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क्या थम जाएगा ईरान-अमेरिका युद्ध? होर्मुज खोलने वाले ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’ पर टिकी दुनिया की नजर

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Iran USA War Ceasefire
Iran USA War Ceasefire: पश्चिम एशिया में कई हफ्तों से जारी ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच सोमवार को युद्धविराम की संभावना तेज़ हो गई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान दोनों को एक ऐसा शांति प्रस्ताव सौंपा गया है, जिसमें तत्काल संघर्ष विराम, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और अगले 15 से 20 दिनों में व्यापक समझौते की रूपरेखा शामिल है। दरअसल, ट्रंप की डेडलाइन मंगलवार को खत्म होने वाली है। दूसरी ओर, ईरान ने इस बात की पुष्टि तो की है कि उसे पाकिस्तान की ओर से प्रस्ताव मिला है, लेकिन अभी उसने युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। 
 
सूत्रों के अनुसार, प्रस्ताव दो चरणों में तैयार किया गया है। पहले चरण में दोनों पक्षों से तुरंत सैन्य कार्रवाई रोकने और समुद्री मार्गों पर सामान्य आवाजाही बहाल करने की बात कही गई है। अगर इस पर सहमति बनती है, तो सोमवार से युद्धविराम लागू हो सकता है। इसके बाद दूसरे चरण में इस्लामाबाद में आगे की बातचीत के जरिए स्थायी राजनीतिक और सुरक्षा समझौते पर काम होगा।

क्या प्रस्ताव का अहम हिस्सा

इस पूरे प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलना माना जा रहा है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। हाल के हफ्तों में इस मार्ग के बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया और कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी।
 
रॉयटर्स की रिपोर्ट कहती है कि कूटनीतिक सूत्रों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि आज ही सभी बिंदुओं पर सहमति बनना जरूरी है। देरी होने पर सैन्य तनाव और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं। हालांकि, ईरान ने अस्थायी युद्धविराम के दौरान होर्मुज को खोलने पर कुछ आपत्तियां जताई हैं, जिससे बातचीत अभी भी संवेदनशील मोड़ पर बनी हुई है।

पहल में पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण

इस पहल में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के साथ संपर्क में रहकर इस प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने में मदद की। इसे अनौपचारिक तौर पर 'इस्लामाबाद अकॉर्ड' कहा जा रहा है। प्रस्ताव में आगे चलकर प्रतिबंधों में राहत, ईरान की जमी हुई संपत्तियों की रिहाई और परमाणु कार्यक्रम पर आश्वासन जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
 
अगर सोमवार तक यह समझौता लागू हो जाता है, तो इसका असर केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों, समुद्री बीमा, खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
 

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