का दायरा इतना व्यापक है कि यह पूरे रेगिस्तानी क्षेत्र में हजारों वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है।
हवाई स्थित रणनीतिक थिंक टैंक Pacific Forum के सहयोगी फेलो अलेक्जेंडर नील के अनुसार, “चीन केवल नए साइलो नहीं बना रहा, बल्कि वह अपने पूरे रणनीतिक परमाणु ढांचे को बहुस्तरीय सुरक्षा कवच दे रहा है। यह उसकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता में भारी विस्तार और विविधीकरण का संकेत है।”
क्या है सेकंड स्ट्राइक रणनीति?
परमाणु रणनीति में “Second Strike Capability” बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसका अर्थ है—यदि किसी देश पर पहले परमाणु हमला हो जाए, तब भी उसके पास इतना सैन्य ढांचा बचा रहे कि वह जवाबी परमाणु हमला कर सके। विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब अपनी इसी क्षमता को लगभग अजेय बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि उसके कुछ साइलो नष्ट भी हो जाएं, तब भी मोबाइल लॉन्चर, वैकल्पिक कमांड सेंटर और भूमिगत नेटवर्क उसकी जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित कर सकते हैं।
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चीन की न्यूनतम लेकिन विश्वसनीय परमाणु नीति
चीन लंबे समय से “Minimum but Credible Nuclear Deterrence” यानी “न्यूनतम लेकिन विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोध” की नीति का दावा करता रहा है। बीजिंग आधिकारिक तौर पर No First Use नीति की भी बात करता है, जिसके तहत वह पहले परमाणु हमला न करने का दावा करता है। लेकिन हाल के वर्षों में चीन की परमाणु गतिविधियों की रफ्तार ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है। शिनजियांग और गांसु प्रांत में तेजी से बन रहे साइलो नेटवर्क को विशेषज्ञ PLA (Peoples Liberation Army) के जमीनी परमाणु बलों का भविष्य मान रहे हैं।
ताइवान तनाव और अमेरिका-चीन परमाणु प्रतिस्पर्धा
यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। पश्चिमी रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ताइवान को लेकर सैन्य टकराव होता है, तो चीन परमाणु प्रतिरोध की शक्ति का इस्तेमाल बाहरी हस्तक्षेप रोकने के लिए कर सकता है।
एशिया-प्रशांत में बदलता सामरिक संतुलन
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का यह परमाणु विस्तार केवल सैन्य आधुनिकीकरण नहीं है, बल्कि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सामरिक संतुलन को बदलने वाला कदम हो सकता है। इससे अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की सुरक्षा रणनीतियों पर भी असर पड़ सकता है। यदि यह निर्माण इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में दुनिया एक नए परमाणु संतुलन और संभवतः नए शीत युद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकती है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मिसाइल तैनाती का विस्तार नहीं, बल्कि चीन की परमाणु युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव है।
तस्वीरों के अनुसार, चीन अपने परमाणु मिसाइल साइलो के आसपास लॉन्च पैड, भूमिगत बंकर, संचार केंद्र, हवाई रक्षा तंत्र और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सुविधाओं का विशाल नेटवर्क तैयार कर रहा है। ये वही साइलो हैं जिनमें चीन की लंबी दूरी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) तैनात की जाती हैं, जो अमेरिका के किसी भी शहर तक मार करने में सक्षम हैं। उल्लेखनीय है कि हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के दौरान दोनों के बीच काफी तल्खियां नजर आई थीं। ऐसे में चीन की इस योजना ने अमेरिका के भी कान खड़े कर दिए हैं।
80 से अधिक लॉन्च पैड, हजारों वर्ग किलोमीटर में फैलता नेटवर्क
उपग्रह तस्वीरों में 80 से अधिक ऐसे लॉन्च पैड दिखाई दिए हैं जिनका इस्तेमाल मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यूनिट और कमांड सेंटर के रूप में किया जा सकता है। निर्माण का दायरा इतना व्यापक है कि यह पूरे रेगिस्तानी क्षेत्र में हजारों वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है।
हवाई स्थित रणनीतिक थिंक टैंक Pacific Forum के सहयोगी फेलो अलेक्जेंडर नील के अनुसार, “चीन केवल नए साइलो नहीं बना रहा, बल्कि वह अपने पूरे रणनीतिक परमाणु ढांचे को बहुस्तरीय सुरक्षा कवच दे रहा है। यह उसकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता में भारी विस्तार और विविधीकरण का संकेत है।”
क्या है सेकंड स्ट्राइक रणनीति?
परमाणु रणनीति में “Second Strike Capability” बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसका अर्थ है—यदि किसी देश पर पहले परमाणु हमला हो जाए, तब भी उसके पास इतना सैन्य ढांचा बचा रहे कि वह जवाबी परमाणु हमला कर सके। विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब अपनी इसी क्षमता को लगभग अजेय बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि उसके कुछ साइलो नष्ट भी हो जाएं, तब भी मोबाइल लॉन्चर, वैकल्पिक कमांड सेंटर और भूमिगत नेटवर्क उसकी जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित कर सकते हैं।
चीन की न्यूनतम लेकिन विश्वसनीय परमाणु नीति
चीन लंबे समय से “Minimum but Credible Nuclear Deterrence” यानी “न्यूनतम लेकिन विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोध” की नीति का दावा करता रहा है। बीजिंग आधिकारिक तौर पर No First Use नीति की भी बात करता है, जिसके तहत वह पहले परमाणु हमला न करने का दावा करता है। लेकिन हाल के वर्षों में चीन की परमाणु गतिविधियों की रफ्तार ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है। शिनजियांग और गांसु प्रांत में तेजी से बन रहे साइलो नेटवर्क को विशेषज्ञ PLA (Peoples Liberation Army) के जमीनी परमाणु बलों का भविष्य मान रहे हैं।
ताइवान तनाव और अमेरिका-चीन परमाणु प्रतिस्पर्धा
यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। पश्चिमी रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ताइवान को लेकर सैन्य टकराव होता है, तो चीन परमाणु प्रतिरोध की शक्ति का इस्तेमाल बाहरी हस्तक्षेप रोकने के लिए कर सकता है।
कुछ पश्चिमी राजनयिकों का मानना है कि बीजिंग अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं रहना चाहता, बल्कि वह अमेरिका के बराबर वैश्विक सामरिक शक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है।
एशिया-प्रशांत में बदलता सामरिक संतुलन
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का यह परमाणु विस्तार केवल सैन्य आधुनिकीकरण नहीं है, बल्कि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सामरिक संतुलन को बदलने वाला कदम हो सकता है। इससे अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की सुरक्षा रणनीतियों पर भी असर पड़ सकता है। यदि यह निर्माण इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में दुनिया एक नए परमाणु संतुलन और संभवतः नए शीत युद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकती है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala
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