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क्या अब पश्चिम एशिया में शुरू होगी परमाणु हथियारों की होड़?

पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह सिर्फ ईरान या इजराइल के परमाणु ठिकानों पर हो रहे हमले नहीं हैं। असली डर यह है कि दूसरे देशों को लग सकता है, उनके पास भी परमाणु बम होना जरूरी है।

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पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह सिर्फ ईरान या इजराइल के परमाणु ठिकानों पर हो रहे हमले नहीं हैं। असली डर यह है कि दूसरे देशों को लग सकता है, उनके पास भी परमाणु बम होना जरूरी है।
 
इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा जंग ने पश्चिम एशिया में परमाणु हमले के डर को बहुत बढ़ा दिया है। फरवरी के आखिर में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब से इजराइल और ईरान दोनों देशों के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया है।
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान पर हमला इसलिए किया गया, ताकि तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उल्टा असर भी हो सकता है।
 
परमाणु हथियार रखना एक तरह का बचाव माना जाता है। इसके पीछे की सोच यह है कि ये आपके दुश्मनों को आपके खिलाफ कोई कदम उठाने से रोकते हैं।
 
जानकार अक्सर उत्तर कोरिया का उदाहरण देते हैं। उसने परमाणु हथियार बना लिए हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि इसी वजह से उस तानाशाही शासन को कोई छू भी नहीं सकता।
 
यूक्रेन की मिसाल इससे बिल्कुल अलग है। साल 1994 में यूक्रेन ने रूस, अमेरिका और ब्रिटेन से मिली सुरक्षा गारंटी के बदले परमाणु हथियारों का अपना भंडार त्यागने का फैसला किया। उस समय यूक्रेन सबसे ज्यादा परमाणु हथियारों के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर था। अब यह दलील दी जाती है कि अगर यूक्रेन ने परमाणु हथियार अपने पास रखे होते, तो रूस कभी उस पर हमला नहीं कर पाता। 
 

परमाणु हथियार बनाने के साधन, सुरक्षा के लिए काफी नहीं

ईरान को एक ऐसी स्थिति में माना जाता था, जिसे 'न्यूक्लियर हथियारों की लेटेंसी' कहा जाता है। न्यूक्लियर हथियारों की लेटेंसी का मतलब है कि किसी देश के पास परमाणु हथियार बनाने के सभी साधन हैं, लेकिन उसने अभी तक हथियार नहीं बनाया होता है। 
 
रूपल मेहता, राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर हैं और फिलहाल अमेरिका में रहती हैं। उन्होंने मार्च की शुरुआत में 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' के लिए लिखी एक टिप्पणी में कहा, "सालों तक, ईरान ने रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखी। उसने परमाणु बम बनाने के करीब पहुंचने की कोशिश तो की, लेकिन उसे पूरी तरह बनाया नहीं। ऐसा उसने इसलिए किया, ताकि उस पर वे हमले न हों जो अब हो रहे हैं।"
 
रूपल मेहता ने आगे लिखा, "लेकिन अब ईरान के नए नेतृत्व के सामने एक बहुत कड़वा सच है। परमाणु बम बनाने की कोशिश करना खतरनाक तो था ही, लेकिन बम को अधूरा छोड़ देना सबसे बड़ी और जानलेवा गलती साबित हुई।"
 
इस हफ्ते ईरान के नेताओं ने एक बहुत बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा है कि ईरान 1968 की ऐतिहासिक परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) से बाहर निकल सकता है। इस संधि का मकसद दुनिया में परमाणु हथियारों का विस्तार रोकना है। इसमें अभी 191 देश शामिल हैं।
 
ईरान युद्ध के कारण इस क्षेत्र में सुरक्षा संबंधों में जो बदलाव आए हैं, उनके चलते मध्य-पूर्व के दूसरे देश भी शायद परमाणु हथियार हासिल करना चाहें। केल्सी डेवनपोर्ट, वॉशिंगटन स्थित 'आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन' में 'नॉन-प्रोलिफरेशन पॉलिसी' (परमाणु अप्रसार नीति) की निदेशक हैं। वह इस आशंका की पुष्टि करती हैं, "कई ऐसे कारक हैं, जो खाड़ी देशों को परमाणु हथियारों के और करीब ले जाएंगे।"
 
खाड़ी देश इस वक्त इजराइल और ईरान, दोनों की अपनी-अपनी ताकत दिखाने की होड़ के बीच फंस गए हैं। अब उन्हें अमेरिका के साथ हुए अपने सुरक्षा समझौतों पर भी पहले जैसा भरोसा नहीं रहा।
 
डेवनपोर्ट ने अनुमान जताया, "हालांकि, इस बात की संभावना कम ही है कि इनमें से कोई भी देश तुरंत परमाणु बम बनाने की होड़ में शामिल हो जाएगा। अगर इस क्षेत्र का कोई भी देश परमाणु हथियार बनाना चाहेगा, तो उसे कई बड़ी तकनीकी और राजनीतिक बाधाओं को पार करना होगा।"
 
डेवनपोर्ट ने कहा कि खाड़ी देशों के नेता भी मौजूदा संघर्ष खत्म होने का इंतजार करेंगे, ताकि यह देख सकें कि ईरान की सत्ता और उसका परमाणु कार्यक्रम किस दिशा में जाता है। लेकिन निश्चित रूप से, यह संघर्ष सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों की जरूरत की सोच को बढ़ावा देगा।
 

परमाणु हथियार किसे चाहिए?

पिछले साल सऊदी अरब ने परमाणु ताकत बनने की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ाया। वहां के शासक मोहम्मद बिन सलमान पहले ही साफ कर चुके हैं कि अगर ईरान ने परमाणु बम बनाया, तो सऊदी अरब भी पीछे नहीं रहेगा। नवंबर में अमेरिका की यात्रा के बाद, बिन सलमान कथित तौर पर परमाणु सहयोग से जुड़े एक समझौते के साथ लौटे। इसके तहत, उनके देश को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल जाएगी।
 
पेरिस में रहने वाली स्वतंत्र शोधकर्ता नूर ईद ने मध्य पूर्व की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर कई थिंक टैंक के लिए शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। वह बताती हैं कि सऊदी अरब के साथ इस प्रकार के किसी भी समझौते के लिए सबसे पहले अमेरिकी संसद से मंजूरी लेनी होगी।  
 
नूर ने डीडब्ल्यू को बताया कि अमेरिका ने करीब 155 देशों के साथ 26 परमाणु सहयोग समझौते किए हैं।उनमें से तकरीबन सभी में एक "अतिरिक्त प्रोटोकॉल" शामिल है, जिसपर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ मिलकर हस्ताक्षर किए गए हैं।
 
इसके कारण आईएईए को संबंधित देश की परमाणु गतिविधियों पर करीबी नजर रखने का मौका मिलता है। ईद बताती हैं कि हालांकि अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ऐसा लगता है कि सऊदी अरब और अमेरिका के करार में सिर्फ एक द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते की जरूरत होगी।
 
आईएईए के पूर्व निदेशक रॉबर्ट केली ने इस हफ्ते 'ब्लूमबर्ग' से कहा, "यह फैसला पिछले सभी नियमों और मिसालों को तोड़ता है।" बकौल केली, "यह आइडिया कि अमेरिकी प्रशासन सऊदी अरब को वही सब करने की छूट देने को तैयार है जिसके लिए वे ईरान पर बम बरसा रहे हैं, दोहरा मापदंड लगता है।"
 
बावजूद इसके, जैसा कि नूर ईद भी ध्यान दिलाती हैं, सऊदी अरब को परमाणु ताकत विकसित करने में 10 से 20 साल लगेंगे। हथियारों की तो फिलहाल बात ही छोड़ दें। इसके अलावा भी कई दूसरी समस्याएं हैं, जैसे कुशल कर्मचारियों की कमी। नूर मानती हैं कि फिलहाल सऊदी अरब, परमाणु परियोजनाओं को ज्यादातर घरेलू ऊर्जा के स्रोत के तौर पर ही देखता है।
 
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के पास पहले से ही एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसका नाम बराकाह है। जब 2009 में उसने अमेरिका के साथ समझौता किया था, तो वह अतिरिक्त प्रोटोकॉल मानने के लिए तैयार हो गया था। उसने साफ कहा था कि वह खुद यूरेनियम संवर्धन नहीं करेगा।
 
नूर बताती हैं कि यूएई के लिए, न्यूक्लियर पावर का मकसद सैन्य महत्वाकांक्षाओं के बजाय, परमाणु ऊर्जा विकसित करने वाला पहला अरब देश बनने का गौरव है। लेकिन उनके समझौते में एक शर्त है, जिसे 'मोस्ट-फेवर्ड नेशन क्लॉज' कहा जाता है।
 
इसे समझाते हुए नूर बताती हैं कि इस शर्त के अनुसार, 'अगर किसी क्षेत्रीय या पड़ोसी देश के साथ ज्यादा सुविधाजनक समझौता होता है, तो उनके पास अपनी शर्तों पर फिर से बातचीत करने का अधिकार सुरक्षित रहता है।' नूर का कहना है कि 2025 में सऊदी परमाणु सहयोग समझौते में ढील दिए जाने की एक वजह शायद चीन और रूस के साथ अमेरिका की प्रतिस्पर्धा है।
 
ये देश दुनियाभर में परमाणु सामग्री के मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। ट्रंप ने वादा किया था कि वह अमेरिका के न्यूक्लियर सेक्टर में नई जान फूकेंगे। नूर बताती हैं कि अब तक, रूस और चीन के साथ होने वाले परमाणु करारों में शर्तें उतनी कड़ी नहीं होतीं। शायद इसीलिए, सऊदी अरब को अपने पाले में रखने के लिए अमेरिका को भी अपने नियमों में नरमी बरतनी पड़ी।
 
'आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन' की केल्सी डेवनपोर्ट ने कहा कि मध्य पूर्व के अन्य देश जो परमाणु क्षमता हासिल करने की कतार में हो सकते हैं, उनमें मिस्र और तुर्की शामिल हैं। रूस के सहयोग से, मिस्र भूमध्य सागर के तट पर एक न्यूक्लियर रिएक्टर बना रहा है।
 
हालांकि, मिस्र ने आधिकारिक तौर पर मध्य-पूर्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की वकालत की है। जानकारों का यह भी कहना है कि वह अभी आर्थिक मुश्किलों में है। ऐसे में, इस बात की संभावना कम ही है कि वह परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए कर पाएगा।
 
नूर ईद ने बताया कि तुर्की अभी रूस के साथ मिलकर एक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित कर रहा है। जल्द ही वह चीन के साथ भी सहयोग शुरू कर सकता है। वह बताती हैं, "लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि वे सिर्फ परमाणु हथियार हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के खिलाफ क्यों जाएंगे।"
 
नूर आगे बताती हैं, "उनका रक्षा उद्योग काफी अच्छे से विकसित हो रहा है और उसे बेहतर पहचान भी मिल रही है।" डीडब्ल्यू से बातचीत में नूर ने यह भी ध्यान दिलाया कि तुर्की पहले ही नाटो का सदस्य है। जब तक वह इस गठबंधन को छोड़ने का मन नहीं बना लेता, तब तक उसके पास नाटो का 'सुरक्षा कवच' मौजूद है।
 
परमाणु हथियारों के प्रसार को कैसे रोका जा सकता है?
केल्सी डेवनपोर्ट का मानना है कि परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने के लिए बड़ी तस्वीर देखना भी जरूरी है। जैसा कि उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने वाली व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म होने देना चीन या रूस के हित में नहीं है। वे कभी नहीं चाहेंगे कि परमाणु हथियारों को रोकने वाला अंतरराष्ट्रीय सिस्टम पूरी तरह बर्बाद हो जाए, क्योंकि इससे उनका अपना नुकसान है।"
 
उन्होंने आगे कहा, "अगर आप मध्य पूर्व से थोड़ा हटकर देखें, तो कुछ ऐसे देश हैं जिनके परमाणु हथियार बनाने की संभावना सबसे ज्यादा है। वे चीन के पड़ोस में ही हैं, जैसे कि दक्षिण कोरिया और जापान। लेकिन दिक्कत यह है कि रूस और चीन ने अब तक ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जिसमें परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के नियमों का उल्लंघन करने के लिए ईरान को जवाबदेह ठहराया गया हो।"
 
इसलिए, डेवनपोर्ट का तर्क है कि भले ही रूस और चीन परमाणु हथियार बनाने में मदद के लिए सामग्री और तकनीक दे सकते हैं, लेकिन वे सक्रिय रूप से सहायता नहीं करेंगे।
 
वह बताती हैं, "अब ज्यादा संभावना इस बात की है कि खाड़ी देश दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच चल रहे झगड़े का फायदा उठाएंगे। एक तरफ अमेरिका और यूरोप हैं, तो दूसरी तरफ रूस और चीन। खाड़ी देश इन दोनों गुटों के बीच की दूरियों का इस्तेमाल करेंगे, ताकि वे परमाणु बम बनाने की दहलीज तक पहुंच सकें और उन पर कोई सख्त पाबंदी भी न लगे।"
 
डेवनपोर्ट का कहना है कि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए मध्य पूर्व के देशों को आपस में बातचीत करनी ही होगी। वह कहती हैं, "मैं मानती हूं कि इस भीषण जंग के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हाथ मिलाना या बात करना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। लेकिन, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। अगर देश आपस में बात नहीं करेंगे, तो वे इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि दुश्मनों से बचने और अपने देश पर हमलों को रोकने के लिए परमाणु बम बनाना ही इकलौता रास्ता है।"
 

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