लाइन में लगने की आलोचना करने वालों के मैं सख़्त ख़िलाफ़ हूं। लाइन में लगने के ढेर सारे लाभ हैं। यही वजह है कि आज़ादी के बाद पैदा हुए हम जैसे लोगों को हर सरकार ने लाइन लगना सिखाया।
याद करिए कहां कहां लाइन में लगना पड़ा है
बचपन में चीनी और मिट्टी के तेल के लिए लाइन लगती थी। एक दौर में सीमेंट भी राशनिंग में था। बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, सरकारी और निजी अस्पतालों —हर जगह लाइन आज भी कायम है। बीच में सिम के लिए उसके पहले पीसीओ पर भी लाइन लगती थी। कभी-कभार तो प्याज़, लहसुन और दाल के लिए भी।
कुल मिलाकर, सरकारें हमेशा चाहती रही हैं कि हम इस महान परंपरा और इसके लाभ को भूलें नहीं। कौन जाने, कब किस चीज़ के लिए लाइन लगानी पड़ जाए! कितनी अद्भुत बात थी—एक दशक पहले, जब पूरे देश ने अपनी ही जमा पूंजी निकालने के लिए बैंकों और एटीएम के सामने लाइन लगाई। वह भी लगातार, कई दिनों तक।
कोविड के समय तो हालात और भी “उन्नत” हो गए— ऑक्सीजन, श्मशान और कब्रिस्तान तक के लिए लाइनें लग गईं। अब रसोई गैस के लिए भी वही नज़ारा है।
लाइन लगाने के लाभ
दरअसल, लाइन में लगने के ढेरों फायदे हैं— यह आपको अनुशासन, धैर्य ,सहकार और समायोजन भी सिखाती है। लाइन समाजवाद का भी प्रतीक है। यह आम और खास आदमी में क्या अंतर होता है, इसका भी अहसास कराती है। दरअसल, लाइन सिर्फ इंतज़ार नहीं हमें झुकना और चुप रहना सिखाती है। यह धीरे-धीरे उम्मीद कम करना सिखा कर इंसान को भाग्यवादी बना देती है। इसके बाद जब इंसान सब कुछ अपनी तकदीर को मान लेता है तो उसे किसी से शिकायत नहीं रहती। यह हर काल में देश दुनिया के किसी भी शासन के लिए बेहद माकूल स्थिति मानी जाती रही है। भारत तो इसकी मिसाल है। चमत्कार और भाग्य में हमारा भारी यकीन है। मंदिरों पर लगी लंबी लंबी लाइनें इसका प्रमाण हैं।
सीमित रोजगार भी उपलब्ध कराती है लाइन
आपकी जगह कोई और भी लाइन में लग सकता है— और कुछ लोगों को तो इस दौरान अस्थायी रोजगार भी मिल जाता है। यानी सीमित ही सही, पर “लाइन अर्थव्यवस्था” रोजगार भी पैदा करती है। लाइन आपके रुतबे का भी प्रतीक है। मेरी समझ में तो लाइन लगने को एक कौशल घोषित कर दिया जाए। और इसके लिए शिक्षण संस्थाओं में स्व वित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाएं जाएं। इसमें लाइन में लगने और लाइन के प्रबंधन जैसे पाठ्यक्रम हो। प्रशिक्षित लोगों को उन देशों में भेजा जाए जहां अब भी लाइन लगाने की परंपरा है। ये किसीके बदले में लाइन में लगेंगे। इसके लिए उनको घंटे के हिसाब से पेमेंट मिलेगा। कमाने वाला और उसका परिवार तो खुश होगा ही। देश की विदेशी मुद्रा में बढ़त बोनस होगा।
अगर लाइन के दौर में आपका काम बिना लाइन लगे हो जाए, तो आप रसूखदार माने जाएंगे। हालांकि, इसके साथ बद्दुआएं भी मुफ्त मिलती हैं और कभी-कभी लाइन तोड़ने पर शर्मिंदगी भी।
एक सच्ची घटना
एक बार मैं गोरखपुर में एक परिचित और नामचीन बाल रोग विशेषज्ञ के क्लीनिक पर गया। उनका राजनीति से भी सरोकार था, तो बातचीत शुरू हो गई। उधर बाहर लोग अपने बच्चों को दिखाने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। कुछ देर बाद जब मैं बाहर निकला, तो दरवाज़े पर मेरी पड़ोस की बुआ जी खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और बस इतना कहा— “अच्छा! बाबू तूही बैठल रहल…”
अब मैं क्या ही कहता…
तभी से तय कर लिया— डॉक्टर के यहां लाइन तोड़ूंगा जरूर, लेकिन उनसे यह भी कहूंगा कि बातचीत के साथ मरीज भी देखते रहें!
About Writer
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। ....
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