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जर्मन मांस उद्योग में नौकरियों का गोरख धंधा, भारतीय भी प्रभावित

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Massive Extortion in Name of Jobs in German Meat Industry
जर्मनी के मांस उद्योग में कर्मचारियों की भारी कमी है। भारत, चीन और वियतनाम जैसे देशों से नए कर्मचारी भर्ती किए जा रहे हैं, पर नौकरी के नाम पर उनसे भारी रकमें वसूली जाती हैं। कर्ज़ में डूबे विदेशी श्रमिक जर्मनी पहुंचने पर बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहने और काम करने के लिए विवश हो जाते हैं।

वे अधिकतर भारत और वियतनाम जैसे तृतीय देशों के ऐसे युवा पुरुष हैं, जो रोज़गार पाने की लालच में जर्मनी जाते हैं। जर्मनी में कोई काम-धंधा पाने की संभावना उन देशों के लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करती है, जहां जर्मनी की तुलना में बहुत कम वेतन मिलते हैं, किंतु यूरोप के इस संपन्न देश में रहने और कमाने का सपना, भारत, चीन या वियतनाम जैसे देशों के लोगों के लिए एक भयावह छलावा सिद्ध होने लगा है: प्रायः वे नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसियों पर निर्भरता की शोषणकारी जटिलताओं में फंस जाते हैं। बिचौलिया एजेंसिंया चार से पांच अंकों वाली फ़ीस मांगती हैं

जर्मनी में नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसिंया, कुशलकर्मी या मौसमी कामगारों वाले वीज़ा पर जर्मनी जाने से पहले, भावी नौकरियों के लिए चार से पांच अंकों वाली एक फ़ीस मांगती हैं। यह फ़ीस अधिकतर ऐसे कर्ज़ के रूप में होती है, जिसे चुकाने के लिए जर्मनी में कभी-कभी वर्षों तक काम करना पड़ सकता है। 'एआरडी' जर्मनी का सबसे बड़ा सार्वजनिक टेलीविज़न प्रसारक है। उसकी राजनीतिक पत्रिका 'मॉनिटर' द्वारा भारत और वियतनाम में की गई एक जांच से पता चला है कि जर्मन मांस उद्योग के लिए एशिया में कर्मचारी चुनने वाली एजेंसियां, लगातार सस्ते श्रमिकों को यूरोप की ओर आकर्षित कर रही हैं और खूब कमाई कर रही हैं।
 
'वेस्टफ्लाइश' जर्मनी में मांस उद्योग की एक बड़ी और नामी कंपनी है। उसमें काम करने के लिए पिछले साल भारत के केरल राज्य से जर्मनी आए एक युवक ने 'मॉनिटर' को बतायाः मेरे लिए मेरे परिवार ने अपना सारा सोना बेच दिया। यह कोई अकेला मामला नहीं है।

जर्मनी पहुंचे 'वेस्टफ्लाइश' के कई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें इस कंपनी में नौकरी पाने के लिए ऊंची रकमें चुकानी पड़ी हैं। यह शिकायत करने वालों में भारतीय ही नहीं, वियतनामी भी शामिल हैं। वियतनामियों में से एक ने कहाः हमारी शादी के बाद मेरे और मेरी पत्नी के पास कुछ पैसे बचे थे। बाकी पैसे मैंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और भाई-बहनों से उधार लिए।

'वेस्टफ्लाइश' कंपनी ने स्वीकार किया है कि एशिया में नए कर्मचारियों की भर्ती करने वाली एजेंसियों ने 15,000 यूरो (1 यूरो=111रुपए) तक का शुल्क वसूला है। कंपनी ने कहा कि मांगी गई रकमें उसके अपने मूल्यों के “बिल्कुल विपरीत है।...हम इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हैं; एक नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।


भर्ती कुशलकर्मी के तौर पर, वेतन अकुशल श्रमिकों जैसा

जर्मनी जाने का कुशलकर्मी वीज़ा पाने के लिए श्रमिकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता प्रमाणित करनी होती है, तभी वे जर्मनी में कसाई के रूप में काम कर सकते हैं। इस योग्यता के लिए कसाई बनने का बाक़ायदा मान्यता प्राप्त शिक्षण-प्रशिक्षण मिला होना चाहिए। हालांकि 'मॉनिटर' द्वारा जांची गई वेतन-पर्चियों से पता चला कि 'वेस्टफ्लाइश' कंपनी में उन्हें केवल 'उत्पादन सहायक' के तौर पर वेतन दिया जाता है। पूछताछ करने पर 'वेस्टफ्लाइश' कंपनी का कहना था कि वह सभी कानूनी नियमों का पालन करती है।

कहने के लिए तो कसाई का काम करने वाले श्रमिकों को प्रति घंटे 14.50 यूरो के हिसाब से, पूरे महीने प्रतदिन 8 घंटे काम के लिए कुल मिलाकर 2320 यूरो वेतन मिलना चाहिए, पर जर्मनी में लागू आयकर तथा स्वास्थ्य, पेंशन, बेरोज़गारी, नर्सिंग और दुर्घटना जैसे समयों के लिए अनिवार्य बीमा नियमों के कारण महीने के अंत में 1700 यूरो ही मिल सकते हैं। मांस उद्योग के श्रमिकों के आवास के किराए और परिवहन आदि का ख़र्च काट कर अंत में उन्हें 1300 यूरो के आसपास ही वेतन मिल पाता है।


किसी भी समय बर्ख़ास्तगी

'एआरडी' के 'मॉनिटर' कार्यक्रम के पत्रकार, जर्मन मांस उत्पादी कंपनियों के लिए श्रमिकों की भर्ती करने वाली दक्षिणी जर्मनी की एक एजेंसी के साथ अपनी पहचान छिपाते हुए हफ्तों तक गोपनीय संपर्क बनाए रखने में सफल रहे। अतीत में वह एजेंसी 'वेस्टफ्लाइश' कंपनी के लिए भी अन्य देशों देशों से 100 से अधिक लोगों की भर्ती कर चुकी है। गोपनीय पत्रकारों से बातचीत में इस दूसरी एजेसी के प्रबंध-निदेशक ने बताया कि तीसरे देशों से आए श्रमिकों को किसी भी समय (यहां तक कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के बाद भी) बर्ख़ास्त किया जा सकता है।

'मॉनिटर' की खोज के अनुसार, अन्य देशों में सस्ते श्रमिकों की भर्ती करने वाली इस दूसरी एजेंसी के ग्राहकों में मांस उद्योग की अन्य कंपनियां भी शामिल थीं, जिनमें जर्मन मांस उद्योग की दिग्गज कंपनी 'टॉनीज़' (अब 'प्रीमियम फ़ूड ग्रुप') भी शामिल है। इस कंपनी का कहना है कि उसके यहां श्रमिकों की भर्ती 'पूरी तरह से कानून के अनुसार', की जाती है। उसके कहने के अनुसार, भारत से भर्ती किए गए उसके सभी श्रमिक आज भी काम कर रहे हैं।


बीमारी के कारण भी बर्ख़ास्तगी?

अन्य भारतीय श्रमिकों ने बताया कि उन्हें परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान बीमारी के कारण बर्खास्त कर दिया गया। इस नियुक्ति प्रणाली में नियोक्ता अक्सर आवास भी प्रदान करता है और किराया सीधे श्रमिकों के वेतन से काट लेता है, इसलिए उन्हें अपने रहने-सोने के कमरे भी खाली करने पड़े। एक पूछताछ के जवाब में' वेस्टफ्लाइश' ने कहा कि अतीत में कुछ मामलों में... कर्मचारियों के साथ सहयोग समाप्त कर दिया गया है। 'कंपनी की नई योजना' विशेष रूप से प्रभावित कर्मचारियों के लिए वित्तीय सहायता पैकेज स्थापित कर की है।

'मॉनिटर' ने अपनी जांच में पाया कि 'वेस्टफ्लाइश' कंपनी ने वियतनाम में भर्ती किए गए कर्मचारियों से खुद भर्ती-शुल्क वसूला था। कंपनी ने माना कि अस्थायी रूप से ऐसा भी हुआ है, लेकिन ऐसा वियतनाम में प्रचलित और कानूनी रूप से मान्य नियमों का पालन करते हुए हुआ। वे शुल्क 'उचित और न्यायसंगत' थे। उनमें अन्य बातों के अलावा जर्मन भाषा के पाठ्यक्रम का ख़र्च भी शामिल था।


मानवीय गरिमा का उल्लंघन

जर्मन मांस उद्योग अतीत में अपने श्रमिकों के शोषण और उनकी भर्ती के लिए ठेकेदारों को माध्यम बनाने के कारण सुर्खियों में रहा है। उस समय सुधार के कई वादे किए गए थे। राजनेताओं ने कड़े कानून बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। इस क्षेत्र में ऐसे तथाकथित 'सेवा-अनुबंधों' (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनके अधीन कर्मचारियों को सीधे मांस कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि ठेकेदारों द्वारा नियोजित किया जाता था।

मांस कंपनियों द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त किया जाना था। जर्मनी के सबसे अधिक जनसंख्या वाले नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया राज्य के श्रममंत्री, कार्ल-योज़ेफ लाउमान ने उस समय मांस उद्योग की स्थिति को 'संगठित गैरजि़म्मेदा' के रूप में वर्णित किया था।

किंतु उन्हीं लाउमान को आज के कानूनी ढांचे में बदलाव का कोई कारण नहीं दिखता। वे कहते हैं, यदि (विदेशी) कर्मचारियों को योग्य रोज़गार नहीं दिया जाता या उनके आने के बाद उन्हें वेतन नहीं दिया जाता, तो यह कानून का उल्लंघन है। लेकिन इस उल्लंघन को रोकने के लिए क़ानून में किसी संशोधन की या कोई नया क़ानून बनाने की आवश्‍यकता वे नहीं देखते।

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