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अवैध कब्जा हटाने व दंगा आरोपियों को जमानत न मिलने पर ऐसा रवैया चिंताजनक

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Delhi Turkman Gate
राजधानी दिल्ली का तुर्कमान गेट पूरे देश में चर्चा का विषय है। पाकिस्तान द्वारा इस पर दिए गए वक्तव्य को आधार बनाएं तो कह सकते हैं इसकी चर्चा सीमा पार भी चला गया है। चर्चा अगर सकारात्मक और उचित हो तो चिंता का कोई कारण नहीं। किंतु यहां तो एक ओर दिल्ली नगरपालिका परिषद द्वारा अवैध निर्माण को गिराने और उसकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस तथा सामने विरोध और पत्थरबाजों से टकराव। 
 
अगर इसके दो दिन पहले वापस लौटें तो फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में उमर खालिद और सर्जिल इमाम की जमानत याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना सबसे ज्यादा चर्चा और बवंडर का विषय था। इन दोनों घटनाओं को एक साथ मिलकर देखिए तो कुछ समानताएं दिखेंगीं तथा निष्कर्ष चिंताजनक आएंगे।

दोनों मामलों में न्यायपालिका विद्यमान है। जमानत खारिज करने और उनके साथ पांच अन्य आरोपियों को जमानत देने का आदेश हमारे शीर्ष न्यायपालिका का है तो अवैध निर्माण खाली करने का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय का। इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं को न्यायालय ने तत्काल सुनवाई के योग्य नहीं माना तथा आगे की तिथि निर्धारित कर दी। बावजूद जिस तरह से इसका विरोध हुआ, हो रहा है और जैसी प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं उनको कैसे देखा जाए? 
 
ध्यान रखिए, उमर खालिद और सर्जिल इमाम की जमानत याचिका छठी बार खारिज हुई है। दो बार ट्रायल न्यायालय में, दो बार दिल्ली उच्च न्यायालय में और दूसरी बार उच्चतम न्यायालय ने। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि एक वर्ष तक अब आरोपी किसी भी न्यायालय में जमानत याचिका नहीं डाल सकते हैं।

क्या हम मानते हैं कि उच्चतम न्यायालय बिना ठोस तथ्यों और सबूतों को देखे हुए ऐसा आदेश दे देगा? उसने जिन पांच लोगों को जमानत दी उनके साथ भी 12 कठोर शर्तें लगाई है। उसमें स्पष्ट लिखा है अगर इन शर्तों का उल्लंघन हुआ तो निचला न्यायालय उनकी जमानत रद्द कर सकता है। 
 
इससे समझा जा सकता है कि न्यायालय के सामने किस तरह की सच्चाइयां प्रस्तुत हुईं हैं। ऐसा तो है नहीं कि इन दोनों के लिए मुकदमा लड़ने वाले वहां नहीं थे। सच यह है कि दिल्ली पुलिस की ओर से तो केवल सरकारी वकील थे, जबकि दूसरी तरफ प्रमुख नामी वकीलों की फौज थी। यही हाल दिल्ली तुर्कमान गेट इलाके के मुकदमों का भी था।

फैज़ ए इलाही मस्जिद, जिसे लेकर दुष्प्रचार किया गया उसे वक्फ की संपत्ति कहा गया है। कहा जाता है कि उस मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के ही काल में हुआ था। शाही जामा मस्जिद जहां मुगल शासक परिवार से लेकर समाज के उच्च वर्गीय मुसलमानों के लिए थी वहीं सामान्य मुसलमानों के लिए फैज ए इलाही मस्जिद बनाई गई।
 
हम इसमें नहीं जाना चाहते कि सच क्या है। मुख्य बात है कि मस्जिद के आसपास चारों तरफ ताकत और संख्या बल की बदौलत सरकारी जमीनों पर कब्जे कर व्यावसायिक स्थल खड़े किए गए उनको हटाया जाना आवश्यक था।

आम दिल्ली में रामलीला मैदान से दरियागंज की ओर के रास्ते में मुड़ेंगे तो सामने हज मंजिल दिखाई देगा। उसी के पीछे यानी बाएं से आगे बढ़िए तो पूरा तुर्कमान गेट का इलाका है। उसी रास्ते में फैज ए इलाही मस्जिद से लेकर जमा मस्जिद के बीच अनेक मस्जिदें हैं। हर कुछ दूरी पर आपको मस्जिदें दिखेगी। कभी किसी सरकारी विभाग ने उन मस्जिदों को तोड़ने की कोशिश तक नहीं की।
 
फैज ए इलाही मस्जिद के इर्द-गिर्द बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर, पुस्तकालय, दुकानें सब बना लिए गए। रामलीला मैदान की जमीन कब्जाई गई। खाली करने की कोशिश करने वालों की हमेशा शामत आ जाती थी। उस रास्ते पर दिन में चलना तक मुश्किल हो चुका था। स्थानीय लोगों की मांग खाली करने की थी। दिल्ली नगर पालिका परिषद में वर्षों से अनेक पत्र और आवेदन इसके लिए आते रहे हैं। थाने में वहां आपराधिक गतिविधियों की शिकायतें आम बात हैं। 
 
अब आप सोचिए क्या अवैध जमीन पर, भले वह मस्जिद से लगी हुई हो ,बारात घर, क्लीनिक या डायग्नोस्टिक सेंटर, व्यावसायिक लाइब्रेरी, दुकानें बनाना इस्लामी कृत्य है? क्या उसे तोड़ना इस्लाम या मुसलमान के विरुद्ध माना जाएगा? जिस मस्जिद को खरोंच तक नहीं आई, उसको आधार बनाकर जिन लोगों ने पुलिस से टकराव की पहले से तैयारी की उनके बारे में क्या कहा जाए? भले यह विषय यहां नहीं है किंतु क्या किसी मजहब, पंथ का स्थल अगर सरकारी जमीन पर हो तब भी क्या उसे स्पर्श नहीं किया जाएगा?
 
कुछ लोगों का तर्क है कि कार्रवाई रात में क्यों की गई? उस क्षेत्र में दिन में कार्रवाई करने का मतलब चारों तरफ के ट्रैफिक को रोक देना होता और इसके परिणाम भयानक हो सकते थे। सामान्य स्थिति में वहां बुलडोजर, डिम्पल, गाड़ियां जा ही नहीं सकती थी। सोचिए, अगर रात में कार्रवाई के बाद इतनी पत्थरबाजी हुई तो दिन में कैसी तस्वीर होती? 
 
उमर खालिद, सर्जिल इमाम की जमानत न मिलने को भी इस्लाम और मुस्लिम मुद्दा बनाया गया तो तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे को मुक्त करने के अभियान को भी। आप बहुत बड़े वर्ग की देशभर की प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। टीवी चैनलों के डिबेट, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया में आये वक्तव्यों पर नजर डाल दीजिए तथा जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं वो देश के वर्तमान और भविष्य को लेकर किसी को भी भयभीत करने वाले हैं। 
 
तुर्कमान गेट मामले में बाजाब्ता यूट्यूब चैनलों पर फिल्मों के दृश्य की तरह लोगों को अल जिहाद, अल जिहाद गाने के साथ संघर्ष के लिए उत्तेजित किया गया। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इतनी भीड़ में पत्थर किन-किन ने चलाई सबकी पहचान असंभव है।

उमर खालिद सर्जिल इमाम के रिहा होने पर अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के कब्र खोदने के नारे लग रहे हैं, भारत की संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक भगवा ध्वज तक की कब्र खोदने के नारों से पता चलता है कि समाज के अंदर किस तरह झूठ के आधार पर जहर और बारूद पैदा किया जा चुका है। 
 
दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं में भाजपा विरोधियों ने भी अपराध को अपराध, अवैध कब्जे को अवैध कब्जा कहने की जगह इनको राजनीतिक मुद्दा बनाया है। इसका लाभ पाकिस्तान जैसा देश उठाने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि पाकिस्तान ने स्वयं अपने यहां अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों का समूल नाश किया है‌। मुस्लिम समुदाय के बहुत बड़े वर्ग में यह भावना घर करा दी गई है कि नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है, यह भारत में मुसलमानों को नष्ट करना चाहते हैं, मस्जिदें, मदरसे, दरगाह इस्लामी रीति-रिवाज सब उनके निशाने पर हैं। 
 
एक वर्ग में यह भाव भी पैदा किया जा रहा है कि न्यायालय तक पर मोदी सरकार का नियंत्रण है और उनके मन के अनुसार मुसलमान और विरोधियों के विरुद्ध वो फैसला दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने जमानत रद्द करते हुए या तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे पर न्यायालय ने जैसी टिप्पणियां की है वास्तव में चिंता उनसे होनी चाहिए।

न्यायालय की दृष्टि में उमर खालिद, सर्जिल इमाम जैसे लोग नागरिकता संशोधन कानून या नेशनल नागरिकता रजिस्टर के विरुद्ध लोगों को भड़काने, हिंसा की योजना बनाने, उनके लिए सामग्रियां जुटाने आदि में सम्मिलित दिखते हैं। 
 
इस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, गैर कानूनी कमाई करना उसके आधार पर दादागिरी और धौंसपट्टी जैसी भूमिका अपराधियों की ही मानी जाएगी। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में ऐसा लगता है कि पूरा शहर और जिले का बहुत बड़ा भाग ही कब्जा लिया गया।

मौलिक, उनसे जुड़े स्थल, तालाब, कुएं कब्जाए गए या ध्वस्त कर, जमींदोज कर उन पर र्निर्माण कर दिए गए। इनके विरुद्ध कार्रवाई और खाली कराने के आदेश या दंगे के आरोपियों की जमानत रद्द करना मुसलमान या इस्लाम की रक्षा लड़ाई कैसे हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर आप अवश्य तलाशिए क्योंकि यह भारत के अखंड राष्ट्र के रूप में बने रहने का प्रश्न भी है।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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