Publish Date: Wed, 01 Apr 2026 (11:12 IST)
Updated Date: Wed, 01 Apr 2026 (11:21 IST)
देश में नक्सलवाद के समाप्त होने की घोषणा,भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है,इससे देश के पिछड़े क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर गहरें प्रभाव पड़ने और समग्र विकास से जुड़ने की उम्मीदें बढ़ गई है। अब देश के बड़े क्षेत्रों में आम नागरिक भयमुक्त जीवन जी सकेंगे। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच संघर्ष के कारण जो अस्थिरता थी,वह खत्म होगी और लोग शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों का लाभ उठा पाएंगे। सड़क,बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं दूर-दराज के गांवों तक पहुंचेंगी और शासन की प्रभावी पहुंच दूरस्थ क्षेत्रों में सुनिश्चित होगी।
पिछले कई दशकों से भारत में नक्सलवाद एक गंभीर आंतरिक सुरक्षा खतरा था,जिसने छत्तीसगढ़,झारखंड और ओडिशा,आंध्रप्रदेश,तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के बड़े आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित किया। यह केवल सुरक्षा बलों पर हमलों तक सीमित नहीं था,बल्कि प्रशासनिक ढांचे को चुनौती देता था। बस्तर जैसे क्षेत्रों में नक्सलियों ने समानांतर सत्ता स्थापित करने की कोशिश की। विकास कार्य बाधित हुए, आदिवासी समाज भय और असुरक्षा में जीता रहा। नक्सलवाद ने लोकतांत्रिक संस्थाओं,आर्थिक प्रगति और सामाजिक स्थिरता को गहराई से प्रभावित किया, जिससे यह देश के लिए एक दीर्घकालिक और जटिल खतरा बन गया था।
अमित शाह देश के पहले ऐसे गृहमंत्री रहे जिन्होंने बेखौफ नक्सली इलाकों में जाकर सुरक्षाबलों का हौंसला बढ़ाया और नक्सलियों को चुनौती देकर उनकी समय सीमा तय कर दी थी। नक्सलियों ने लंबे समय तक आदिवासी क्षेत्रों में भय और भ्रम का माहौल बनाकर अपनी पकड़ मजबूत की थी। बस्तर जैसे इलाकों में उन्होंने स्थानीय लोगों को शासन के खिलाफ उकसाया और सरकारी योजनाओं से दूर रहने के लिए दबाव बनाया। इससे आदिवासी समाज विकास की मुख्यधारा से कटता गया। डर और असुरक्षा के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं इन क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाईं।
कई जगह नक्सलियों ने ठेकेदारों,शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों को निशाना बनाया,जिससे विकास कार्य बाधित हुए। इसके साथ ही,उन्होंने खुद को आदिवासियों का हितैषी बताकर उन्हें गुमराह किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आदिवासी इलाके लंबे समय तक पिछड़े रहे। आज जब नक्सल खत्म हुआ है तब इन क्षेत्रों में विकास की गति तेज होने और लोगों के जीवन स्तर में सुधार की संभावनाएं बढ़ी हैं। अब आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त होगा। उनकी जमीन,संस्कृति और अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकेगा। निवेश और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी,जिससे क्षेत्र की प्राकृतिक संपदाओं का संतुलित उपयोग संभव होगा। नक्सलवाद का खत्म होना शांति,विश्वास और समावेशी विकास की स्थापना का प्रतीक होगा,जहां राज्य और समाज के बीच विश्वास बहाल होगा और लोकतंत्र जमीनी स्तर पर मजबूत बनेगा।
भारत में नक्सलवाद रेड कॉरिडोर के रूप में फैले कुछ राज्यों और उनके संवेदनशील जिलों में कई वर्षों तक केंद्रित रहा। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा,सुकमा, बीजापुर,नारायणपुर और कांकेर जैसे जिलों में कई वर्षों तक नक्सलियों का आतंक रहा,इसका नतीजा यह हुआ की खनिज संसाधनों से भरपूर यह क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ गया। झारखंड का लातेहार,पलामू,गढ़वा और पश्चिमी सिंहभूम के भी कमोबेश यही हाल रहे। ओडिशा तो खनिज और वन्य संसाधनों से भरपूर है,लेकिन मलकानगिरी,कोरापुट,रायगढ़ और कालाहांडी जैसे नक्सल प्रभावित जिलों में आदिवासियों को भूखमरी से जान से हाथ धोना पड़ा था। महाराष्ट्र का गडचिरोली,गोंदिया और चंद्रपुर हो या आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के भद्राद्री-कोठागुडेम और खम्मम जैसे जिले,नक्सलियों ने गरीब आदिवासियों को गुमराह कर अपनी समांतर सरकारें चलाई।
इन क्षेत्रों में घने जंगल,दुर्गम क्षेत्र,सीमित प्रशासनिक पहुंच और आदिवासी बहुल आबादी नक्सलियों के लिए सुरक्षा कवच बन गई थी। यहां नक्सली संगठनों ने अपनी समानांतर संरचना खड़ी कर ली थी,जिसके चलते पुलिस,सुरक्षा बलों और सरकारी संस्थानों पर लगातार हमले होते रहे। इन हमलों का सबसे बड़ा असर स्थानीय आदिवासी समाज पर पड़ा। भय और असुरक्षा के माहौल में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्य बाधित रहे। कई गांव मुख्यधारा से कटे रहे और सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के पीछे सुरक्षाबलों की सोशल पुलिसिंग एक महत्वपूर्ण कारण रही है। संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षाबलों ने केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय आदिवासी समुदाय के साथ भरोसे का रिश्ता बनाने पर जोर दिया। कई बड़े नक्सली हमलों में अपने साथियों को खोने के बावजूद सुरक्षाबलों ने संयम बनाए रखा और संवाद की नीति नहीं छोड़ी। उन्होंने गांवों में चिकित्सा शिविर,शिक्षा सहायता,खेल गतिविधियां और जागरूकता अभियान चलाकर लोगों के बीच अपनी सकारात्मक छवि बनाई। इससे आदिवासियों का विश्वास धीरे-धीरे बढ़ा और वे नक्सलियों के प्रभाव से बाहर आने लगे। सोशल पुलिसिंग का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि स्थानीय लोगों ने सुरक्षाबलों के साथ सहयोग करना शुरू किया,जिससे नक्सलियों की जानकारी जुटाना और उनकी गतिविधियों को सीमित करना आसान हुआ। इस प्रकार,सुरक्षा और संवेदनशीलता के संतुलन ने नक्सलवाद को कमजोर करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने और कई उग्रवादियों के मारे जाने या आत्मसमर्पण करने की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि हिंसात्मक विचारधारा अब अपनी प्रासंगिकता खो चूकी है। सरकार की सुरक्षा रणनीतियों,विकास योजनाओं और स्थानीय सहयोग ने मिलकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया है। गडचिरोली और बस्तर जैसे क्षेत्रों में बदलाव यह दिखाता है कि जहां कभी बंदूक का असर था,वहां अब शासन और विकास की पहुंच बढ़ रही है। यह स्थिति देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है,इससे आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी और विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनेगा। जब हिंसा कम होती है,तो निवेश,शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं,जिससे समाज में स्थिरता आती है।
नक्सलवादियों को खत्म करने की घोषणा के साथ ही असल परीक्षा अब शुरू हो रही है। विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होगी। आदिवासी क्षेत्रों में जल,जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं,बल्कि पहचान और जीवन का आधार हैं। सबसे चुनौती यह होगी कि सड़क,खनन, उद्योग और बुनियादी ढांचे का विस्तार तो किया जाएं लेकिन इससे आदिवासी समुदायों का विस्थापन,सांस्कृतिक क्षरण या अधिकारों का हनन न हो। यदि विकास एकतरफा हुआ,तो असंतोष फिर जन्म ले सकता है। इसलिए भागीदारी आधारित विकास मॉडल पर धीरे धीरे आगे बढने की जरूरत होगी। जहां ग्राम सभाओं की सहमति,पारदर्शिता और स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता मिलना सुनिश्चित करना होगा। इसके साथ ही,वन अधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन,शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तथा स्थानीय रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है। विकास तभी टिकाऊ होगा जब आदिवासी खुद उसके भागीदार बनें।
जाहिर है देश से नक्सलवाद के पूर्ण अंत को मानने से कहीं बेहतर है की इसे एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देंखे। स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि विकास, न्याय और विश्वास की प्रक्रिया लगातार जारी रहे। जिससे किसी भी प्रकार का असंतोष फिर से हिंसा का रूप न ले सके और नक्सल जैसी कोई विचारधारा फिर पनप ही न सकें।
(लेखक नक्सली क्षेत्रों के शोधार्थी है, लेख में प्रकाशित विचार निजी हैं)