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कोच्चि से 180 नौसैनिक और श्रीलंका से 84 शव लेकर उड़ी ईरानी 'मिस्टीरियस फ्लाइट', सीक्रेट रूट से अमेरिका-इजराइल को दिया चकमा!

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Iran Mission
ईरान ने एक बेहद जटिल मिशन के तहत भारत के कोच्चि में फंसे अपने 180 नौसैनिकों को सुरक्षित निकाल लिया है। ये सभी  नौसैनिक ईरानी युद्धपोत IRIS Lavan पर तैनात थे, जिसे तकनीकी खराबी के बाद भारत ने मानवीय आधार पर कोच्चि बंदरगाह में शरण दी थी।
 
सिर्फ जीवित नौसैनिक ही नहीं, बल्कि ईरान ने श्रीलंका से अपने 84 शहीद नौसैनिकों के पार्थिव शरीर भी वापस मंगा लिए हैं। ये  सैनिक अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी के टॉरपीडो हमले का शिकार हुए थे।

क्या हुआ था IRIS Dena के साथ?

ईरानी युद्धपोत IRIS Dena हाल ही में भारत में आयोजित नौसैनिक अभ्यास (Ex-Milan 2026) में हिस्सा लेकर लौट रहा था। 4 मार्च 2026 को श्रीलंका के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की परमाणु पनडुब्बी USS Charlotte ने इस पर हमला कर दिया। अमेरिकी टॉरपीडो हमले में यह जहाज महज कुछ ही मिनटों में समुद्र में  समा गया, जिसमें 84 नौसैनिकों की मौत हो गई।
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श्रीलंका और भारत का मानवीय रुख

युद्ध की स्थिति के बावजूद भारत और श्रीलंका ने तटस्थ रहते हुए ईरानी नौसैनिकों की मदद की:
  • भारत (कोच्चि) : IRIS Lavan में खराबी आने के बाद भारत ने उसे अपने बंदरगाह पर रुकने की अनुमति दी, जिससे वह  अमेरिकी हमले से बच गया।
  • श्रीलंका (गॉल/त्रिकोंमाली) : श्रीलंकाई नौसेना ने हमले के बाद 32 ईरानी सैनिकों को समुद्र से सुरक्षित बचाया और शहीद सैनिकों के शवों को सुरक्षित रखा। वहीं, ईरान का एक अन्य जहाज IRIS बुशहर अभी भी श्रीलंका के त्रिकोंमाली में मरम्मत के लिए खड़ा है।

चार्टर्ड विमान का खास रूट : सुरक्षा और कूटनीति

अमेरिका और इजराइल के साथ जारी युद्ध (Epic Fury) के बीच ईरान ने अपने सैनिकों को वापस ले जाने के लिए एक खास हवाई मार्ग चुना ताकि वे दुश्मन की रडार और संभावित हमले से बचे रहें:
  • श्रीलंका (मट्टाला एयरपोर्ट) : विमान ने सबसे पहले श्रीलंका से 84 शवों को लिया।
  • भारत (कोच्चि) : यहां से 180 जीवित नौसैनिकों को विमान में बिठाया गया।
  • हवाई मार्ग: विमान भारत के हवाई क्षेत्र से होते हुए पाकिस्तान, फिर अफगानिस्तान के ऊपर से गुजरा।
  • कैस्पियन सागर पार : अजरबैजान की सीमा को छूते हुए यह विमान अंततः आर्मेनिया पहुंचा, जहां से से सड़क मार्ग या अन्य सुरक्षित रास्तों से उन्हें ईरान ले जाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने इस रूट का चुनाव इजराइली एयर डिफेंस और अमेरिकी निगरानी से बचने के लिए किया है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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