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जब डुमरियागंज संसदीय सीट पर जब्त हुई मोहसिना की जमानत

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार रहीं मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में निधन

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Mohsina kidbwai
Mohsina Kidwai, passed away: श्रीमती मोहसिना किदवई उस दौर की नेता थीं जब राजनेताओं का अपना एक व्यक्तित्व, वजूद, वसूल और सम्मान हुआ करता था। उनका दायरा व्यापक था। ऐसे नेता दल और सभी समीकरणों पर भारी पड़ते थे। पूर्वांचल के लोग भले ही उन्हें कभी पूरा भाव न दें, लेकिन वे बड़ी नेता थीं—बाराबंकी जिले की मूल निवासी, अवध के कुलीन मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वालीं।
 
मोहसिना किदवई का निधन आज 8 अप्रैल 2026 को 94 वर्ष की आयु में दिल्ली/नोएडा के एक निजी अस्पताल में हो गया। उनका जन्म 1 जनवरी 1932 को हुआ था।

28 वर्ष की आयु में राजनीति में प्रवेश

उन्होंने 1960 में मात्र 28 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश विधान परिषद (विधानसभा नहीं, बल्कि विधान परिषद) के सदस्य के रूप में राजनीति में प्रवेश किया और 1974 तक 14 वर्ष तक इस पद पर रहे। 1974-77 में वे मसौली (बाराबंकी) विधानसभा सीट से विधायक चुनी गईं। प्रदेश सरकार में उन्होंने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति राज्य मंत्री (1973-74), हरिजन एवं सामाजिक कल्याण कैबिनेट मंत्री (1974-75) तथा लघु उद्योग कैबिनेट मंत्री (1975-77) के रूप में कार्य किया।
 
लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व तीन बार हुआ—1978 में आजमगढ़ (उपचुनाव) से 6वीं लोकसभा, 1980 में मेरठ से 7वीं लोकसभा और 1984 में मेरठ से 8वीं लोकसभा। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों में वे केंद्रीय मंत्री रहीं। उनके प्रमुख पद इस प्रकार थे:
  • श्रम एवं पुनर्वास राज्य मंत्री (1982-83)
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री (1983-84)
  • ग्रामीण विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा पूर्ण मंत्री (1984)
  • परिवहन मंत्री
  • शहरी विकास मंत्री (22 अक्टूबर 1986 से 2 दिसंबर 1989)
  • पर्यटन (अतिरिक्त प्रभार)।
वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रहीं। 2004 से 2016 तक (दो कार्यकाल) छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सांसद रहीं। 2022 में उनकी आत्मकथा माई लाइफ इन इंडियन पॉलिटिक्स( My Life in Indian Politics) हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक के युग को अपनी आंखों देखा राजनीतिक सफर को दर्ज किया।
 
रही बात डुमरियागंज (डोमरियागंज) संसदीय सीट की—नेपाल की सरहद से सटी इस पूर्वांचल सीट पर उन्होंने जातीय समीकरण के मद्देनजर 1991 और 1996 में अपनी किस्मत आजमाई। 1991 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में वे दूसरे स्थान पर रहीं (भाजपा के रामपाल सिंह से हारीं)। 1996 में ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) के टिकट पर मैदान में उतरीं, लेकिन मात्र 5.62% वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गई।
 
नामचीन पत्रकार सीमा मुस्तफा भी जातीय समीकरण के आधार पर दिल्ली से यहां चुनाव लड़ने आईं, लेकिन उन्हें भी शिकस्त मिली। ये लोग चुनाव जीतने में भले न सफल रहे हों, पर इनके मैदान में आने से डुमरियागंज सीट खूब सुर्खियों में रही। उनके व्यक्तित्व, ईमानदारी और कांग्रेस के प्रति समर्पण ने उन्हें कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में जगह दिलाई। एक दौर में पूर्वांचल के लोग भले ही उन्हें भाव न दिए हों, लेकिन श्रीमती मोहसिना किदवई का योगदान भारतीय राजनीति, खासकर महिलाओं और मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी में अमिट है। उनके निधन से कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लगा है।

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