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राजनीति में महिलाओं पर पप्पू यादव के बयानों से छिड़ी चर्चा

बिहार के पूर्णिया जिले से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन यादव उर्फ पप्पू यादव के एक बयान से राजनीति में महिलाओं की स्थिति सवालों के घेरे में है। महिलाओं के प्रति राजनेताओं के नजरिए पर चर्चा छिड़ गई है।

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pappu yadav
मनीष कुमार
राजनीति में महिलाओं को लेकर सांसद पप्पू यादव की टिप्पणियां भारतीय मीडिया में वायरल हो गई हैं। इसमें उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे पर मीडिया से कहा है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की गरिमा की बात करना मजाक है।
 
उनका बयान है, "महिलाओं पर किसकी गिद्ध दृष्टि है।।। अमेरिका से लेकर भारत तक।।। यह नेताओं की है। बिना किसी नेता के कमरे में गए 90 प्रतिशत महिलाएं राजनीति नहीं कर सकतीं। इसे राजनेताओं के यहां की सीसीटीवी फुटेज में देखा जा सकता है। यह एक संस्कृति बन गई है।" उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों और कालेजों में छात्राएं शोषण का सामना करती हैं, कार्यालयों में भी महिलाएं इसी स्थिति से गुजरती हैं, बाबा सब भी लड़कियों का खूब शोषण करते हैं।
 

पप्पू यादव के बयान पर महिला आयोग का नोटिस

इस बयान को महिलाओं के लिए अपमानजनक बताते हुए बिहार महिला आयोग ने सांसद को नोटिस जारी किया और उनसे प्रश्न पूछा कि लोकसभा अध्यक्ष के पास उनकी अयोग्यता के लिए सिफारिश क्यों नहीं की जानी चाहिए। इस नोटिस को लेकर यादव ने आक्रोश जताया और कहा कि आयोग को पहले उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, जो नैतिकता से दूर हैं। उनका कहना है, "मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। इससे राजनीति में सक्रिय महिलाओं को ठेस पहुंची है तो मैं क्षमा मांगता हूं।"
 
साथ ही पप्पू यादव ने मांग करते हुए कहा कि जिस भी राजनीतिक दल का नेता या कार्यकर्ता को यौन शोषण के मामले में लिप्त पाया जाए, उसकी राजनीतिक सदस्यता तुरंत रद्द होनी चाहिए तथा उसे चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। पप्पू यादव ने 'मी-टू' और हाल में काफी चर्चा में रहे एपस्टीन फाइल जैसे मामलों का भी जिक्र करते हुए कहा कि शक्तिशाली लोगों की नजरें महिलाओं पर ही टिकी रहती हैं। आधी आबादी को बचाने के लिए लड़ना होगा और ऐसे लोगों को बेनकाब करना होगा।
 
पप्पू यादव को भले ही अपने इस बयान के लिए हर ओर से कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इससे राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की भागीदारी पर गंभीर प्रश्नचिन्ह तो लगता ही है। पिछली कई घटनाएं भी उनकी बात की ताकीद करती है जब समय-समय पर राजनीति में महिलाओं के शोषण के मामले सामने आते रहते हैं। इस कड़वे सत्य को एमएलए एमएलसी रही दिवंगत रमणिका गुप्ता ने अपनी आत्मकथा 'आपहुदरी' में कई प्रसंगों में उजागर किया है। बीजेपी के सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भी महिला पहलवानों के यौन शोषण का मामला काफी चर्चा में रहा था। करीब 23 साल पहले मधुमिता शुक्ला हत्याकांड ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। हालांकि, पूर्वांचल के बड़े नेता व कई बार विधायक रह चुके अमरमणि त्रिपाठी बाद में इस मामले में रिहा हो गए।
 

कानून ही पर्याप्त नहीं, माइंडसेट बदलना जरूरी

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 में दिए गए हलफनामों के विश्लेषण से पता चलता है कि 151 सांसदों के खिलाफ महिलाओं की प्रताड़ना या शोषण से संबंधित मामले दर्ज हैं। वहीं, वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की वर्ष 2025 की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट भी दिखाती है कि विश्व के अन्य देश जहां सुधार की तरफ बढ़ रहे, वहीं भारत में स्थिति में गिरावट आई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस बार 148 देशों में भारत 131वें स्थान पर है, जबकि, एक साल पहले यह 129वें स्थान पर था। इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत का प्रदर्शन 150 देशों से बदतर रहा है। देश में महिला सांसदों का अनुपात वैश्विक औसत की तुलना में 26।5 प्रतिशत कम है।
 
सोशियोलॉजी की रिटायर्ड प्रोफेसर अवनि शंकर कहती हैं, "निश्चित तौर पर परिस्थितियां बदली हैं, किंतु आज भी उनकी राह इतनी आसान नहीं है। कार्यक्षेत्र कोई भी हो, महिलाओं को शक, संशय व अपमान का सामना तो करना पड़ता है, जिसे वे कई कारणों से अक्सर टाल जाती हैं। अगर कोई जिम्मेदार पद पर बैठा आदमी अपने कार्यक्षेत्र की बात कह रहा, तो निश्चय ही उसका कुछ आधार होगा।"
 
लोकतंत्र को सशक्त और समावेशी बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी का बढ़ना जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय में योगमाया एमजी नामक एडवोकेट ने पॉलिटिकल पार्टियों को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न ( रोकथाम, निषेध व निवारण) अधिनयम, 2013 के दायरे में लाने को एक लोकहित याचिका दाखिल की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। अगर, इस संबंध में कुछ निर्देश होता तो पार्टियां को कुछ तो खौफ होता। सेल्स की नौकरी करने वाली तुलिका प्रियदर्शिनी कहती हैं, "प्रोफेशन कोई भी हो, कानून भले ही बन गया हो, लेकिन माइंडसेट कहां बदला है। लड़कियों महिलाओं को देखते असामान्य व्यवहार आम बात है। किसी नेता ही ने, जिनकी पत्नी भी राजनीति में हैं, अगर ऐसी बात कही है तो उसे महज एक बयान नहीं समझा जाना चाहिए़, बल्कि उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।"
 

शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न के डर से कई महिलाएं हैं राजनीति से दूर

न्यूज लॉन्ड्री में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दलों के अंदर लैंगिक असमानता व भेदभाव और यौन हिंसा महिलाओं की भागीदारी में बड़ी बाधा है। उनमें बताया गया है कि 90 फीसदी महिलाएं ऐसे डर की वजह से राजनीति में हिस्सा नहीं लेना चाहती हैं। करीब 45 प्रतिशत महिला प्रत्याशियों को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना भी पड़ा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अभी भी महज 10 फीसद के आसपास महिला विधायक हैं। जबकि महिला सांसदों का हिस्सा महज 14 फीसद है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं को मिलाकर कुल 4,666 जन-प्रतिनिधियों में से केवल 10 फीसद अर्थात 464 ही महिलाएं हैं।
 
अगर प्रत्याशी की बात करें तो लोकसभा, राज्य की विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 51,708 उम्मीदवारों में से सिर्फ 5,095 महिलाएं थी। इस बात पर चिंता की जानी चाहिए कि पिछले आम चुनाव में देश के 152 लोकसभा क्षेत्र ऐसे थे, जिनमें एक भी महिला प्रत्याशी नहीं थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि महिलाएं वोट देने तक ही सीमित रह गई हैं। आधी आबादी के अनुरूप ही सत्ता में भी उनकी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। शायद, इसलिए राजनीति विज्ञान की शोध छात्रा विनीता कहती हैं, "ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिससे महिलाओं को बराबरी का मौका ईमानदारी से मिल सके। लैंगिक समानता हासिल करने में राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी तय करनी होगी, तभी महिलाएं वास्तविक रूप में नीति निर्धारक बन सकेंगी। उनकी सुरक्षा और राजनीतिक प्रशिक्षण के भी गंभीर उपाय करने होंगे।"

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