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पश्चिम बंगाल और असम के बाद अब पंजाब पर भाजपा की नजर, क्या 2027 में ‘Domino Effect’ से बदलेगा राज्य का राजनीतिक समीकरण?

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BJP Punjab Strategy
BJP Punjab Strategy 2027: भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिस तरह नए-नए भौगोलिक क्षेत्रों में अपने राजनीतिक विस्तार की रणनीति अपनाई है, उसने देश की पारंपरिक चुनावी राजनीति को बदल दिया है। कभी हिंदी पट्टी तक सीमित मानी जाने वाली भाजपा अब पूरे भारत भारत में अपने लिए स्थायी राजनीतिक जमीन तलाश रही है।

पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में मिली हालिया चुनावी सफलताओं के बाद अब पार्टी की नजर पंजाब पर टिक गई है। भाजपा नेतृत्व इसे अगले संभावित “डोमिनो” के रूप में देख रहा है—ऐसा राज्य जहां राजनीतिक अस्थिरता और विपक्षी दलों की कमजोरी उसे नई संभावनाएं दे सकती है। इसी सोच के तहत भाजपा ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। पार्टी ने संकेत दे दिए हैं कि वह 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी, यानी किसी क्षेत्रीय सहयोगी के सहारे नहीं।


क्या होता है डोमिनो प्रभाव : (Domino Effect) एक ऐसी श्रृंखला प्रतिक्रिया (chain reaction) है, जहां एक घटना या क्रिया अपने समान अन्य घटनाओं की एक श्रृंखला को जन्म देती है, ठीक वैसे ही जैसे एक के बाद एक रखे गए डोमिनो टाइल्स के गिरने से पूरी कतार गिर जाती है। यह अवधारणा बताती है कि कैसे एक छोटा सा बदलाव या शुरुआती घटना बहुत बड़े और व्यापक परिणाम पैदा कर सकती है।

पंजाब में भाजपा का इतिहास: सीमित दायरे से विस्तार की कोशिश

पंजाब में भाजपा की मौजूदगी नई नहीं है। आज़ादी के बाद से ही पार्टी (और उससे पहले भारतीय जनसंघ) राज्य की राजनीति में सक्रिय रही है। लेकिन लंबे समय तक उसका प्रभाव मुख्यतः शहरी हिंदू वोटरों और व्यापारिक वर्ग तक सीमित रहा।

1992 से पहले जब भाजपा अकेले चुनाव लड़ती थी, तब उसका औसत वोट शेयर लगभग 6-7% के बीच रहता था। 1997 में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन के बाद यह बढ़कर लगभग 8% तक पहुंचा।

हालांकि गठबंधन ने भाजपा को सत्ता में भागीदारी तो दी, लेकिन उसका राजनीतिक विस्तार सीमित ही रहा। अकाली दल 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था जबकि भाजपा के हिस्से केवल 23 सीटें आती थीं। भाजपा के कई नेताओं का मानना था कि इस “जूनियर पार्टनर मॉडल” ने पार्टी को पंजाब में स्वतंत्र पहचान बनाने से रोक दिया।

कृषि कानूनों के बाद बदला समीकरण

2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ हुए व्यापक आंदोलन ने पंजाब की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। किसानों के तीखे विरोध के बीच अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला लिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यही वह मोड़ था जिसने भाजपा को पंजाब में “नई शुरुआत” का अवसर दिया। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा अब अपने संगठनात्मक विस्तार और नए सामाजिक समीकरणों पर खुलकर काम कर पा रही है।

इसी वर्ष मार्च में अमित शाह ने मोगा की “बदलाव रैली” में अकेले चुनाव लड़ने का संकेत देकर स्पष्ट कर दिया कि भाजपा अब पंजाब में सहायक दल नहीं, बल्कि मुख्य शक्ति बनने की रणनीति पर काम कर रही है।

क्या पंजाब की राजनीति में ‘पावर वैक्यूम’ बन रहा है?

भाजपा की रणनीति केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं है। पार्टी यह भी मान रही है कि पंजाब की मौजूदा राजनीति में एक “राजनीतिक खालीपन” बन रहा है। 

आम आदमी पार्टी की चुनौतियां

आम आदमी पार्टी (AAP) 2022 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन अब उसे आंतरिक असंतोष और नेतृत्व संबंधी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर लगे व्यक्तिगत आरोपों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दिया है।
हालांकि AAP अब भी पंजाब में एक मजबूत शक्ति है, लेकिन भाजपा यह मानती है कि शहरी वर्ग और गैर-पारंपरिक मतदाता धीरे-धीरे विकल्प तलाश सकते हैं।

कांग्रेस की गुटबाजी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी पंजाब में लंबे समय से आंतरिक खींचतान से जूझ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाना और राहुल गांधी का राज्य इकाई को “टीम की तरह काम करने” की सलाह देना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असहमति बनी हुई है।

अकाली दल की कमजोर होती पकड़

कभी पंजाब की राजनीति का सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय दल माना जाने वाला अकाली दल भी अब अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। कृषि कानूनों के मुद्दे और लगातार चुनावी झटकों ने उसके जनाधार को कमजोर किया है। भाजपा को लगता है कि अकाली दल के कमजोर होने से जो राजनीतिक स्पेस खाली हुआ है, उसे वह भर सकती है।

भाजपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ रणनीति

पंजाब में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राज्य की राजनीति परंपरागत रूप से सिख-पंथक और क्षेत्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इसलिए पार्टी अब “सोशल इंजीनियरिंग” मॉडल पर काम कर रही है।

राज्य में अनुसूचित जाति (SC) आबादी लगभग 32% है, जो देश में सबसे अधिक अनुपातों में से एक है। इसके अलावा 25-30% आबादी ओबीसी वर्ग से जुड़ी मानी जाती है।

भाजपा अब इन वर्गों में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। साथ ही पार्टी सिख समुदाय के बीच केंद्र सरकार की पहलों—जैसे करतारपुर कॉरिडोर और साहिबजादों की शहादत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान—को प्रमुखता से प्रचारित कर रही है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा पंजाब में “हिंदू बनाम सिख” की पारंपरिक रेखा से आगे जाकर नया सामाजिक गठबंधन बनाना चाहती है।

क्या ‘डोमिनो इफेक्ट’ वास्तव में काम करेगा?

भाजपा की रणनीति इस विचार पर आधारित दिखती है कि यदि वह लगातार नए राज्यों में अपनी मौजूदगी स्थापित करती रही, तो इससे “मनोवैज्ञानिक विस्तार” का प्रभाव पैदा होगा।
पहले हरियाणा, फिर असम, उसके बाद पश्चिम बंगाल में बढ़त—इन चुनावी सफलताओं ने भाजपा को यह विश्वास दिया है कि क्षेत्रीय दलों के मजबूत गढ़ भी धीरे-धीरे टूट सकते हैं।


लेकिन पंजाब की राजनीति कई मायनों में अलग है। यहां धार्मिक पहचान, किसान राजनीति, प्रवासी प्रभाव और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे चुनावी व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए भाजपा के लिए चुनौती केवल सीटें बढ़ाने की नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक राजनीति में स्वीकार्यता हासिल करने की भी होगी।

2027: पंजाब का सबसे दिलचस्प चुनाव?

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव बहुकोणीय मुकाबला बन सकता है।
  • भाजपा विस्तार की रणनीति पर है
  • AAP सत्ता विरोधी माहौल से बचने की कोशिश करेगी
  • कांग्रेस संगठनात्मक संकट से जूझ रही है
  • अकाली दल अपना खोया जनाधार वापस पाने में लगा है
ऐसे में 2027 का पंजाब चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या भाजपा वास्तव में “डोमिनो इफेक्ट” के सहारे पंजाब जैसे जटिल राज्य में अपनी नई राजनीतिक कहानी लिख सकती है।

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