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मध्यप्रदेश में 10 साल में 364 बाघों की मौतों से टाइगर स्टेट के दर्जे पर सवाल?

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भोपाल ब्यूरो

, बुधवार, 21 जनवरी 2026 (14:17 IST)
देश में टाइगर स्टेट का दर्जा रखने वाले मध्यप्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। बाघों की लगातार हो मौतों को लेकर पर्यारण विद अजय दुबे की ओर से जारी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने केंद्र सरकार, राज्य के मुख्य सचिव और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि इतनी बड़ी संख्या में मौतों के बावजूद अब तक कितने दोषियों को सजा मिली है और सुरक्षा के क्या पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। गौरतलब है कि टाइगर स्टेट का दर्जा रखने वाले मध्यप्रदेश में वर्ष 2025 के दौरान 55 बाघों की मौतों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद से किसी भी एक वर्ष में बाघों की मौत की यह सबसे अधिक संख्या है।

10 साल में 364 बाघों की मौत-टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश में किस तरह से बाघों पर संकट मंडरा रहा है इसको इससे समझा जा सकता है कि प्रदेश में बीते 10 सालों में 364 बाघों की मौत हो चुकी  है। इसमें 2025 में 55, वर्ष 2004 में 46, वर्ष 2023 में 45, वर्ष 2022 में 43,  2021 में अब तक 36, 2020 में 30, 2019 में 29, 2018 में 19, 2017 में 27 और 2016 में 34 बाघों की मौत हुई थी। दरअसल मध्यप्रदेश में वर्ष 2025 बाघों के लिए काल साबित हुआ है, जिसमें रिकॉर्ड 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। यह आंकड़ा पिछले एक दशक में सबसे अधिक है। चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या में बाघों की मौतों में से एक बड़ा हिस्सा अस्वाभाविक कारणों से जुड़ा है।
 
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टाइगर स्टेट के दर्जा पर सवाल-प्रदेश में लगातार हो रही बाघों की मौत से मध्यप्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा छीनने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2022 में हुई बाघ गणना में भारत में करीब 3682 बाघ की पुष्टि हुई, जिसमें सर्वाधिक 785 बाघ मध्य प्रदेश में होना पाए गए। मध्य प्रदेश में 9 टाइगर रिजर्व हैं, जिसमें (कान्हा किसली, बांधवगढ़, पेंच, पन्ना बुंदेलखंड, सतपुड़ा नर्मदापुरम, संजय दुबरी सीधी, नौरादेही, माधव नेशनल पार्क और डॉ. विष्णु वाकणकर टाइगर रिजर्व (रातापानी) शामिल हैं।मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सबसे अधिक बाघ हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश में अगर बाघों की ऐसे मौत होती रही तो मध्यप्रदेश अपना टाइगर स्टेट का दर्जा भी खो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक बाघों की टेरिटोरियल फाइट की बड़ी वजह वन क्षेत्रफल का लगातार घटता रकबा है। वैसे तो टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश 77,482 वर्ग किलोमीटर के साथ सार्वक्षिक वन क्षेत्रफल वाला राज्य है लेकिन वनक्षेत्रफल का लगातार घटता रकबा और अतिक्रमण इसकी बड़ी वजह है।

एनवायरमेंटल एक्टिविस्ट अजय दुबे ने हाईकोर्ट में जो याचिका दायर की है, उसमें बाघों के शिकार के बाद नेपाल और चीन में बॉडी पार्ट्स की तस्करी का आरोप लगाया गया है। वहीं अन्य मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बाघों की मौत के पीछे स्थानीय स्टाफ की लापरवाही और शिकारियों से मिली भगत बड़ी वजह हैं। वहीं बाघों की मौतों पर सरकार के  जिम्मेदारों का कहना है कि सरकार इस मामले को लेकर गंभीर है और उच्चस्तरीय मॉनिटिरिंग और जांच की जा रही है। 

दूसरी ओर प्रदेश में बाघों की लगातर मौतों पर कांग्रेस ने सरकरा को घेरा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार को घेरते हुए कहा कि भारत के राष्ट्रीय पशु बाघ की लगातार रहस्यमयी मौतों के आँकड़े बेहद चिंताजनक और आश्चर्यचकित करने वाले हैं। मध्यप्रदेश को “टाइगर स्टेट” कहा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां बाघ सुरक्षित नहीं हैं। सिर्फ़ एक साल में 54 बाघों की मौत सरकार की वन्यजीव संरक्षण नीति की गंभीर विफलता का सच है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और एनटीसीए से जवाब तलब होना इस बात का प्रमाण है कि वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। प्रोजेक्ट टाइगर के इतिहास में पहली बार किसी एक राज्य में एक साल में इतनी अधिक मौतें दर्ज हुई हैं। पिछले पाँच वर्षों में 222 बाघों की मौत यह सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि  वन्यजीव सुरक्षा पर एक गंभीर सवाल है । 

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