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बड़ा खुलासा : इजराइली सेना के हौसले पस्त, IDF Commanders ने दी 10 बड़े संकट की चेतावनी!

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Israeli Military Crisis
Israeli Military Crisis: इजराइल और मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जिसकी कल्पना शायद इजराइली सरकार ने भी नहीं की थी। अब तक अपनी अजेय शक्ति के लिए जानी जाने वाली इजराइल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के भीतर से ही विद्रोह और थकान की आवाजें उठने लगी हैं।
 
हाल ही में इजराइली सेना के चीफ ऑफ स्टाफ, लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने सुरक्षा कैबिनेट की बैठक में जो कहा, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। उन्होंने सीधे शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाओं में से एक इजराइली सेना ‘खुद में ढह सकती है’।

क्या हैं वे ‘10 चेतावनियां’ (Red Flags)?

जनरल ज़मीर ने कैबिनेट के सामने 10 बड़े संकटों का जिक्र किया, जिन्हें उन्होंने 'लाल झंडियां' कहा है। हालांकि सभी 10 बिंदुओं का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन मुख्य चिंताएं ये हैं:
 
सैनिकों की भारी कमी : गाजा, लेबनान और ईरान के साथ सीधे युद्ध के कारण जनशक्ति (Manpower) खत्म हो रही है।
कानूनी ढांचा ढहना : नया भर्ती कानून और अनिवार्य सेवा विस्तार कानून न होने से सेना पंगु हो रही है।
रिजर्विस्टों की थकान : जो सैनिक रिजर्व में थे, वे अब अपनी क्षमता से अधिक सेवा दे चुके हैं।
मानसिक और शारीरिक थकान : लंबे समय तक मोर्चे पर रहने से सैनिकों का मनोबल गिर रहा है।
 
लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर का कहना है कि बिना नए कानूनों के जल्द ही IDF अपने नियमित मिशनों के लिए तैयार नहीं रहेगी और हमारा रिजर्व सिस्टम पूरी तरह टूट जाएगा। 

थकान का संकट : जब योद्धा ही हार मानने लगें

इजराइली सेना की रीढ़ उसके रिजर्विस्ट (रिजर्व सैनिक) होते हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से इनकी स्थिति दयनीय हो गई है:
  • बार-बार तैनाती : कई सैनिक छठी या 7वीं बार युद्ध के मैदान में भेजे जा चुके हैं।
  • आर्थिक मार : महीनों तक ड्यूटी पर रहने के कारण कई सैनिकों की नौकरियां चली गईं और उनके व्यवसाय ठप हो गए।
  • पारिवारिक संकट : एक रिजर्विस्ट ने यनेट न्यूज को बताया कि हम बाहर तो लड़ ही रहे हैं, लेकिन असली लड़ाई घर के भीतर लड़नी पड़ रही है। परिवार बिखर रहे हैं।
इसी थकान का नतीजा है कि कई सैनिकों ने अब ड्यूटी पर रिपोर्ट करने से इनकार करना शुरू कर दिया है।
 

ईरान और लेबनान : ‘बहु-मोर्चे’ की दोहरी मार

फरवरी 2026 के बाद से इजराइल के लिए मुश्किलें और बढ़ गई हैं। अब यह सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं है:
  • ईरान : सीधे हवाई हमलों और जवाबी कार्रवाई का दबाव।
  • लेबनान : हिजबुल्लाह के साथ जमीनी संघर्ष।
  • अन्य मोर्चे : सीरिया, वेस्ट बैंक और यमन से लगातार मिल रही चुनौतियां।
सेना को एक साथ 5 से 6 मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है, जिससे संसाधनों और रसद (Logistics) पर भारी दबाव है।

राजनीतिक घमासान : अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स विवाद

सेना में सैनिकों की कमी का एक बड़ा कारण राजनीतिक भी है। इजराइल में अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (Haredim) समुदाय को सैन्य सेवा से छूट मिली हुई है।
 
नाराजगी : जहां आम इजराइली अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, वहीं एक बड़े वर्ग को छूट मिलने से समाज और सेना में भारी असंतोष है। यायर लापिड (विपक्ष नेता) का कहना है कि यह छूट देश की सुरक्षा के बजाय राजनीतिक हितों के लिए दी जा रही है।

क्या होगा आगे?

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सैन्य सेवा की अवधि बढ़ाने और बजट बढ़ाने का आश्वासन तो दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पैसा थके हुए सैनिकों की जगह ले सकता है? इजराइल इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसे अपनी सैन्य रणनीति और आंतरिक सामाजिक नीतियों पर फिर से विचार करना होगा। अगर '10 चेतावनियों' को नजरअंदाज किया गया, तो इजराइल की सुरक्षा के लिए खतरा बाहरी दुश्मनों से ज्यादा आंतरिक 'सिस्टम कोलैप्स' से हो सकता है। (अलजजीरा में साइमन स्पीकमैन की रिपोर्ट पर आधारित)
 

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