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सुंदरबन से बैंकॉक तक, क्यों धंस रही हैं डेल्टा पर बसी जगहें?

एक स्टडी की मानें, तो नदी के डेल्टा तेजी से धंस रहे हैं। विश्व की 34 बड़ी मेगासिटी में से 10 शहर इन्हीं डेल्टा इलाकों में बसे हैं। फिजी और जकार्ता के पास अपने निवासियों को कहीं और बसाने की योजना तैयार

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, शुक्रवार, 30 जनवरी 2026 (07:56 IST)
शिवांगी सक्सेना
इंडोनेशिया ने अपनी राजधानी जकार्ता को लगभग 1,000 किलोमीटर दूर नुसांतरा में स्थानांतरित करने का फैसला किया। इसकी घोषणा साल 2019 में की गई थी। काम शुरू हो चुका, लेकिन निर्माण और वित्तीय चुनौतियों के कारण इसे पूरा होने में समय लग रहा है।
 
नई राजधानी में सरकारी इमारतें, आवास, सड़कें समेत बुनियादी संरचनाएं नए सिरे से बनाई जा रही हैं। इस परियोजना पर लगभग 32 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है, जिसके लिए 80 प्रतिशत निवेश निजी क्षेत्र से जुटाया जा रहा है।
 
जकार्ता के कुछ क्षेत्रों में जमीन हर साल लगभग 25 सेंटीमीटर नीचे जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर स्थिति रही, तो साल 2050 तक शहर पूरी तरह पानी में डूब सकता है।
 
जर्काता की तरह बैंकॉक भी हर साल एक से दो सेंटीमीटर धंस रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई देश, नदी डेल्टा पर बसे अपने शहर और गांव स्थानांतरित करने पर विचार कर रहे हैं। विशेषज्ञ चेताते हैं कि अगर भारत में भी समय रहते उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले 25 सालों में सुंदरबन डूब सकता है।

क्या होता है नदी डेल्टा?

डेल्टा वहां बनता है जहां नदी समुद्र, झील या महासागर में मिलती है। यूं तो नदी की बहने की अपनी गति होती है, लेकिन समुद्र के पास पहुंचकर यह धीमी होने लगती है और अपने साथ लाई मिट्टी, गाद व रेत वहीं जमा कर देती है। यही जमा हुई मिट्टी धीरे-धीरे नई जमीन का रूप लेने लगती है। इसे डेल्टा कहते हैं।
 
भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र, कावेरी और कृष्णा जैसे डेल्टा हैं। इन इलाकों की मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है, जिसे खेती और मछली पालन के लिए अच्छा माना जाता है। कई बड़े शहर व बंदरगाह भी इन इलाकों में बसे हैं। जैसे शंघाई यांग्त्से डेल्टा और बैंककॉक चाओ फ्राया डेल्टा पर विकसित हुए। उसी तरह भारत में कोलकाता और हावड़ा गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा पर बसे हैं।

क्यों डूब रहे हैं नदी डेल्टा?

दुनियाभर में 50 करोड़ लोग डेल्टा पर निर्भर हैं। एक अध्ययन में 40 बड़े नदी डेल्टा में जमीन की बदलती ऊंचाई को जांचा गया। यह अंतरराष्ट्रीय 'नेचर जर्नल' में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार घटते भूमिगत जल, मिट्टी की कमी और शहरीकरण के कारण ऐसा हो रहा है। ये इलाके भविष्य में बाढ़ और पानी से जुड़ी समस्याओं के लिए बेहद संवेदनशील हैं।
 
यह स्टडी साल 2014 से 2023 के आंकड़ों पर आधारित है। इसमें पाया गया कि हर डेल्टा का कम-से-कम एक प्रतिशत हिस्सा ऐसा है, जहां जमीन का धंसना समुद्र के बढ़ते जलस्तर से तेज है। भारत के पूर्वी तट पर ब्रह्मणी और महानदी डेल्टा दुनिया के सबसे तेजी से धंसने वाले डेल्टा में शामिल हैं।
 
इनकी जमीन का बड़ा हिस्सा हर साल पांच मिलीमीटर से भी अधिक की दर से नीचे जा रहा है। इसके अलावा थाईलैंड का चाओ फ्राया, इंडोनेशिया का ब्रांतास और चीन का येलो रिवर डेल्टा भी तेजी से धंस रहे हैं।

जमीन कितनी धंस रही है?

नेवा और फ्रासर को छोड़ दें, तो 38 डेल्टा की आधी से ज्यादा जमीन धंस रही है। कुल मिलाकर लगभग 4,60,000 वर्ग किलोमीटर भूमि इस समय खतरे में है। दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के डेल्टा सबसे अधिक प्रभावित हैं।
 
केवल सात सबसे बड़े डेल्टा को देखें तो गंगा–ब्रह्मपुत्र, नील, मेकोंग, यांग्त्जी, अमेजॉन, इर्रवाडी और मिसिसिपी का 57 प्रतिशत क्षेत्र धंस चुका है। इसके चलते अलेक्जेंड्रिया, बैंकॉक, ढाका, कोलकाता, शंघाई, जकार्ता और सुराबाया जैसे तटीय शहर संकट में हैं।
 
नदियां अपने साथ लाई हुई गाद और मिट्टी को डेल्टा क्षेत्रों में जमा करती हैं, जिससे वहां की पहले से ही नरम और कमजोर भूमि पर दबाव बढ़ता है। यानी डेल्टा समय के साथ धीरे- धीरे धंसते ही हैं, लेकिन मानव हस्तक्षेप ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज कर दिया है।
 
बड़े पैमाने पर किए जा रहे इंजीनियरिंग के कामकाज और भूमिगत जल व तेल का अत्यधिक दोहन इसके प्रमुख कारण हैं। अनुमान है कि साल 2050 से 2100 तक डेल्टा क्षेत्र, समुद्र का स्तर बढ़ने की दर से पहले ही धंस जाएंगे।
 
सौरभ पोपली, भोपाल के 'स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर' में प्रोफेसर हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने बताया कि नदी अपने साथ मिट्टी, गाद और रेत लाती थी, लेकिन अब ये मात्रा बहुत कम हो गई है। डैम और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए बहुत ज्यादा पानी का इस्तेमाल करना नदियों के प्राकृतिक बहाव को बाधित कर रहा है। बड़े बांध की संख्या में चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरे स्थान पर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में 5,000 से अधिक छोटे और बड़े डैम हैं।
 
बांधों के असर को समझाते हुए सौरभ पोपली बताते हैं, "भारत में अधिकतर नदियां डैम से नियंत्रित होने लगी हैं। नदियों पर बहुत सारे डैम बना दिए गए हैं। मध्यम और छोटे बांधों का उपयोग बड़े पैमाने पर सिंचाई योजनाओं के लिए हो रहा है। हर डैम नदी के साथ बहने वाली तलछट या सेडीमेंट को रोकता है। इसके कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह असंतुलित हो गया है। जो गाद और मिट्टी पहले डेल्टा तक पहुंचती थी, वो अब डैम के आसपास ही जमा हो रही है।"
 
संयुक्त राष्ट्र की एक स्टडी में बताया गया है कि साल 2050 तक भारत के 3,700 डैम में तलछट जमा होने के कारण जल भंडारण क्षमता करीब 26 प्रतिशत कम हो सकती है। इसके कारण सिंचाई, पीने के पानी की उपलब्धता और ऊर्जा उत्पादन समेत अन्य जरूरतों की आपूर्ति में रुकावट आएगी। सौरभ कहते हैं, "पानी और मिट्टी के प्रबंधन के लिए सख्त नियम लागू करना जरूरी है। रेत और भूजल निकालना, अन्य संसाधनों का अति दोहन और वनों की कटाई को रोका जाना चाहिए।"

भारत में सुंदरबन पर मंडराता खतरा

पश्चिम बंगाल में स्थित सुंदरबन, गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना डेल्टा का हिस्सा है। यहां 45 लाख लोग रहते हैं। यह जगह भी खतरे में है। समुद्रस्तर हर साल लगभग 3।9 मिलीमीटर बढ़ रहा है, जो दुनिया के औसत से कहीं ज्यादा है। इसके मुकाबले कुछ हिस्सों में जमीन सालाना करीब तीन सेंटीमीटर नीचे जा रही है।
 
पिछले 24 सालों में लोहाचरा, कबासगाड़ी और साउथ तालपट्टी द्वीप पूरी तरह समुद्र में समा चुके हैं। विश्व बैंक का कहना है कि अगर सदी के अंत तक समुद्र का पानी 45 सेंटीमीटर और बढ़ा, तो इस डेल्टा का करीब तीन-चौथाई हिस्सा डूब जाएगा।
 
'एस्टुअराइन एंड कोस्टल स्टडीज फाउंडेशन' के निदेशक डॉ. सौरव पॉल ने डीडब्ल्यू से हुई बातचीत में बताया कि गंगा के बहाव का रास्ता बदल रहा है और इसका सुंदरबन डेल्टा पर असर दिखने लगा है। सुंदरबन में कुल मिट्टी कम हुई है और तटरेखा की कटाई तेज हो गई है।
 
सौरव कहते हैं, "भारत और बांग्लादेश में फैला सुंदरबन डेल्टा, गंगा और हुगली नदी प्रणालियों में आए भू-आकृतिक (मॉर्फोलॉजीकल) बदलावों से प्रभावित हुआ है। यह असर खासतौर पर फरक्का बैराज के नीचे के क्षेत्र में अधिक देखा गया है। तूफान और बाढ़ की घटनाएं बढ़ गई हैं। इन सब कारणों से स्थानीय लोगों ने धान की खेती की जगह झींगा और सीशेल मछली पालन शुरू कर दिया है।"
 
इनका प्रभाव स्थानीय महिलाओं और बच्चों पर भी पड़ता है। यहां बड़ी संख्या में पुरुष दक्षिण भारत या मध्य एशियाई देशों में काम कर रहे हैं। सुंदरबन की 77 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं प्रजनन और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रही हैं। पलायन के कारण बच्चों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है। कुछ इलाकों में बाल विवाह की संख्या भी 55 प्रतिशत बढ़ गई है।
 
डॉ. सौरव पॉल का कहना है कि जमीन को धंसने को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके लिए मजबूत क्षेत्रीय योजना बनाना आवश्यक है। सरकार को संसाधनों का फिर से वितरण और लोगों के लिए वैकल्पिक आजीविका के बारे में सोचना चाहिए। केवल तुरंत उठाए गए कदम जैसे कि राहत सामग्री पहुंचाना या लोगों को रहने के लिए कहीं और भेज देना समस्या का हल नहीं है। इसके लिए रणनीति और लंबी समय की तैयारी करनी होगी।

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