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अस्थमा और प्रदूषित हवा: क्या इलाज हर मरीज तक पहुंच रहा है?

अस्थमा से दुनिया भर में करोड़ों लोग जूझ रहे हैं। इसका इलाज भी मौजूद है लेकिन क्या बढ़ते वायु प्रदूषण के इस दौर में हर किसी को वक्त पर जरूरी दवा मिल पा रही है?

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asthma patients in India
स्तुति लाल
 
'ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा' नामक संस्थान के अनुसार, अस्थमा या दमे की बीमारी दुनिया के 26 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करती है। विश्व भर में इस बीमारी की वजह से हर साल लगभग 4.5 लाख से भी ज्यादा मौतें दर्ज की जाती हैं।
 
अस्थमा फेफड़ों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों को प्रभावित करती है। अस्थमा के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए रोजमर्रा की गतिविधियां भी चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं। आम गतिविधियां जैसे सीढ़ियां चढ़ना, तेज चलना या खेलों में हिस्सा लेने जैसी एक्टिविटी अस्थमा के मरीजों में सांस की तकलीफ को बढ़ा देती हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, धूल, धुआं, वायु प्रदूषण और सांस की नली में संक्रमण अस्थमा के लक्षणों को और बढ़ा देते हैं। अस्थमा के कई गंभीर मामलों में तो मरीज की मौत तक संभव है। इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे आसपास के बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण यह बीमारी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है।
 
साल 2022 की ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 1.36 अरब की आबादी वाले भारत में लगभग 3.5 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में अस्थमा का असर केवल मरीजों की संख्या तक सीमित नहीं है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पल्मोनोलॉजी एंड डिसऑर्डर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अस्थमा मामलों में भारत की हिस्सेदारी 12.9 फीसदी है, लेकिन अस्थमा से होने वाली मौतों में भारत की भागीदारी 42.4 फीसदी है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि अस्थमा से होने वाली ज्यादातर मौतें गरीब और मध्यम-आय वाले देशों में होती हैं। विशेषज्ञ इसे बीमारी की देर से पहचान और नियमित इलाज की कमी से जोड़ते हैं।
 

हर अस्थमा रोगी की हो इनहेलर तक पहुंच

जब किसी बच्चे को बचपन से ही अस्थमा हो, तो उसे पूरी तरह ठीक करना काफी मुश्किल होता है। हालांकि, इस बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए कई तरह के इलाज उपलब्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सबसे आम उपचार इनहेलर का उपयोग है, जो दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाता है। इनहेलर में मौजूद दवा अस्थमा को नियंत्रित करने में मदद करती है और अस्थमा से पीड़ित वयस्कों और बच्चों को सामान्य और बेहतर जीवन जीने में सक्षम बनाती है।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, कई देशों में इनहेलर की उपलब्धता गंभीर चिंता का विषय है। आंकड़ों की मानें तो दुनिया के कई देशों में इनकी पहुंच अब भी सीमित है। साल 2023 में, कम आय वाले और कम‑मध्यम आय वाले देशों में दो‑तिहाई से भी कम देशों के सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जीवन बचाने वाली ब्रोंकोडाइलेटर दवाएं (सांस नली को चौड़ा करने वाली दवा) उपलब्ध थीं। वहीं स्टेरॉइड इनहेलर (कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाई जो सूजन को कम करती है) तो आधे से भी कम देशों में उपलब्ध थे।
 
इनहेलर की इसी कमी और अस्थमा के इलाज के लिए सबसे जरुरी दवाई को ध्यान में रखते हुए 'द ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा' ने विश्व अस्थमा दिवस के लिए एक विशेष थीम को चुना है। इस वर्ष की थीम है "हर अस्थमा रोगी के लिए सूजन कम करने वाले इनहेलर तक पहुंच - अब भी एक गंभीर और तत्काल जरूरत।”
 
द ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा' लगातार इस आवश्यकता पर जोर देता रहा है कि अस्थमा से पीड़ित सभी लोगों को उन दवाओं तक पहुंच मिलनी चाहिए, जो मूल बीमारी को नियंत्रित करने और तीव्र अस्थमा अटैक के उपचार के लिए आवश्यक हैं। संगठन इस थीम के द्वारा यह संकेत देना चाहती है कि लगभग सभी अस्थमा रोगियों, जिनमें प्री‑स्कूल उम्र के बच्चे भी शामिल हैं, को इनहेल्ड स्टेरॉयड मिलना चाहिए। ये दवाएं अटैक का खतरा कम करती हैं और अस्थमा से होने वाली टाली जा सकने वाली मौतों को घटाती हैं।
 

क्यों होता है अस्थमा?

अस्थमा एक ऐसी गंभीर बीमारी है जो सांस लेना मुश्किल बना देती है। यह किसी भी उम्र में हो सकती है और लंबे समय तक साथ रहती है। बच्चों में तो यह बीमारी काफी आम है। इस बीमारी में सांस की नलियां सूजन की वजह से संकरी हो जाती हैं। नलियों में सिकुड़न के साथ उनमें बलगम (कफ) बनने लगता है। इसी वजह से खांसी, सांस फूलना, घरघराहट और सीने में जकड़न महसूस होने लगती है।
 
हर व्यक्ति में अस्थमा का कारण अलग हो सकता है। इस बीमारी का नाम एक है, लेकिन इसके कई रूप और प्रकार हैं। 'ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा' की रिपोर्ट के अनुसार अस्थमा को एलर्जिक, नॉन‑एलर्जिक, कफ‑प्रधान, लेट‑ऑनसेट अस्थमा(वयस्क अवस्था में शुरू होने वाला अस्थमा) और मोटापे के साथ होने वाले अस्थमा की श्रेणी में बांटा गया है।
 
एलर्जिक अस्थमा के लक्षण अक्सर पराग के कण, पालतू जानवर, धूल‑कण के संपर्क में आने के बाद दिखाई देते हैं। इस तरह का अस्थमा बहुत ही आम है और इसकी शुरुआत अक्सर बचपन में ही हो जाती है। वहीं, नॉन‑एलर्जिक अस्थमा आमतौर पर वयस्क अवस्था में शुरू होता है। इसके लक्षण किसी एलर्जी से नहीं बल्कि वायु प्रदूषण, सीलन और फफूंद, सर्दी, फ्लू और छाती के संक्रमण के कारण दिखाई देते हैं।
 

बच्चों में बढ़ते अस्थमा के मामले

अस्थमा किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन अधिकतर मामलों में इसकी शुरुआत बचपन में होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस दौरान बच्चे की रोग‑प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है। आम तौर पर देखा जाता है कि पारिवारिक इतिहास अस्थमा के खतरे को बढ़ाता है। जिन बच्चों के घर में पहले से एलर्जी या अस्थमा मौजूद है, उनमें इस बीमारी के विकसित होने की संभावना भी अधिक होती है। और तो और, जब गर्भवती महिला वायु प्रदूषण से युक्त वातावरण में ज्यादा समय बिताती है, तो इसका असर होने वाले बच्चे के फेफड़ों के विकास पर भी पड़ता है।
 
आजकल इस बीमारी के विकसित होने का एक बहुत बड़ा कारण अनियंत्रित वायु प्रदूषण भी है। जब कोई बच्चा प्रदूषण के संपर्क में लंबे समय तक रहता है, तो उसके जीवन में प्रदूषण से होने वाले दुष्प्रभावों का खतरा बढ़ जाता है। भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के मुताबिक, वायु प्रदूषण के कारण बच्चे के फेफड़ों के विकास में कमी के साथ-साथ अस्थमा विकसित होने का जोखिम बढ़ता है। उनका यह भी कहना है कि वायु प्रदूषण के कारण 5 वर्ष से कम उम्र के 50 फीसदी से अधिक बच्चों में तीव्र निचले श्वसन तंत्र का संक्रमण देखा जाता है। छोटे कण और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषक, छोटे बच्चों में न्यूमोनिया और अन्य सांस की बीमारियों से भी जुड़े होते हैं।
 
विशेषज्ञ बताते हैं कि शिशुओं और छोटे बच्चों की सांस की नलियां वयस्कों की तुलना में काफी संकरी होती है। यही कारण है कि वायु प्रदूषण से संपर्क में आने पर सांस की नलियों में सूजन की वजह से बच्चों में अस्थमा तेजी से बिगड़ सकता है और सांस लेने में ज्यादा दिक्कत भी पैदा करता है।
 
'इंटरनेशनल स्टडी ऑफ अस्थमा एंड एलर्जीज इन चिल्ड्रन' नाम के संस्थान ने वर्ष 2000 से 2003 के बीच 97 देशों में बच्चों में होने वाले अस्थमा पर सर्वे किया। इस रिपोर्ट में पाया गया कि दुनिया भर में लगभग 14 फीसदी बच्चे अस्थमा‑जैसे लक्षणों से प्रभावित हो सकते हैं।

वहीं, भारत के संदर्भ में देखा जाए तो 'जर्नल ऑफ मदर एण्ड चाइल्ड' के एक अध्ययन के अनुसार, स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच अस्थमा का प्रचलन लगभग 8 फीसदी से 13 फीसदी के बीच दर्ज किया गया है। इस स्टडी के अनुसार, औद्योगिक प्रदूषण के संपर्क में रहना और घर के भीतर धुएं का स्रोत होना बच्चों में अस्थमा के खतरे को बढ़ाता है। ऐसे में उन ट्रिगर्स की पहचान जरूरी हो जाती है, जो लोगों में अस्थमा के लक्षण को बढ़ाते हैं। इसके अलावा वायु प्रदूषण से दूर रहने, मास्क का इस्तेमाल करने और इलाज के लिए डॉक्टर से नियमित संपर्क में रहने से अस्थमा की स्थिति खराब होने से बचेगी।

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