rashifal-2026

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को सकारात्मक दृष्टि से देखें

Advertiesment
हमें फॉलो करें सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा
webdunia

अवधेश कुमार

, मंगलवार, 27 जनवरी 2026 (10:45 IST)
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तीन दिवसीय कार्यक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जैसी भी रही हो देश ने इससे सकारात्मक संदेश लिया है। कार्यक्रम के आकर्षक दृश्यों ने देश में अपने इतिहास -संस्कृति -सभ्यता -अध्यात्म को लेकर सुदृढ़ हो रही चेतना को और सामूहिक बल प्रदान किया है। स्पष्ट है पूरे कार्यक्रम की योजना अत्यंत गंभीर विवेचन के बाद बनी जिसमें अध्यात्म, साधना व कर्मकांड सहित इतिहास और पराक्रम का समुच्चय उचित रूप में समाहित था। 
 
तीन दिनों के मंत्र जाप के कर्मकांडीय विधान के पीछे संपूर्ण वातावरण में सकारात्मक चेतना और ऊर्जा पैदा कर ब्रह्मांड के कल्याण में योगदान का भाव था तो 108 घोड़े के शास्त्रीय विधान के साथ शौर्य यात्रा न केवल सोमनाथ संघर्ष में बलिदान हुए लोगों को श्रद्धांजलि की ओर लक्षित था बल्कि आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी था। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया। पूजा और अभिषेक के बाद उपस्थित जन समुदाय का संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जिनने सोचा कि सोमनाथ मंदिर नष्ट हो गया वे कहीं समाप्त हो गए लेकिन आज भी सोमनाथ का यह पताखा लहराता हुआ बता रहा है कि हम पर चाहे जितने हमले हों हमें नष्ट नहीं कर सकते। अंत में उन्होंने कहा भी कि इसी विश्वास के साथ हमें भारत को आगे बढ़ाना है तथा दुनिया की ऐसी शक्ति बनानी है जो विश्व कल्याण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सके। 
 
2026 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लिए दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक, 1026 में महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था, जिसके 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। दूसरे, 11 मई, 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष हो गए हैं।

वर्तमान राजनीति एवं अन्य बौद्धिक क्षेत्र में इसे जैसे भी देखा जाए अगर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, विद्वान और नेता कन्हैयालाल मानणक लाल मुंशी सहित अनेक महापुरुषों ने इसके पुनर्निर्माण किया तो निश्चय ही इसके पीछे गंभीर विमर्श और चिंतन था। 
 
सोमनाथ का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है- "सौराष्ट्रे सोमनाथं च"।‌ इसका अर्थ है कि सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। सोमनाथ पहला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती के संगम पर स्थित है।

इस त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का अपना अलग महत्व है। मंदिर परिसर के बाणस्तंभ पर संस्कृत (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग) और दूसरी तरफ इंग्लिश में एक अभिलेख है। इसमें लिखा है- इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है। यह वही स्थान माना जाता है जहां भगवान कृष्ण ने अपना शरीर त्याग कर वैकुंठ गमन किया था। 
 
सोमनाथ: द श्राइन इटरनल पुस्तक में केएम मुंशी ने लिखा है कि गजनवी ने 18 अक्टूबर, 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ना शुरू किया और लगभग 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को किलेबंद मंदिर शहर पर हमला कर दिया।‌‌ सोमनाथ मंदिर में लूट और विध्वंस की घटना 8 जनवरी, 1026 की है। अनेक लोगों ने प्रश्न उठाया कि आखिर विध्वंस का उत्सव कैसे मनाया जा सकता है? 
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। आक्रांता आते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से खड़ा हुआ। इतना धैर्य, संघर्ष और पुनर्निर्माण का उदाहरण दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है।

उनका यह वक्तव्य सबसे ज्यादा बहस का विषय बना है कि सोमनाथ को तोड़ने वाले आक्रांता आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से देश में आज भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जो मंदिरों के पुनर्निर्माण का विरोध करती रही हैं। इसे राजनीतिक वक्तव्य मान सकते हैं। किंतु सोमनाथ के इतिहास को बार-बार विकृत करने की कोशिश हुई। 
 
कुछ का मानना है कि सोमनाथ सात बार लूटा गया जबकि कुछ 17 आक्रमण की बात करते हैं। सबसे पहला आक्रमण मोहम्मद बिन कासिम के सूबेदार जुनैद ने किया था और अंतिम हमला औरंगजेब द्वारा। यानी 980 ई से लेकर 1702 तक सोमनाथ पर लगातार हमला होता रहा तो इसके पीछे केवल धन लूटना कारण नहीं हो सकता इस पर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने, 1394 में मुजफ़्फर खान ने और 1459 में, महमूद बेगड़ा ने हमला किया था।‌

इसके बावजूद मंदिर रहा व औरंगजेब ने 1669 में इसे गिराने का आदेश दिया तथा 1702 में इतना तोड़ दिया गया कि मरम्मत नहीं हो सकी और 1706 में इसे मस्जिद में बदल दिया गया। क्या इसे आप लूट का इतिहास कहेंगे? नहीं तो इतिहासकारों ने सच्चाई का दमन क्यों किया? 
 
रानी अहिल्याबाई होल्कर ने द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण सोमनाथ की महत्ता को पहचानते हुए 1783 में पास में एक नया मंदिर बनवाया तथा विधिपूर्वक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। उनकी सोच थी कि जब वास्तविक जगह पर मंदिर बनेगा तो बनेगा किंतु द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में जाने वाले मस्जिद के पास से लौट जाएं यह अच्छा नहीं होगा, इसलिए वहां एक भव्य मंदिर होना चाहिए। 
 
स्वतंत्रता के बाद पिछले लगभग 1000 वर्ष के काल में ध्वस्त प्रेरणा, चेतना और भारत की अंत:शक्ति के केन्द्रों के पुनरुद्धार की बात उठी और इनमें सबसे पहला स्थान सोमनाथ का ही था। सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ गए और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। मंदिर के निर्माण और धन की व्यवस्था के लिए सोमनाध ट्रस्ट की स्थापना की गई।‌

15 दिसंबर, 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया तो मंदिर का दायित्व केएम मुंशी को दिया गया। राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद यजमान बने, 1950 में आधारशिला रखी गई और 5 - 6 महीने में पहले चरण का काम पूरा हो गया। जनता द्वारा चंदे से लगभग 25 लाख रुपए इकट्ठे हुए थे। 11 मई, 1951 को राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने प्राण प्रतिष्ठा की। वैसे मंदिर संपूर्ण रूप में बनकर 1955 में तैयार हुआ। 
 
यहां इनमें विस्तार से जाना संभव नहीं है। किंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, केएम मुंशी, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एवं अन्य नेताओं के बीच संबंधित पत्र व्यवहार देखेंगे तथा सार्वजनिक वक्तव्यों पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चल जाएगा कि इसका कितना विरोध हुआ। पंडित नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन न वे सरदार पटेल को रोक सके न मुंशी को और न डॉ राजेंद्र प्रसाद को। इनके कारण अन्य नेता भी इसमें लगे। 
 
डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाकर परंपरा स्थापित किया था कि गुलामी के कालखंड में ऐसे ध्वस्त स्थानों का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण होना चाहिए और उसमें सरकार का शीर्ष नेतृत्व भी भूमिका निभा सकता है। हां, निर्माणों में सरकारी पैसा न लगे इसका ध्यान रखा गया। महात्मा गांधी ने भी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से सहमति व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सरकारी खजाने से इसमें एक पैसा नहीं लगना चाहिए। 
 
कहने का तात्पर्य कि सेक्यूलरवाद के नाम गलत सोच और व्यवहार तब से आज तक कायम है। इसीलिए समस्याएं आती हैं और ऐसे कार्यों को सांप्रदायिक, फासीवादी और न जाने क्या-क्या नाम दे दिया जाता है। 
 
आखिर विदेशी आक्रमणकारियों से लेकर देश के अंदर मजहबी सोच वाले हमलावरों ने सोमनाथ और ऐसे दूसरे मंदिरों को निशाना क्यों बनाया? मेहमूद गजनवी और उसकी फौज ने केवल संपत्ति लूटकर सोमनाथ मंदिर का विध्वंस नहीं किया था बल्कि उपस्थित व्यक्तियों को मार दिया या बंदी बनाकर अपने साथ ले गया। स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा गया। बलात्कार हुए, क्रूरतापूर्वक हत्याएं हुईं या बंदी बनाकर ले जाईं गईं, जिन्हें गुलामों के बाजार में बेचा गया।‌ 
 
मंदिर परिसर में 50 हजार लोगों के उपस्थित होने की बात है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का कत्लेआम इतिहास के क्रूरतम अध्यायों में से एक है। मिन्हाज सिराज के अनुसार गजनवी ने मूर्ति के चार टुकडे किए थे, एक गजनी की जमी मस्जिद में, दूसरा उसे शाही महल की सीढ़ियों पर, तीसरा मक्का और चौथा मदीना भेज दिया। महमूद ने मूर्तियों को गलियों और मस्जिद की सीढ़ियों पर डलवा दिया। उसने कहा नमाज के लिए जाने वाले नमाजी इन बूतों को पैरों तले रौंदेंगे।

अलबरूनी गजनवी के साथ ही आया था और उसने अनेक बातें इसके संदर्भ में लिखी है। तो स्वाभिमान पर्व से इतिहास के सारे सच देश के सामने आए जिसमें मजहबी सोच से हमलों‌ और उसके प्रतिरोध तथा पुनर्निर्माण के प्रयास शामिल है। इससे यह विश्वास और गहरा हुआ है कि हमारी शाश्वत अंत:शक्ति को कोई नष्ट नहीं कर सकता। वास्तव में ऐसे पर्व हमारे लिए प्रेरणा और स्थायी आत्मविश्वास के कारण बनते हैं।
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

देशप्रेम का बीज