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'पापा लोगों' की प्रसवोत्तर पीड़ा !

वो लंबे नौ महीने

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एक खुशखबर और फिर इंतजार के वो लंबे नौ महीने। वाकई प्रकृति द्वारा नारी को प्रदान की गई सृजन की ये अद्भुत क्षमता कमाल है। प्रकृति की सबसे अनूठी व्यवस्थाओं में से यह एक है। एक स्त्री के साथ-साथ उसके आस-पास का सारा माहौल और उससे जुड़ा हर शख्स यकायक अलग तरह की फुर्ती से भर उठता है। वजन न उठाने देने जैसी हिदायतों के अलावा गर्भवती माँ के साथ जुड़ जाती है हर व्यक्ति की मददगार भावनाएँ भी

छोटी बहन, ननद या देवर उसके आराम का ध्यान रख रहे है। माँ, सासू माँ या घर की बुजुर्ग महिलाएँ सौंठ के लड्डू बनाने में जुटी हैं, पड़ोस वाली भाभी कहती हैं- तेरी जब भी कुछ चटपटा खाने की इच्छा करे, बता देना, पतिदेव और घर के अन्य पुरुष समय-समय पर डॉक्टर के पास चेकअप के लिए जाने की हिदायतें देते रहते हैं और इस तरह पूरे नौ महीने होने वाले बच्चे की माँ केंद्र बिंदु बनी रहती है

फिर होता है बच्चे का जन्म और शुरू होती हैं माँ के साथ बच्चे का भी ध्यान रखने की कवायदें। माँ ने सारी दवाएँ ली या नहीं, उसे आराम मिल रहा है या नहीं, बच्चा ठीक से सो पा रहा है या नहीं, उसका पेट भरा या नहीं, नींद पूरी हुई या नहीं, और भी अनगिनतछोटी-बड़ी बातें पूरे समय सबके दिमाग में चलती रहती हैं। जाहिर है माँ की नींद तो उड़ ही जाती है, लेकिन ऐसे में क्या पिता सच में लंबी तान के सो पाता है?

पहले संयुक्त परिवार प्रणाली में अक्सर बच्चे सबके बीच ज्यादा आसानी से पल जाते थे और अब भी संयुक्त परिवारों में यही होता है। तब माँ के मन में उठ रहे ढेर सारे सवालों के जवाब घर की अनुभवी महिलाओं के पास सहजता से मिल जाया करते थे, जबकि पुरुषों को अधिकांशतः इस सारे मामले से दूर ही रखा जाता था, लेकिन अब एकल परिवारों के चलन में आ जाने से बच्चे का आना माँ तथा पिता दोनों के लिए ही कई सारे सवाल साथ लेकर आता है

ऐसे में माँ को तो फिर भी समाज और परिजनों से तथा पति से भी मानसिक तौर पर मदद मिल जाती है, लेकिन पिता के लिए मदद की इस जरूरत को समझने की कोशिश ही नहीं की जाती। दरअसल प्रसव पूर्व तथा प्रसवोत्तर तनाव, अवसाद एवं चिंता की लहरें जितना माँ को परेशान करती हैं, पिता भी उनसे उतना ही जूझता है। जाहिर तौर पर चूँकि वह शारीरिक तौर पर प्रसव पीड़ाको नहीं सहता, इसलिए उसकी पीड़ा दिखाई नहीं देती और नौ महीने तक अपने ही शारीरिक अंश के रूप में बच्चे को पालती माँ सबकी नजरों में रहती है

आज विज्ञान भी इस बात को स्पष्ट कर चुका है कि पुरुष न केवल मानसिक स्तर पर प्रसव पीड़ा को महसूस करते हैं, बल्कि प्रसवोत्तर मानसिक परेशानी से भी वे गुजरते हैं। स्त्रियों की तरह वे भले ही हार्मोनल बदलाव से नहीं गुजरते, लेकिन उनके मन में भी अपनी नई जिम्मेदारियों तथा बच्चे के पालन-पोषण से जुड़े तमाम मसलों पर विचार चलते रहते हैं।

उन्हें नई जिम्मेदारियाँ उठाना होती हैं, वोभी बिना किसी खास भावनात्मक सहयोग व सुझाव के, जो माँओं को सहज रूप से प्राप्त होता है। बदलते समय के साथ पुरुषों का स्त्री के साथ और ज्यादा सहयोगात्मक तथा दोस्ताना व्यवहार हो चुका है। आज के युवा जानते हैं कि बच्चे केवल माँ की जिम्मेदारी नहीं हैं। इसलिए वे बच्चों की नैपी बदलने से लेकर उन्हें खाना खिलाने और रात को जागने का काम भी बखूबी करते हैं

जाहिर है कि ये सारे काम और फिर बच्चे का रोना, उससे जुड़े खर्चों की चिंता और बाकी जिम्मेदारियों का एहसास उसे न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी थका डालता है। ऐसे में उसे भी सहयोग की दरकार तो होती ही है। बच्चे के आगमन की खुशी मेंमाता-पिता के साथ सम्मिलित होने वाले लोग भी जहाँ माँ को ढेर सारी हिदायतें, सुझाव तथा सहयोगात्मक संवेदनाएँ देकर जाते हैं, वहीं पिता के हिस्से आता है मात्र एक शब्द 'बधाई' का

यहाँ बात माँ को मिलने वाली सुविधाओं तथा सहयोग का विश्लेषण करने की नहीं है, लेकिन खास बात यह है कि इस दौरान एक पिता को भी माँ जितना नहीं तो कम से कम उससे आधा सहयोग तो मिले, यही काफी है

इस संदर्भ में अरनॉल्ड श्वॉर्जेनेगर अभिनीत फिल्म 'जूनियर' की याद दिलाना प्रासंगिक रहेगा। फिल्म में अरनॉल्ड ने एक गायनेको-लॉजीकल साइंटिस्ट 'डॉ. एलेक्स हैसी' की भूमिका निभाई थी, जो एक फर्टिलिटी प्रोजेक्ट का हिस्सा है और एक औषधि की टेस्टिंग की खातिर गर्भधारण करने को राजी हो जाता है। हालाँकि इस टेस्टिंग की अवधि तीन माह ही होती है, लेकिन इस बीच डॉ. हैसी पूरी अवधि तक इंतजार करने का मन बना चुके होते हैं, क्योंकि गर्भधारण करने के बाद वे भी अन्य माँओं की तरह भावनात्मक तथा शारीरिक बदलाव और होने वाले बच्चे से लगाव महसूस करने लगते हैं

हालाँकि यह एक कॉमेडी तथा साइंस फिक्शन फिल्म थी, लेकिन इससे जुड़ा एक संदेश यह भी था कि प्रकृति ने सृजन की जो यह प्रक्रिया बनाई है, वह अपने साथ खुद-ब-खुद भावनाओं, संवेदनाओं तथा जिम्मेदारी के एहसास को लेकरआती है, फिर चाहे उस प्रक्रिया से महिला जुड़ी हो या फिर पुरुष। साथ ही असल में मामला शारीरिक से ज्यादा भावनात्मक एहसास का है

बच्चे के जन्म को लेकर पिता भी उतना ही उत्सुक तथा घबराया होता है जितनी माँ। उसे यदि जिम्मेदारी का एहसास सताता है तो कहीं न कहीं वह यह चिंता भी महसूस करता है कि अब वह शायद समाज में 'अंकल' के रूप में जाना जाएगा या फिर अब शायद उसकी परिवार में उतनी अहमियत नहीं रह जाएगी। ये सारी बातें उसे चकरघिन्नी बना डालती हैं

फिर माँ के साथ-साथ बच्चे के पालन-पोषण से जुड़ी छोटी-छोटी बातें औरचिंताएँ उसे परेशान करती रहती हैं। यही सब चिंताएँ महिलाओं को भी होती हैं और इन्हें समझने वाले भी उनके आस-पास होते हैं, लेकिन पुरुष के संदर्भ में किसी को इनका खयाल ही नहीं आता

हमारा सामाजिक ढाँचा इस तरह का है कि हम पुरुष को 'मर्र्द' बनाने के चक्कर में उसकी भावनाओं की परत को पूरी तरह छुपा डालते हैं। हम उसे इस रूप में न तो समझते हैं न ही समझना चाहते हैं, जबकि उसे भी भावनात्मक सहयोग की उतनी ही जरूरत होती है, जितनी किसी महिला को और पिता बनते समय तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। तो अब यदि किसी दम्पति के घर नन्ही खुशियों के आने की बधाई देने जाएँ तो बेबी की ममा को हिदायतें देने के साथ कहना न भूलें- 'टेक केयर बेबी के पापा।'

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