आखिर कैसे लेबर सप्लाई करने वाला बन गया बिहार
जिस बिहार में 1951 तक पूरे भारत की 6.51 प्रतिशत रजिस्टर्ड फैक्ट्री थी, पूरे देश के 56 में से 33 चीनी मिलें थीं, जो राज्य दूसरी पंचवर्षीय योजना तक 27 प्रतिशत चीनी देता था, वह उद्योग-धंधे में कैसे पिछड़ता चला गया।
मनीष कुमार
इस समय हालत यह है कि देश में परिचालित कुल औद्योगिक इकाइयों का बमुश्किल 1.34 प्रतिशत हिस्सा ही अब बिहार में रह गया है। आजादी के बाद जिस बिहार को देश का सबसे सुशासित राज्य और देश की दूसरी सबसे अच्छी अर्थव्यवस्था कहा जाता था, वह 'लेबर स्टेट' में कैसे परिणत हो गया।
दरअसल, बिहार का नाम आजादी के बाद अग्रणी राज्यों में लिया जाता था। प्रथम मुख्यमंत्री व आधुनिक बिहार के निर्माता कहे जाने वाले डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के कार्यकाल में शिक्षा, सिंचाई, स्वास्थ्य, कृषि और उद्योग में बिहार काफी तेजी से आगे बढ़ा। ढांचागत विकास की नींव रखी गई। उनके शासनकाल में अविभाजित बिहार के बेगूसराय जिले के बरौनी में रिफाइनरी, बरौनी और सिंदरी में खाद कारखाना, बरौनी डेयरी, हटिया (रांची) में भारी उद्योग कारखाना (एचईसी), बोकारो में स्टील प्लांट, बेगूसराय और पतरातू में पावर प्लांट तथा चीनी मिल व सीमेंट के कारखानों सहित कई अन्य उद्योगों की स्थापना हुई। इसके अलावा कई छोटी औद्योगिक इकाइयां खुलीं, जिसमें हजारों लोगों को रोजगार मिला। राज्य के कई इलाके देश के औद्योगिक मानचित्र पर आ गए।
हालांकि, सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में फिलहाल तीन हजार से अधिक छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चार लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं। अब तक दस हजार एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप किया गया है। मुजफ्फरपुर, हाजीपुर और पटना के बिहटा में टेक्सटाइल, रबर, बैग, जूता बनाने वाली तथा फूड प्रोसेसिंग की कंपनियां काम कर रही है। बिहटा में ड्राई पोर्ट से भी काम होने लगा है। राज्य सरकार ने नई औद्योगिक नीति के तहत निवेशकों को कई तरह की सहूलियतें दी है, जिसका असर भी दिख रहा है।
राजनीतिक अस्थिरता ने निकाला दम
दरअसल, 1961 में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के निधन के बाद बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया। सत्ता की कुर्सी किसी म्यूजिकल चेयर से कम नहीं रह गई। ऐसी परिस्थिति में बिहार डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की विरासत नहीं संभाल पाया और तेज औद्योगिकीकरण की रफ्तार धीरे-धीरे पटरी से उतर गई। 1961 से 1990 यानी लालू प्रसाद का शासन आने तक बिहार में 23 मुख्यमंत्री बदले, वहीं 1967 से 1972 तक के पांच साल में नौ सरकारें बदलीं।
1967 में पहली बार बिहार की सत्ता पर कांग्रेस का एकाधिकार टूटा। 1969 में बिहार में पहली बार विधानसभा का मध्यावधि चुनाव कराया गया। इस कालखंड में राजनीतिक अस्थिरता की ऐसी स्थिति थी कि किसी भी सरकार का कार्यकाल पूरा होना मुश्किल था। दल-बदल की राजनीति का भी नया अध्याय शुरू हो चुका था। राजनीति का हाल यह था कि 1985 से 1990 तक कांग्रेस के शासनकाल में बिहार को चार मुख्यमंत्री मिले। 1990 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस फिर बिहार की सत्ता में नहीं लौट सकी। इसके बाद एक ही कार्यकाल में कई मुख्यमंत्री बनने का दौर खत्म हुआ।
राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में प्रशासनिक अक्षमता, कमजोर बुनियादी ढांचा, भ्रष्टाचार और बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति संसाधन कम हुए। 1950 से 1980 के बीच राज्य में नये उद्योग लगभग नहीं लगे। योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन भी रुक गया। इससे विकास की गति बाधित होती चली गई। यही वजह रही कि 1967 के बाद से ही बिहार की प्रति व्यक्ति आय पर भी नकारात्मक असर पड़ने लगा और 1980 आते-आते राज्य आर्थिक रूप से बुरी तरह पिछड़ने लगा। 1981 में बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आय राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम रह गई। 80 के दशक से ही राज्य और केंद्र के बीच टकराव बढ़ने लगा। असर यह हुआ कि उद्योग-धंधे बंद होने लगे।
वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने से खनिज संपदा बिहार के हाथ से निकल गई। 90 के दशक में राज्य में प्रशासनिक तंत्र कमजोर हो गया। भ्रष्टाचार और अपराध की स्थिति गंभीर होती चली गई। संगठित और हिंसक अपराधों में काफी वृद्धि हुई, जिसका असर उद्योग-धंधों पर पड़ने लगा। राजनीतिक समीक्षक समीर सौरभ कहते हैं, राजनीतिक अस्थिरता के दौर में मुख्यमंत्री का प्राथमिक लक्ष्य तो अपनी कुर्सी बचाना रहता था, विकास की बात सोचना तो इससे इतर बात थी। लोकतंत्र में जब राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा लड़खड़ाता है तो उसका तात्कालिक के साथ-साथ दूरगामी प्रभाव भी पड़ता है।" 90 के दशक के बाद समाजवाद को मजबूत करने के चक्कर में लालू प्रसाद उद्योग-धंधे की तो चर्चा भी भूल गए।
खत्म हो गई मढ़ौरा-मोकामा की पहचान
बिहार में सारण जिले के मढ़ौरा व पटना जिले के मोकामा और फतुहा औद्योगिक सेंटर के नाम से जाने जाते थे, जिनकी समय के साथ-साथ पहचान ही समाप्त हो गई। उद्योग का गढ़ रहा पटना जिले का मोकामा, जिसे बाद में क्राइम नगरी के नाम से जाना जाने लगा। इसे कभी 'बिहार का कोलकाता' कहा जाता था। वहां शराब बनाने वाली मैकडॉवेल कंपनी की फैक्ट्री थी, जो अंतत: 2016 में शराबबंदी के कारण बंद हो गई। जूते-चप्पल बनाने वाली बाटा फैक्ट्री भी राजनीतिक हस्तक्षेप व बढ़ते अपराध के कारण बंद हो गई। सूत काटने वाली स्पिनिंग फैक्ट्री और भारत वैगन एंड इंजीनियरिंग में हजारों लोग काम करते थे। मालगाड़ी के डिब्बे बनाने वाला भारत वैगन कारखाना भी 2017-18 में बंद हो गया।
90 के दशक के शुरुआती सालों में मढ़ौरा में चार फैक्ट्रियां थीं - मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग वर्क्स, चीन मिल और उससे जुड़ी डिस्टिलरी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सैनिकों को डिब्बाबंद भोजन की आपूर्ति करने वाली मॉर्टन कंपनी ने 1929 में मढ़ौरा में मॉर्टन के नाम से फैक्ट्री लगाई थी। मॉर्टन टॉफी समेत अन्य उत्पादों ने धीरे-धीरे भारतीय बाजार में बड़ी जगह बना ली थी। इस फैक्ट्री को बाद में बिड़ला समूह ने ले लिया था। यह चॉकलेट फैक्ट्री अंतत: 1997 में बंद हो गई।
सरकार की बेरुखी से बंद होती गईं फैक्ट्रियां
मढ़ौरा में ही भारत की पहली चीनी मिल 1904 में खुली थी, जो 1997 में बंद हो गई। 1977 से 1985 के बीच करीब 15 चीनी मिलों का अधिग्रहण किया गया, जिस पर एक-एक करके ताले लगते चले गए। बढ़ते अपराध, सरकार की बेरुखी, राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रदूषण के कड़े मानदंड तथा समय के साथ प्रतिस्पर्धा के दौड़ में शामिल नहीं होने के कारण ये सभी बंद हो गए। इन कारखानों में हजारों लोग काम करते थे, जो बेरोजगार हो गए। अतीत की गाथा कहने के लिए अब यहां केवल खंडहर ही रह गए हैं।
रोहतास जिले का डालमियानगर 1990 से पहले पेपर, वनस्पति तेल, सीमेंट, केमिकल व एस्बेस्टस उद्योग के लिए काफी विख्यात था। धीरे-धीरे सब बंद हो गए। पटना के फतुहा की विजय स्कूटर फैक्ट्री का भी यही हश्र हुआ। यहां औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए 1968 में 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। जहां करीब छह सौ से अधिक फैक्ट्रियों में बिहार के विभिन्न हिस्सों के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल के लोग यहां काम की तलाश में आते थे। 1985 से अपराध तथा सरकार की बेरुखी से फैक्ट्रियां बंद होने लगीं और 2018 तक महज 15 ही अस्तित्व में रहीं। मुजफ्फरपुर, कटिहार, सहरसा, बनमनखी, पूर्णिया, दरभंगा सहित कई शहरों में तरह-तरह के कल-कारखानों के ऐसे खंडहर आज भी खड़े हैं।
रोजी के लिए पलायन बन गई मजबूरी
अर्थशास्त्र के अवकाश प्राप्त व्याख्याता अविनाश के।पांडेय कहते हैं, कम शिक्षा दर, शहरीकरण की सुस्त रफ्तार और उद्योग धंधे की कमी की वजह से बिहार आज भी बीमारू राज्यों की सूची से बाहर नहीं निकल सका है।'' सीमित संख्या में उद्योग धंधे में रोजगार सृजन होने के कारण कुशल (स्किल्ड) कामगारों की संख्या भी कम है और उनके लिए अवसर भी कम हैं। इस वजह से लोग पलायन के लिए मजबूर हैं। वे कहते हैं, जो उद्योग धंधे स्थापित किए गए, उनमें आसपास के लोगों के अलावा जमीन मालिकों को भी नौकरी मिली। लेकिन इसके बंद होते ही सब बेकार हो गए। उस किसान की जमीन भी चली गई, जिस पर वह खेती करता था। अब स्थिति में तो बाहर जाने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया।''
कोरोना काल में पश्चिम चंपारण जिले के चनपटिया में स्टार्ट अप हब बना, काम भी हुआ, चर्चा भी खूब हुई। लेकिन आज वहां कर्ज लेकर काम शुरू करने वाले लोग रो रहे हैं। नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर फतुहा के एक पूर्व उद्यमी कहते हैं, जब तक दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं होगी, तब तक औद्योगिक विकास नहीं होगा। निवेश की भी अपनी शर्तें हैं, उसके अनुसार काम करना होगा।'' तमाम बोर्ड बना दिए गए, घोषणाएं कर दी गई, लेकिन उसकी पारदर्शी मॉनिटरिंग नहीं की गई, नतीजा सबके सामने है। निवेशक अपने पैसे की गारंटी चाहता है। उसे माकूल परिस्थिति और सुरक्षा की गारंटी देनी होगी तथा सरकारी मंजूरी की प्रक्रिया को कम बोझिल बनाना होगा।
बिहार में फैक्ट्री नहीं लगने के कारणों में एक इसका 'लैंड लॉक्ड स्टेट' होना भी कहा जाता है। इस संबंध में प्रशांत किशोर कहते हैं, दरअसल, फैक्ट्री यहां इसलिए नहीं लगती है कि बिहार आज पूरे भारत में श्रमिकों-कामगारों का सबसे सस्ता सप्लायर बन गया है। कोई नहीं चाहता है कि यहां फैक्ट्री लगे, क्योंकि यहां अगर फैक्ट्री लग गई तो दूसरे राज्यों के लिए सस्ता मजदूर कहां से आएगा। वहां मजदूरी का खर्च बढ़ जाएगा।'' सच तो ये है कि समुद्र तो पंजाब, मध्यप्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान में भी नहीं है लेकिन वहां तो फैक्ट्रियां लग रही हैं।
असल में नौकरी देने वाली शिक्षा, स्वरोजगार के लिए पूंजी और कमाई वाली खेती के बिना बिहार लेबर सप्लायर स्टेट ही बना रहेगा।