Biodata Maker

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

जबलपुर में कृषि विश्वविद्यालय में पारंपरिक फसलों की नई किस्मों पर प्रशिक्षण, किसानों को दिए संरक्षण प्रमाण पत्र

Advertiesment
Agricultural University in Jabalpur
जबलपुर जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग विभाग द्वारा “पादप किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन स्वामी विवेकानंद सभागार में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा रहे, जबकि अध्यक्षता संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. जी.के. कटु ने की। कार्यक्रम में कृषि महाविद्यालय जबलपुर के अधिष्ठाता डॉ. जयंत भट्ट और संचालक विस्तार सेवाएं डॉ. टी.आर. शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर देशी धान की विभिन्न पारंपरिक किस्में उगाने वाले किसानों को कुलपति ने रोली-तिलक और पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया तथा पादप किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्रमाण पत्र प्रदान किए।

कुलपति डॉ. मिश्रा ने कहा कि पादप किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार अधिनियम का उद्देश्य किसानों और प्रजनकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय लगातार धान सहित अन्य पारंपरिक फसलों की नई और उन्नत किस्में विकसित कर रहा है, जिससे किसान कम लागत में अधिक उत्पादन लेकर अपनी आय बढ़ा सकें। संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. कटु ने कहा कि देश में धान की सैकड़ों किस्में हैं, लेकिन पारंपरिक देशी किस्मों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। लुप्त हो रही किस्मों को दोबारा जीवित कर कम पानी और कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन के लिए विकसित किया जा रहा है। इससे किसान पुरानी किस्मों को फिर से उगाकर बाजार और उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकेंगे।

डॉ. टी.आर. शर्मा ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक और पारंपरिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त हो सके। डॉ. स्तुति शर्मा का योगदान अत्यंत सराहनीय रहा। उनके सतत परिश्रम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और किसान-केन्द्रित कार्यशैली के परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय को पीपीवी एंड एफआर (पादप किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार) अधिनियम के अंतर्गत मध्यप्रदेश से किसान किस्मों के पंजीकरण का ऐतिहासिक गौरव प्राप्त हुआ है। डॉ. शर्मा ने वैज्ञानिकों और किसानों के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण करते हुए पारंपरिक ज्ञान, देशी बीजों और स्थानीय किस्मों को कानूनी संरक्षण दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने इन किस्मों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।

उनके नेतृत्व में यह पहल केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न रहकर किसानों के अधिकारों के सशक्तिकरण का जन-आंदोलन बन गई। उनके प्रयासों से किसानों में अपने बीज, अपनी किस्म और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इससे कृषि जैव-विविधता के संरक्षण और टिकाऊ कृषि की दिशा में ठोस कदम संभव हो सके हैं।
 

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

दिल्ली में जा‍ति पूछकर हुई थी महिला यूट्यूबर की पिटाई, दुष्‍कर्म की दी थी धमकी, वीडियो हुआ वायरल