Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

क्या 'चीन की दीवार' को नहीं देख पाएंगी आने वाली पीढ़ियां?

'चीन की दीवार' से लेकर 'ईस्टर आइलैंड' तक, कई मशहूर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरें जलवायु परिवर्तन के कारण संकट में हैं। क्या इन विश्व धरोहरों को बचाने की कोशिशें कामयाब हो पाएंगी?

Advertiesment
great wall of china
स्टुअर्ट ब्राउन
युद्ध और हिंसक संघर्ष, देशों की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरों के लिए लंबे समय से बड़ा खतरा रहे हैं। अब जलवायु परिवर्तन इन वैश्विक धरोहरों के लिए एक नया जोखिम बन गया है। तापमान में बढ़ोतरी, तेज तूफान और अधिक सूखे के कारण इराक के 4,000 साल पुराने पिरामिड मंदिरों से लेकर ईस्टर आइलैंड की प्राचीन मूर्तियों तक, कई यूनेस्को वैश्विक धरोहर स्थलों की हालत खराब हो रही है।
 
साल 2025 के हुए एक अध्ययन में सामने आया कि कुल वैश्विक धरोहरों में से लगभग 80 फीसदी जलवायु परिवर्तन की चपेट में हैं। लकड़ी और पत्थर जैसी चीजों से बनी इमारतें, लगातार गर्म हो रही दुनिया में खुद को ढाल नहीं पा रही हैं।
 

सभ्यता की शुरुआत: उर का जिगुरात

जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हजारों साल का इतिहास मिटने का डर भी बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार बढ़ रहा तापमान इराक के दक्षिणी इलाके के प्राचीन शहरों में मौजूद विश्व धरोहरों को तेजी से कटाव की ओर धकेल रहा है।
 
इराक का विख्यात 'उर का जिगुरात' एक 4,000 साल पुराना पिरामिडनुमा मंदिर है। इसे चंद्र देवता नन्ना के सम्मान में बनाया गया था। यह अब धीरे-धीरे जर्जर हो रहा है। तेजी से खिसक रहे रेत के टीले और तेज हवाएं इसके उत्तरी हिस्से को लगातार घिस रही हैं।
 
जमीन में बढ़ रहा खारा पानी भी इस प्राचीन मंदिर की लगातार खराब हो रही हालत के लिए जिम्मेदार है। खारे पानी की वजह से मिट्टी की बनी ईंटें घिस रही है। ये वैसी ही ईंटें हैं, जिनसे प्राचीन मेसोपोटामिया के मंदिर और धार्मिक स्थल भी बने हैं। ये कभी प्राचीन सुमेर सभ्यता का केंद्र हुआ करते थे, लेकिन आज मिटने की कगार पर हैं।
 
'दि कर' प्रांत के पुरातत्व विभाग के निरीक्षक काजेम हसन कहते बताते हैं, "ये नमक के ढेर ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से बने हैं।" प्राचीन रॉयल सिमेट्री ऑफ उर के बारे में बात करते हुए हसन ने बताया कि नमक, मिट्टी की ईंटों के पूरी तरह टूटने का कारण बन सकता है। क्योंकि, नमक के क्रिस्टल नींव में रिसकर अंदर फैलते हैं और छेद वाली चीजों को नुकसान पहुंचाते हैं।
 
फरात नदी के किनारे बसे प्राचीन शहर बेबीलोन के पुरातत्व स्थल भी खारे पानी के कारण कटाव की चपेट में हैं। पानी में बढ़ रहे खारेपन से प्राचीन मिट्टी की बनी संरचना प्रभावित हो रही है। सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में बना स्मारक 'निनमख' प्रजनन और सृजन की देवी को समर्पित है। इसकी मिट्टी से बनी ईंटों को नमक से बचाने के लिए पुरातत्व विशेषज्ञ 7,000 साल पुरानी तकनीक का इस्तेमाल कर नमक रहित मिट्टी की ईंटें बना रहे हैं।
 

ईरान की इसफहान मस्जिद

युद्ध तो ईरान के भव्य धार्मिक स्मारकों के लिए सबसे हालिया खतरा है। पिछले कई सालों से ईरानी शहर इसफहान में सदियों पुरानी मस्जिदें तेजी से बदलते जलवायु के कारण असुरक्षित होती जा रही हैं। 'फ्राइडे मस्जिद' के नाम से मशहूर 'मस्जिद-ए जामे' पिछली 12 सदियों में मस्जिदों की वास्तुकला में हुए विकास का एक अनोखा नमूना है।
 
इसे 841 ईस्वी में बनाना शुरू किया गया था और इसके बाद यह लगातार बनता ही गया। कभी कुछ दोबारा बना, तो कभी कुछ-न-कुछ सुधार होता रहा। यूनेस्को इसे "ईरानी वास्तुकला का संग्रहालय" मानता है। शानदार गुंबदों और बारीक नक्काशी से सजी यह मस्जिद ईरान, इराक और सीरिया में धार्मिक और शैक्षणिक वास्तुकला के लिए जीता-जागता नमूना बन गई।
 
इसके करीब ही एक बड़ा-सा पुराना चौराहा है, जिसे 'मेदान इमाम' के नाम से जानते हैं। यह 17वीं सदी में बना था, जिसके बीच में इमाम मस्जिद है। इस मस्जिद का मुंह मक्का की दिशा में है, यह अपने नीले गुंबद और सुंदर कैलिग्राफी के लिए दुनियाभर में मशहूर है। लेकिन अब यह ऐतिहासिक मस्जिद भी खतरे में है। लंबी अवधि के सूखे और भूजल की कमी से यहां की जमीन धीरे-धीरे धंस रही है। बहुत ज्यादा गर्मी और नमी भी इमारत को नुकसान पहुंचा रही है।
 
यूनेस्को ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, "यह धीमी, लेकिन खतरनाक प्रक्रिया 'इमाम मस्जिद' और 'मस्जिद-ए जामे' जैसी प्राचीन इमारतों पर भारी दबाव डाल रही है। इससे दरारें और अस्थिरता पैदा हो रही है और अगर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो ये इमारतें ढह सकती हैं।"
 

ईस्टर आइलैंड की प्राचीन मोआई मूर्तियां

'रपा नुई' या 'ईस्टर द्वीप' में मौजूद विश्व प्रसिद्ध मोआई मूर्तियां आने वाले 50 सालों के भीतर पानी में डूब सकती हैं। साल 2025 में हवाई विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन में यह आशंका सामने आई। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल 'रपा नुई नेशनल पार्क' के प्रसिद्ध सांस्कृतिक मंच 'आहु तोंगारिकी' में लगभग 800 साल पुरानी 15 मूर्तियां हैं। अध्ययन के अनुसार, यह जगह भी खतरे में है।
 
समुद्र का स्तर बढ़ने और बड़े मौसमी तूफानी लहरों के कारण ये मूर्तियां प्रभावित हो सकती हैं। यदि समुद्र के किनारों पर बाढ़ आती है, तो इस इलाके में मौजूद 51 सांस्कृतिक धरोहरें मुसीबत में पड़ सकती हैं। अध्ययन के मुख्य लेखक और हवाई विश्वविद्यालय के शोधकर्ता नोह पाओआ ने बताया, "यह शोध 'रपा नुई' की संस्कृति और लोगों की आजीविका पर मंडरा रहे एक गंभीर खतरे को उजागर करता है।"
 
पाओआ ने आगे कहा, "स्थानीय समुदाय के लिए ये जगह उनकी पहचान को बनाए रखने और परंपराओं को जीवित रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।" उनके मुताबिक, ये मूर्तियां द्वीप के पर्यटन उद्योग का "मुख्य केंद्र" भी हैं। पाओआ ने चेतावनी दी, "अगर इस खतरे को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह यूनेस्को वर्ल्ड हैरिटेज साइट की लिस्ट में इस द्वीप की मान्यता को भी खतरे में डाल सकता है।"
 

ग्रेट वॉल ऑफ चाइना

उत्तर-पश्चिम चीन में 21,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबाई में फैली यह दीवार, किले को सुरक्षित रखने के लिए बना किलाबंदी नेटवर्क है। इसे 2,000 सालों तक कई बार बनाया गया। साल 1987 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में दर्ज किया गया था।
 
यूनेस्को ने माना था कि इसका "ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व भी उतना ही है, जितना इसकी वास्तुकला का है।" कुछ चीनी  शोधकर्ताओं के अनुसार, यह दीवार अब तेजी से घिस रही है और जलवायु परिवर्तन की वजह घिसाव की गति कई गुना तेज हो गई है।
 
संबंधित अध्ययन में सामने आया कि चूंकि वॉल के कई हिस्से नम मिट्टी के मिश्रण से बने हैं, इसलिए दीवार के एक बड़े हिस्से पर "गंभीर नुकसान" का खतरा है। तेज हवाओं, भारी बारिश और खारे पानी के चलते इनके "चटकने, टूटने और ढहने" का खतरा है।
 
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि दीवार की कुल लंबाई का केवल छह फीसदी हिस्सा ही पूरी तरह सुरक्षित है। जबकि, करीब 52 फीसदी हिस्सा या तो पूरी तरह नष्ट हो चुका है या काफी खराब हालत में है। रिसर्चर इसे बचाने के लिए तत्काल संरक्षण के उपाय करने की जरूरत बताते हैं। दीवार पर मौजूद "बायोक्रस्ट" जैसे सुरक्षात्मक परत को मजबूत करना भी जरूरी है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

क्या अब पश्चिम एशिया में शुरू होगी परमाणु हथियारों की होड़?