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रूस के तेल उत्पादन में गिरावट, भारत पर क्या होगा असर?

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Russia oil production drop
Russia oil production drop: रूस ने स्वयं सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उसके तेल उत्पादन में गिरावट आई है। हाल ही में रूस के उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में माना कि देश का मौजूदा तेल उत्पादन साल की शुरुआत के मुकाबले कम हुआ है।

क्या हैं गिरावट के कारण?

दरअसल, यूक्रेन द्वारा रूसी तेल रिफाइनरियों और निर्यात टर्मिनलों को निशाना बनाकर किए गए लगातार ड्रोन हमलों के कारण कई रिफाइनरियों में कामकाज ठप हुआ है और वे मरम्मत के दौर से गुजर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, हाल के महीनों में रूस का उत्पादन लगभग 4.6 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर गया है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और ओपेक प्लस (OPEC+) देशों के साथ उत्पादन में कटौती के समझौतों का असर भी इसकी उत्पादन क्षमता पर पड़ा है।

भारत पर इसका क्या असर होगा?

चूंकि भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग 35-40 प्रतिशत) रूस से सस्ते कच्चे तेल (Crude Oil) के रूप में आयात करता है, इसलिए वहां होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर भारत पर स्वाभाविक रूप से पड़ता है। जब रूस का उत्पादन कम होगा, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई कम होगी। इसके अलावा, ईरान और मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव (जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का संकट) के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही मजबूत बनी हुई हैं। ऐसे में रूस भारतीय रिफाइनरियों को मिलने वाले डिस्काउंट को कम कर सकता है, जिससे भारत के लिए रूसी तेल थोड़ा महंगा हो सकता है।
 
दूसरी ओर, रूस से भारत आने वाले तेल के बड़े हिस्से के लिए 'शैडो टैंकर' का इस्तेमाल होता है। रूस के निर्यात टर्मिनलों पर हमलों के कारण भारत को तेल की डिलीवरी मिलने में देरी हो सकती है, जिससे भारतीय तेल रिफाइनरियों को अन्य खाड़ी देशों (जैसे इराक, सऊदी अरब) या अमेरिका की तरफ दोबारा रुख करना पड़ सकता है।

रिफाइनरी कंपनियों के मुनाफे पर असर

इसका सबसे बड़ा असर रिफाइनरी कंपनियों पर हो सकता है। सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियां (जैसे IOCL, BPCL, रिलायंस) रूस से सस्ते दाम पर तेल खरीदकर उसे रिफाइन करती हैं और विदेशों में बेचकर मुनाफा कमाती हैं। रूस से कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने या डिस्काउंट घटने से इन कंपनियों के ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
 
हालांकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन भारत सरकार अक्सर घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए टैक्स और अन्य उपायों का इस्तेमाल करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत ज्यादा समय तक 90-95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो भारत में आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। 
 
हालांकि इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारत अभी भी रूस के लिए चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है। अकेले अप्रैल 2026 में भारत ने रूस से लगभग 5 अरब यूरो (करीब 45,000 करोड़ रुपए) मूल्य के हाइड्रोकार्बन खरीदे हैं, जिसमें 90% हिस्सेदारी कच्चे तेल की है। इससे साफ है कि गिरावट के बावजूद भारत और रूस के बीच तेल का व्यापार बेहद मजबूत स्थिति में है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
 

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