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मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण की मुहिम को लगेगा झटका, महिला समूहों से छिना जा रहा 1166 करोड़ का पोषण आहार का काम

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Government preparing to change the nutrition food system in Madhya Pradesh
एक तरफ जहा केंद्र की मोदी सरकार महिलाओं को लखपति दीदी बनाने और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर करने का विजन पेश कर रही है, वहीं मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार एक ऐसा फैसला लेने जा रही है जो प्रदेश में करीब 5 लाख महिलाओं के रोजगार पर सीधा प्रहार करेगा। सरकार 1166 करोड़ रुपए के पोषण आहार (टेक होम राशन) प्रोजेक्ट को महिला स्व-सहायता समूहों के हाथों से छीनकर नेफेड (NAFED) को सौंपने की तैयारी में है। इस फैसले से न केवल पूर्ववर्ती शिवराज सरकार का महिला सशक्तिकरण का मॉडल धराशायी होगा, बल्कि प्रदेश में 141 करोड़ रुपए की लागत से स्थापित सातों सरकारी प्लांटों पर भी ताले लग जाएंगे।

केंद्र से लेकर मध्यप्रदेश तक भाजपा की डबल इंजन वाली सरकार में जहां एक ओर महिला सशक्तिकरण' का नारा बुलंद किया जा रहा है, वहीं मोहन सरकार का यह फैसला लाखों महिलाओं के रोजगार को छीनकर उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है। यह कदम आत्मनिर्भर भारत और महिला स्वावलंबन की दिशा में एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

दरअसल राज्य सरकार 1166 करोड़ रुपये के बजट वाली पोषण आहार व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रही है, जिसके तहत 33 लाख बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मिलने वाले टेक होम राशन (THR) को तैयार करने का जिम्मा अब महिला स्व-सहायता समूहों के पास नहीं रहेगा। सरकार इस काम को नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (NAFED) को सौंपने का प्रस्ताव कैबिनेट में लाने वाली है। चूंकि नेफेड खुद राशन तैयार नहीं करता, इसलिए यह आशंका जताई जा रही है कि यह काम फिर से निजी हाथों में चला जाएगा, जिससे प्रदेश के 141 करोड़ रुपये की लागत वाले सातों सरकारी पोषण आहार प्लांटों पर ताले लग जाएंगे।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नेफेड स्वयं पोषण आहार तैयार नहीं करता, जिससे यह काम अंततः फिर से निजी हाथों और बड़ी कंपनियों को जाने की संभावना है। जहाँ पहले महिलाओं के पास हाउसकीपिंग, पैकिंग और सुरक्षा जैसे कामों का जिम्मा था, वहीं अब अनुबंध की अवधि को 2 साल से घटाकर मात्र 3 महीने कर देना उनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहा है।

इस फैसले से देवास, धार, होशंगाबाद, मंडला, सागर, शिवपुरी और रीवा में स्थित प्लांटों में काम करने वाली करीब 5 लाख महिलाएं सीधे तौर पर प्रभावित होंगी। इन समूहों से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि प्लांट बंद होने से वे बेरोजगार हो जाएंगी और कई परिवारों की आजीविका पर संकट आ जाएगा। रीवा, मंडला और सागर जैसे जिलों के महिला समूहों ने गहरी चिंता जताई है कि प्राइवेट कंपनियां आने से स्थानीय महिलाएं बेरोजगार हो जाएंगी और कई परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा।

पोषण आहार व्यवस्था में बदलाव के लिए विभागीय अफसरों ने साउथ की कंपनी के पोषण आहार प्लांट का दौरा भी किया था। इससे विभागीय अफसरों की मंशा पर सवाल उठ रहे है। वहीं एक्सपर्ट बातते है कि अगर रेसिपी में बदलाव किया जाए तो प्लांट को फायदे में लाया जा सकता है। नई रेसीपी को लेकर वर्ष 2023 में महिला एवं बाल विकास आयुक्त ने एक पत्र भी लिखा था। ऐसे में गुणवत्ता सुधार के नाम पर लिया जा रहा यह फैसला महिला सशक्तिकरण के सरकारी नारों को ठेंगा दिखाता नजर आ रहा है।

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