मनोज रुपड़ा जी को मैं जानता हूं. हमने जबलपुर में अनिलकुमार फाउंडेशन के साहित्य आयोजन में साथ में शिरकत की थी। होटल से वेन्यू तक जाते हुए उनसे वहां तक छोड़ने वाली कार में मेरी मुलाकातें होती थीं. कार में मेरे बाजू में बैठे हुए वे सिगरेट पीते हुए किसी वॉइड (शून्य) में शायद अपनी कहानियों के बारे में और अपने किरदारों के बारे में सोचते रहे होंगे. इसी वजह से मैंने उनकी ख़ामोशी में दखल देकर खलल डालने की कोशिश नहीं की. और उनसे बात नहीं की. कुछ देर की खामोशी के बाद उन्होंने मुझसे ही पूछ लिया— क्या लिखते हैं आप? मैंने कहा कविता. उन्होंने मेरे हाथ में मेरी कविता की पहली किताब देखकर उसे लेते हुए कहा— अरे वाह इसका शीर्षक तो बहुत कमाल है! फिर उन्होंने कहा, लेकिन मैं तो कहानियां लिखता हूं. उनके साथ कुछ और भी बातें हुईं— साथ में विनोद पदरज भी थे. एक बेहद गंभीर चेहरे वाले लेखक को अचानक मुझसे इतना बतियाने हुए मुझे लगा कि मैंने उनके साथ कुछ ज्यादा ही एरोगेंसी दिखा दी. पहले मुझे ही उनसे बात कर लेनी चाहिए थी— हालांकि मेरा मकसद उनके शून्य में खलल नहीं डालना था, इसलिए मैं चुप बैठा रहा. बाद में प्रोग्राम के दौरान भी उनसे छिटपुट बातचीत होती रही.ये छत्तीसगढ़ के विलासपुर की गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं, साहित्य अकादमी के आयोजन में चुटकुले सुना रहे थे।
— Ashok Kumar Pandey अशोक اشوک (@Ashok_Kashmir) January 9, 2026
इन्होंने सामने बैठे हिन्दी के वरिष्ठ लेखक मनोज रूपड़ा से पूछा- बोर तो नहीं हो रहे?
उसके बाद जो हुआ वह खुद सुनिए। ऐसे-ऐसे लोगों को कुलपति बनाकर बिठाया गया… pic.twitter.com/YIrEykAcLB