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बांग्लादेश में फिर मचेगा घमासान? PM पद की शपथ के साथ ही तारिक रहमान के खिलाफ विद्रोह की आहट, नहीं चली मोहम्मद यूनुस की मनमानी

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PM oath Bangladesh
बांग्लादेश की राजनीति में आया बदलाव अब एक नए टकराव की ओर बढ़ रहा है। बीएनपी (BNP) नेता तारिक रहमान ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ तो ले ली है, लेकिन सत्ता संभालते ही उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां बीएनपी ने 'जुलाई चार्टर' से किनारा कर लिया है, वहीं दूसरी ओर सहयोगी दलों ने इसे 'विश्वासघात' करार देते हुए सड़कों पर उतरने की चेतावनी दी है।

संसद भवन में शपथ ग्रहण, लेकिन विवाद बरकरार

तारिक रहमान ने मंगलवार को बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और इसके साथ ही अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से बेदखल होने के बाद देश की बागडोर संभालने वाली अंतरिम सरकार के 18 महीने के शासन का अंत हो गया। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने रहमान (60) को परंपरा से हटते हुए, बंगभवन के बजाय जातीय संसद के ‘साउथ प्लाजा’ में पद की शपथ दिलाई। हालांकि, यह समारोह जितना भव्य था, इसके पीछे का राजनीतिक विवाद उतना ही गहरा है। 

नहीं चली मोहम्मद यूनुस की मनमानी 

BNP के इस कदम से यूनुस की उन कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इसके तहत वह संविधान को बदलना चाह रहे थे। बता दें कि इस काउंसिल का मकसद पार्लियामेंट चुनावों के साथ हुए रेफरेंडम के हिसाब से बांग्लादेश के संविधान को बदलना है। डेली स्टार की खबर के मुताबिक BNP MPs ने सिर्फ बांग्लादेश संसद के सदस्य के तौर पर शपथ ली। इसके बाद BNP के सांसदों ने सिर्फ बांग्लादेश संसद के सदस्य के तौर पर शपथ ली। BNP का कहना है कि कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल के नियम अभी मौजूदा संविधान का हिस्सा नहीं हैं और इस पर संसद में विचार-विमर्श की जरूरत है।  

जुलाई चार्टर पर हुआ था जनमत संग्रह

हालिया चुनावों के साथ ही बांग्लादेश में 'जुलाई चार्टर' पर जनमत संग्रह (Referendum) हुआ था, जिसे करीब 62% जनता का समर्थन मिला। इस चार्टर का उद्देश्य संविधान में सुधार करना है। विवाद तब शुरू हुआ जब तारिक रहमान और उनके सांसदों ने 'कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल' के सदस्य के रूप में शपथ लेने से साफ मना कर दिया। मीडिया खबरों के मुताबिक बीएनपी नेता सलाउद्दीन अहमद का कहना है कि यह चार्टर मौजूदा संविधान का हिस्सा नहीं है और इस पर संसद में गहन चर्चा की जरूरत है। पार्टी का आरोप है कि चार्टर बनाते समय उनसे सलाह नहीं ली गई थी।
 
जिस 'फासीवाद' शब्द का इस्तेमाल अवामी लीग और शेख हसीना के खिलाफ किया गया था, अब वही शब्द बीएनपी के खिलाफ इस्तेमाल होने लगा है। विपक्षी दलों का कहना है कि बीएनपी बहुमत के नशे में जनता की इच्छा (जुलाई चार्टर) को दरकिनार कर रही है।

जमात और NCP ने खोला मोर्चा 

बीएनपी के इस कदम से उनके पूर्व सहयोगी दल भड़क उठे हैं। जमात-ए-इस्लामी के उप प्रमुख सैयद अब्दुल्ला मुहम्मद ताहर और नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) ने इसे जनादेश का अपमान बताया है। उन्होंने आंदोलन की भी चेतावनी दी। यदि जुलाई चार्टर को लागू नहीं किया गया, तो देशभर में विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।  जहां जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी के सांसदों ने संसद और संविधान सभा दोनों की शपथ ली, वहीं बीएनपी ने केवल संसद सदस्य के रूप में शपथ लेकर अपनी मंशा साफ कर दी है। Edited by : Sudhir Sharma

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