भारत में घरेलू कामगारों के लिए अलग कानून पर हिचक क्यों?
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू सहायकों को न्यूनतम वेतन देने की याचिका पर कहा कि इससे हर घर कानूनी विवाद में फंसेगा। अदालत ने माना कि शोषण होता है, लेकिन इसके समाधान के और तरीके मौजूद हैं।
शिवांगी सक्सेना
शोभा कुमारी (बदला हुआ नाम) काम की तलाश में दस साल पहले बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल्ली आई थीं। तब से वह अपने पति के साथ शाहबाद डेरी की एक बस्ती में रह रही हैं। पिछले साल जिस घर में शोभा काम करती थीं, वहां के मालिक ने उन पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया। शोभा को अपमानित किया गया और उनके साथ मारपीट भी की गई। पुलिस ने शोभा को दो दिन तक थाने में बैठाकर रखा।
शोभा के पति, जो ई-रिक्शा चलाते हैं, दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन के लोगों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचे। यूनियन के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की जांच की। फुटेज देखकर पता चला कि पैसे की चोरी मालिक के बेटे ने ही की थी।
डीडब्ल्यू ने शोभा से बात की। उस घटना के बारे में वह बताती हैं, "उन्होंने मुझे धक्का दिया और गंदे शब्द कहे। मेरा मोबाइल छीन लिया और पुलिस के आने तक मुझे घर में बंद करके रखा।"
शोभा दिल्ली के कई घरों में खाना पकाने, सफाई और कपड़े धोने का काम करती हैं। सुबह सात से शाम सात बजे तक काम करने पर उन्हें महीने का दस हजार रूपए मिलता है। उनकी बुजुर्ग मां भी घरों में काम करने के लिए जाती हैं।
पिछले साल 29 जनवरी को घरेलू कामगारों के लिए अलग कानून की आवश्यकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति का गठन किया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि घरेलू कामगारों को पहले से ही देश के चार नए लेबर कोड में शामिल किया गया है। साथ ही उन्हें सरकार की बीमा योजना, आरोग्य योजना, आत्मनिर्भर योजना और वन नेशन, वन राशन कार्ड' जैसी सरकारी सुविधाओं का भी लाभ मिलता है।
ठीक एक साल बाद 29 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु आधारित घरेलू कामगार संगठन, पेन थोजिलालार्गल संघम की याचिका पर सुनवाई की। उन्होंने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन और कानूनी सुरक्षा की फिर से मांग उठाई। इस पर न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसा किया गया, तो घरेलू श्रम की मांग घट सकती है। मध्यम वर्ग के घरों के लिए घरेलू कामगार रखना महंगा और मुश्किल हो जाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनों की वजह से कई बार उद्योगों का विकास रुक जाता है और और उन्हें बंद करना पड़ता है। ऐसे में घरेलू कामगारों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं।
घरेलू काम को कानूनी दर्जा नहीं
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 2.9 करोड़ पंजीकृत घरेलू कामगार हैं। इनमे 96 प्रतिशत महिलाएं हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने 2011 में पहली बार घरेलू काम को श्रम के रूप में मान्यता दी थी। भारत में घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए कई बार बिल लाए गए। लेकिन आज तक कोई भी कानून की शक्ल नहीं ले सका।
शोधकर्ताओं और ट्रेड यूनियनों का कहना है कि घरेलू काम को अब भी महिलाओं की प्राकृतिक जिम्मेदारी या घरेलू कर्तव्य का विस्तार माना जाता है। इसे प्रोडक्टिव काम की तरह नहीं गिना जाता। आईएलओ के अनुसार घरेलू काम और बिना वेतन किए जाने वाली देखभाल वैश्विक जीडीपी का लगभग 9 प्रतिशत है (लगभग 11 खरब अमेरिकी डॉलर), जिसमें महिलाओं का योगदान लगभग 6.6 प्रतिशत है।
मार्था फैरेल फॉउंडेशन के साथ जुड़े पियूष पोद्दार बताते हैं कि अधिकतर घरेलू कामगार प्रवासी हैं। इसलिए उन्हें वोट बैंक नहीं समझा जाता और उनकी समस्याओं को राजनीतिक ध्यान कम मिलता है। सरकार घरों को कानून की निगरानी में लाने का प्रयास नहीं करना चाहती क्योंकि इससे मध्यम वर्ग और मालिकों को असंतुष्ट करने का डर रहता है।
अलग कानून की जरुरत क्यों?
घरेलू कामगार असंगठित क्षेत्र के सबसे आखिर में खड़े हैं। मालिक का घर ही उनका कार्यस्थल है। उनके काम के घंटे तय नहीं होते। कानूनी सुरक्षा की कमी के कारण महिलाओं और बच्चों का गंभीर शोषण किया जाता है। घरों में उन्हें टॉयलेट, भोजन और सोने की जगह भी नहीं दी जाती। डीडब्ल्यू से बात करते हुए शोभा बताती हैं, "मैं हफ्ते में सातों दिन काम करती हूं। कभी-कभी अगर घर पर मेहमान आए या फंक्शन हुआ तो खाना बनाना और बच्चे को संभालने जैसा एक्स्ट्रा काम भी रहता है। इसके लिए मुझे अतिरिक्त कोई पैसा नहीं मिलता।"
घरेलू कामगारों को अक्सर एजेंट भी परेशान करते है। नाम न बताने की शर्त पर एक एजेंसी के मालिक ने बताया, "अक्सर इन महिलाओं और लड़कियों को तय पैसों से कम तनख्वाह मिलती है। कामगारों के खाने के पैसे काट लिए जाते हैं। बोनस और छुट्टी नहीं मिलती। ज्यादा देर तक काम कराया जाता है। उन्हें एजेंट को भी रजिस्ट्रेशन फीस और प्लेसमेंट चार्ज देना होता है। जो उनकी दो या तीन महीने की कमाई के बराबर है।"
इस शोषण या उत्पीड़न की शिकायतों के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। इन कामगारों के पास कोई लिखित कॉन्ट्रेक्ट नहीं होता। नौरीन सबा दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन का काम देखती हैं। वह बताती हैं कि सरकार जिन बीमा, पेंशन और अन्य योजनाओं की बात कर रही है, वे कोई कानून नहीं हैं। ये योजनाएं एक निश्चित समय के लिए होती हैं। सरकार बदलने के साथ योजनाओं के नाम और स्वरूप भी बदल जाते हैं। वह डीडब्ल्यू से कहती हैं, "ये महिलाएं गरीब और वंचित समाज से आती हैं। लोग इनकी गरीबी का फायदा उठाकर कम पैसा देते हैं। दिल्ली में 12 घंटा काम के लिए केवल दस हजार रूपए मिल रहे हैं।"
पियूष पोद्दार बताते हैं कि कानून या लेबर कोड फैक्ट्री, कार्यालय, दुकान या अन्य औपचारिक प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं। जबकि घरेलू कामगारों के काम की प्रवृत्ति अलग है। यहां मजदूर और मालिक जैसा कोई रिश्ता नहीं होता है। भारत में केवल पॉश कानून (2013) ही घर को कार्यस्थल के रूप में मान्यता देता है। पियूष कहते हैं, "सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अलावा घरेलू कामगारों को किसी लेबर कोड में जगह नहीं दी गई है। जब तक केयर वर्क को हमारी अर्थव्यवस्था का अंग नहीं माना जाता, तब तक घरेलू कामगारों को श्रम अधिकारों से वंचित रखा जाएगा।"
नौरीन एक अहम बात करती हैं। स्नेबिट और बुक माय बाई जैसी ऐप-आधारित सेवाएं जरुरत के अनुसार तुरंत घरेलु कामगार उपलब्ध कराने का दावा करते हैं। पैसा पहले से तय होता है। एप के जरिए कोई भी तुरंत बुकिंग और पेमेंट कर सकता है। नौरीन का कहना है कि इन एप्स पर कम रेटिंग देने और 'ब्लैकलिस्टेड मेड्स' का विकल्प ग्राहकों के पास होता है। वह कहती हैं, "घरेलू कामगार को ग्राहक की कोई जानकारी नहीं होती। ग्राहक अगर आरोप लगाए तो बिना जांच और जवाबदेही के एक्शन कामगार पर लिया जाता है। जबकि कामगार शिकायत नहीं कर सकती।”
घरेलू कामगारों को पहचान देने वाला तंत्र बेहाल
भारत सरकार ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की पहचान, पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा के उद्देश्य से साल 2021 में ई-श्रम पोर्टल शुरू किया। यह केवल योजनाओं से जोड़ने का माध्यम है। लेकिन घरेलू कामगारों में न तो पर्याप्त जागरूकता है और न ही सीधी पहुंच। डोमेस्टिक वर्कर राइट्स यूनियन की ज्वाइंट सेक्रेटरी गीता मेनन ने डीडब्ल्यू को बताया कि ई-श्रम कार्ड के लिए कामगार यूनियनों और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर निर्भर है, जो पंजीकरण शिविर आयोजित करते हैं।
गीता मेनन ने कर्नाटक सरकार के साथ मिलकर घरेलू कामगारों के लिए बनाए गए ड्राफ्ट बिल पर काम किया है। वह बताती हैं, "पोर्टल के माध्यम से स्वयं ऑनलाइन पंजीकरण करना अधिकांश कामगारों के लिए बेहद कठिन है। इस प्रक्रिया में उनसे पैसे भी वसूले जा रहे हैं। कर्नाटक में घरेलू कामगारों के लिए स्मार्ट कार्ड की व्यवस्था है। लेकिन उसके लिए भी रजिस्टर करना आसान नहीं होता। ई-श्रम कार्ड से केवल दुर्घटना बीमा का लाभ मिलता है। यह असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिकों को समान रूप से दिया जाता है।"
भारत में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में घरेलू कामगारों के लिए विशेष प्रावधान हैं। लेकिन कामगारों में इसकी बहुत कम जानकारी है। जितनी अधिक जागरूकता होती है, उतने ही बेहतर तरीके से वे अपनी शर्तों पर मेहनताना तय कर पाते हैं। दक्षिण भारत में यूनियनें अधिक सक्रिय हैं। वे कामगारों को संगठित कर यह सिखाती हैं कि काम के घंटे, कमरों की संख्या, परिवार के सदस्यों और अलग-अलग कामों के हिसाब से मजदूरी कैसे तय की जाए।
जबकि उत्तर भारत में स्थिति अलग है। गीता बताती हैं कि इस क्षेत्र में यूनियनों का काम बहुत सीमित है। फिर सामंती और जातिवादी मानसिकता एक बड़ी समस्या है। घरेलू कामगारों को उनकी गरीबी और कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण वेतन के लिए परेशान किया जाता है।
घरेलू कामगारों की स्थिति को सुधारने के लिए एक अलग कल्याण बोर्ड की मांग सालों से की जा रही है। यूनियन चाहती हैं कि बुजुर्ग घरेलू कामगारों को पेंशन दी जाए और कामगार महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही उनके लिए सप्ताह में एक दिन का अवकाश तय हो।
गीता सुझाव देती हैं, "हम चाहते हैं कि मालिक का पंजीकरण भी अनिवार्य हो। मालिक ही पोर्टल पर घरेलू कामगार का भी पंजीकरण करे और उसे पहचान पत्र दिया जाए, जो सरकार के रिकॉर्ड में दर्ज हो। लेकिन वास्तविकता यह है कि मालिक इसके लिए तैयार नहीं हैं और अदालत भी उन्हें संरक्षण दे रहा है।”