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रूस-तालिबान डिफेंस डील से उड़े पाकिस्तान के होश, भारत के लिए क्या हैं इसके कूटनीतिक मायने?

रूस के साथ इस डील से अफगानिस्तान की हवाई ताकत होगी मजबूत

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Russia-Taliban Defense Agreement
Russia-Taliban Defense Agreement: रूस और अफगानिस्तान के बीच समय का पहिया इस कदर घूमा है कि कभी एक-दूसरे के कड़े विरोधी रहे दोनों देश अब एक बड़े रक्षा समझौते (Defense Deal) के जरिए करीब आ गए हैं। मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ में रूस और तालिबान के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाने पर मुहर लगी है। इस कार्यक्रम में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब भी मौजूद थे। जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने के बाद, रूस द्वारा उठाया गया यह पहला इतना बड़ा सैन्य कदम है।
 
अमेरिका और ईरान के बीच डील कराने में व्यस्त पाकिस्तान के कूटनीतिक हलकों में भी हड़कंप मचा दिया है, वहीं भारत भी इस बदलते समीकरण पर पैनी नजर बनाए हुए है। इस डील को अमेरिका के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। दरअसल, जो अमेरिका बगराम पर एक बार फिर नियंत्रण चाहता था, उसकी बची-खुची उम्मीद भी इस डील के बाद खत्म हो जाएंगी। हालांकि तालिबान हमेशा से अमेरिका की इस मांग को ठुकराता रहा है। ALSO READ: ट्रंप के जाल में फंसे मुनीर, लश्कर की खुली चेतावनी, पाकिस्तान में भड़क सकता है गृहयुद्ध

पाकिस्तान की बढ़ी घबराहट

हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बयान दिया था कि तालिबान भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों को हवा दे रहा है। अब इस नई डिफेंस डील ने पाकिस्तान को दूसरा बड़ा झटका दिया है। पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते डूरंड लाइन (सीमा विवाद) और TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) को लेकर बेहद खराब दौर में हैं। पाकिस्तान अब तक तालिबान को सैन्य रूप से कमजोर मानकर उसकी सीमा में घुसकर एयरस्ट्राइक करता रहा है।
 
अगर इस डील के तहत रूस ने तालिबान को मिग (MiG), सुखोई (Sukhoi) फाइटर जेट या पैंटसिर और $S-400$ जैसा आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम दे दिया, तो पाकिस्तान की वायुसेना का दबदबा खत्म हो जाएगा। रूस की सैन्य सहायता मिलने से तालिबान बेहद मजबूत स्थिति में आ जाएगा, जिससे पाकिस्तान का उस पर दबाव बनाने का हर पैंतरा फेल साबित होगा। ALSO READ: पाकिस्तान की दुविधा: अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़े या दूर रहे?

दिल्ली के लिए क्यों अहम है यह समझौता?

भारत के नजरिए से देखा जाए तो अफगानिस्तान में रूस की यह सक्रियता पाकिस्तान को बैकफुट पर धकेलने वाली है। भारत ने हमेशा से अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता का समर्थन किया है, लेकिन पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट भारत की चिंता बढ़ाते रहे हैं। यदि रूस के सहयोग से तालिबान मजबूत होता है, तो पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पूरी तरह से अशांत और ब्लॉक हो जाएगी। पाकिस्तान को अपनी सेना का एक बड़ा हिस्सा अफगान बॉर्डर पर तैनात रखना पड़ेगा, जिससे कश्मीर या पूर्वी सीमा (भारत सीमा) पर उसका ध्यान और दखल कम होगा।

रूस का मुख्य उद्देश्य ISIS-K को रोकना  

रूस का मुख्य उद्देश्य ISIS-K जैसे आतंकी संगठनों को रोकना है, जो मध्य एशिया में अस्थिरता फैला रहे हैं। भारत भी लंबे समय से सीमा पार और क्षेत्रीय आतंकवाद का शिकार रहा है। ऐसे में यदि रूस और तालिबान मिलकर ISIS-K और अन्य आतंकी गुटों का सफाया करते हैं, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी फायदेमंद होगा।
 
इसके साथ ही भारत के रूस के साथ बेहद मजबूत और ऐतिहासिक रक्षा संबंध हैं। वहीं, भारत के तालिबान के साथ भी मानवीय सहायता और दूतावास स्तर पर कामकाजी संबंध बेहतर हुए हैं। इस लिहाज से मॉस्को और काबुल की नजदीकी भारत के लिए किसी बड़े खतरे की घंटी नहीं, बल्कि पाकिस्तान को नियंत्रित रखने का एक नया जरिया बन सकती है।

रूस और तालिबान का अपना-अपना स्वार्थ

इस समझौते से तालिबान को सबसे बड़ी चीज 'अंतरराष्ट्रीय वैधता' मिल रही है। साल 2021 में सत्ता संभालने के बाद जो तालिबान दुनिया में अलग-थलग था, उसे रूस के इस कदम से बड़ी कूटनीतिक संजीवनी मिली है। दूसरी तरफ, अमेरिका और नाटो (NATO) के जाने के बाद रूस इस क्षेत्र में पैदा हुए खालीपन को भरना चाहता है। रूस को डर है कि अफगानिस्तान में पनप रहा ISIS-K ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के रास्ते उसके अपने देश तक न पहुंच जाए। इसी वजह से रूस चाहता है कि तालिबान अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों पर अपना नियंत्रण मजबूत करे।
 
हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला यू-टर्न है। 1980 के दशक में सोवियत संघ (USSR) ने अफगानिस्तान पर हमला किया था और तब पाकिस्तान ने अमेरिका से पैसे और हथियार लेकर जिन मुजाहिदीन लड़ाकों को सोवियत सेना के खिलाफ खड़ा किया था, उन्हीं से बाद में तालिबान निकला। आज इतिहास बदल चुका है, अमेरिका और पाकिस्तान किनारे खड़े हैं और उसी जमीन पर रूस और तालिबान एक-दूसरे के रणनीतिक साझेदार बन रहे हैं।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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