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लड़ाई अमेरिका की, मुनाफा रूस का! मध्य-पूर्व संकट और वैश्विक तेल राजनीति का नया समीकरण

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Global Oil Politics: वैश्विक राजनीति में एक पुरानी कहावत अक्सर दोहराई जाती है—जब हाथी लड़ते हैं तो घास कुचलती है। लेकिन आज की जियोपॉलिटिक्स में यह समीकरण बदलता दिख रहा है। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, विशेषकर ईरान-इज़राइल और अमेरिका टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच एक नया आर्थिक परिदृश्य उभर रहा है: युद्ध का केंद्र भले ही मध्य-पूर्व हो, लेकिन उसके आर्थिक झटके और लाभ दुनिया के दूसरे हिस्सों में महसूस किए जा रहे हैं।
 
तेल बाज़ार इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मंच बन गया है। इतिहास गवाह है कि जब भी मध्य-पूर्व में अस्थिरता बढ़ती है, वैश्विक ऊर्जा बाज़ार तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। तेल की कीमतें बढ़ती हैं, आपूर्ति पर अनिश्चितता बढ़ती है और ऊर्जा निर्यातक देशों की आय अचानक उछल जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। लेकिन इस बार कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है—पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के बावजूद रूस, जो खुद एक प्रमुख तेल निर्यातक है, वैश्विक ऊर्जा बाजार में अप्रत्याशित रूप से मजबूत स्थिति में दिख रहा है।

भू-राजनीतिक तनाव और तेल बाजार का गणित

वैश्विक तेल बाज़ार का गणित अपेक्षाकृत सरल है: जितनी अधिक भू-राजनीतिक अनिश्चितता, उतनी ही अधिक कीमतों में उछाल की संभावना। मध्य-पूर्व दुनिया के ऊर्जा तंत्र का केंद्रीय क्षेत्र है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। इसके अलावा, फारस की खाड़ी का होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से रोज़ाना लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। यह विश्व तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा है।
 
ऐसे में यदि क्षेत्रीय संघर्ष या सैन्य तनाव बढ़ता है, तो बाजार तुरंत यह मानकर चलता है कि आपूर्ति बाधित हो सकती है। परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में तेजी आती है। अंतरराष्ट्रीय निवेश प्रबंधन कंपनी वैनगार्ड की मुख्य अर्थशास्त्री कियान वांग के अनुसार, तेल कीमतों में अचानक बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था में 'आय के पुनर्वितरण' का काम करता है। दूसरे शब्दों में, जब तेल महंगा होता है तो ऊर्जा आयातक देशों की लागत बढ़ जाती है, जबकि निर्यातक देशों की कमाई तेजी से बढ़ती है।

ऊर्जा निर्यातक देशों की अप्रत्याशित कमाई

इस ऊर्जा झटके का सबसे बड़ा लाभ तेल निर्यातक देशों को मिलता है। नॉर्वे, कनाडा, नाइजीरिया और कोलंबिया जैसे देश, जिनकी अर्थव्यवस्था आंशिक रूप से तेल निर्यात पर निर्भर है, उच्च कीमतों के दौर में अतिरिक्त राजस्व अर्जित करते हैं। भले ही इन देशों को भी वैश्विक मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ता है, लेकिन तेल निर्यात से होने वाली आय अक्सर उस आर्थिक दबाव की भरपाई कर देती है।
 
इतिहास में भी यह पैटर्न कई बार देखा गया है। 1973 के अरब तेल प्रतिबंध से लेकर 2008 के ऊर्जा संकट और 2022 के यूक्रेन युद्ध तक, तेल कीमतों में उछाल ने हमेशा ऊर्जा निर्यातक देशों को वित्तीय लाभ दिया है। लेकिन, वर्तमान संकट में जिस देश का नाम सबसे अधिक चर्चा में है, वह रूस है।
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प्रतिबंधों के बावजूद रूस की ऊर्जा ताकत

2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इनमें तेल व्यापार पर मूल्य सीमा (price cap), वित्तीय प्रतिबंध और परिवहन प्रतिबंध शामिल थे। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को कम करना था, क्योंकि तेल और गैस रूस की अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं।
 
हालांकि वास्तविकता अपेक्षाओं से अधिक जटिल साबित हुई। रूस ने तेजी से अपने ऊर्जा निर्यात का रुख यूरोप से एशिया की ओर मोड़ दिया। भारत और चीन जैसे देशों ने भारी मात्रा में रूसी कच्चे तेल की खरीद शुरू कर दी, जो अक्सर पश्चिमी बेंचमार्क कीमतों से छूट पर उपलब्ध था।
 
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के इतिहासकार और प्रतिबंध विशेषज्ञ निकोलस मुल्डर इस स्थिति को प्रतिबंध नीति का एक 'विरोधाभास' बताते हैं। उनके अनुसार, वैश्विक तेल बाजार की प्रकृति ऐसी है कि आपूर्ति में मामूली बदलाव भी कीमतों को ऊपर धकेल देता है। परिणामस्वरूप, भले ही रूस कुछ बाजार खो देता है, लेकिन उच्च कीमतें उसकी कुल आय को स्थिर बनाए रख सकती हैं। 2023 और 2024 के दौरान रूस ने प्रतिदिन लगभग 70 से 80 लाख बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात जारी रखा। इससे स्पष्ट होता है कि ऊर्जा बाजार में उसकी भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है।

एशियाई बाजार और 'सैन्क्शन बाईपास' की राजनीति

रूस की ऊर्जा रणनीति का एक प्रमुख आधार एशियाई बाजार रहे हैं। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत थी। लेकिन 2024 तक यह बढ़कर कई महीनों में 35–40 प्रतिशत तक पहुंच गई। 
 
भारत के लिए यह सौदा आर्थिक रूप से लाभकारी रहा क्योंकि रूसी तेल अक्सर अंतरराष्ट्रीय कीमतों से छूट पर उपलब्ध था। दूसरी ओर, रूस के लिए यह एशियाई बाजार उसके ऊर्जा निर्यात के लिए एक वैकल्पिक रास्ता बन गया। यह स्थिति पश्चिमी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाती है। आलोचकों का तर्क है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार इतना परस्पर जुड़ा हुआ है कि किसी बड़े उत्पादक को पूरी तरह अलग करना लगभग असंभव है।

क्या तेल बाजार एक नए बहुध्रुवीय युग में प्रवेश कर चुका है?

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संकट वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है। शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक वैश्विक तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों का मजबूत प्रभाव रहा। लेकिन पिछले एक दशक में ऊर्जा व्यापार का भूगोल बदल गया है।
 
चीन और भारत जैसे एशियाई देशों की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ी है, जबकि रूस, सऊदी अरब और अन्य उत्पादक देश नए व्यापारिक गठजोड़ बना रहे हैं। कुछ विश्लेषकों के अनुसार यह बदलाव ऊर्जा बाजार को एक बहुध्रुवीय संरचना की ओर ले जा रहा है, जहां तेल व्यापार अब केवल पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था के नियंत्रण में नहीं रहेगा।

क्या रूस की बढ़त स्थायी है?

हालांकि वर्तमान स्थिति रूस के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल दिखाई देती है, लेकिन यह स्थायी नहीं भी हो सकती। यदि मध्य-पूर्व में तनाव कम होता है और वैश्विक आपूर्ति स्थिर रहती है, तो तेल कीमतों में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, ऊर्जा संक्रमण (energy transition) और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार से भी दीर्घकालिक मांग पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही पश्चिमी देशों की नीति भी बदल सकती है। अमेरिका और उसके सहयोगी यदि वैश्विक आपूर्ति बढ़ाने में सफल होते हैं, चाहे रणनीतिक भंडार जारी करके या नए उत्पादन को प्रोत्साहित करके तो ऊर्जा बाजार का संतुलन फिर बदल सकता है।

युद्ध, ऊर्जा और वैश्विक अर्थव्यवस्था

मध्य-पूर्व के मौजूदा संकट ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं होते, वे आर्थिक शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित करते हैं। आज जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा है, वैश्विक ऊर्जा बाजार उस अस्थिरता को कीमतों के माध्यम से प्रतिबिंबित कर रहा है। इस प्रक्रिया में कुछ देश आर्थिक रूप से कमजोर हो सकते हैं, जबकि कुछ अप्रत्याशित लाभ अर्जित कर सकते हैं।
 
रूस का उदाहरण इस जटिल वास्तविकता को स्पष्ट करता है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, वैश्विक तेल बाजार की संरचना ने उसे पूरी तरह अलग-थलग होने से बचा लिया है। इसलिए संभव है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा राजनीति वैश्विक जियोपॉलिटिक्स का सबसे निर्णायक क्षेत्र बन जाए—जहाँ युद्ध के मोर्चे कहीं और होंगे, लेकिन आर्थिक विजेता और पराजित कहीं और तय होंगे।

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