Publish Date: Thu, 07 May 2026 (12:46 IST)
Updated Date: Thu, 07 May 2026 (13:14 IST)
India-Bangladesh relations: पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद क्या भारत-बांग्लादेश संबंधों में दरार आने वाली है? एक तरफ सुवेन्दु अधिकारी का 'क्लीन-अप' मिशन है, तो दूसरी तरफ ढाका की जवाबी कार्रवाई की धमकी। क्या 'पुश-इन' की ये राजनीति दक्षिण एशिया का भूगोल और शांति बदल देगी?
पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी नतीजों ने न केवल भारत की आंतरिक राजनीति में हलचल मचाई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर भी तनाव की लकीरें खींच दी हैं। भाजपा की प्रचंड जीत के तुरंत बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान का बयान सामने आया है, जो दोनों देशों के बीच भविष्य के कड़वे रिश्तों की आहट दे रहा है।
'पुश-इन' पर ढाका का कड़ा रुख
'मकतूब मीडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद खलीलुर रहमान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि पश्चिम बंगाल में नई सरकार के तहत 'पुश-इन' (जबरन सीमा पार धकेलना) की घटनाएं बढ़ती हैं, तो बांग्लादेश खामोश नहीं बैठेगा। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो बांग्लादेश उचित कदम उठाएगा।
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने भी इस रुख का समर्थन किया है, जिससे यह साफ है कि वहां की नई सरकार इस मुद्दे पर बेहद संवेदनशील है।
सुवेन्दु अधिकारी और '1 करोड़ घुसपैठियों' का मुद्दा
पश्चिम बंगाल के संभावित मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुवेन्दु अधिकारी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान 'बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों' और रोहिंग्याओं को बाहर निकालने को अपनी प्राथमिकता बताया है।
प्रमुख दावे और वादे:
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मतदाता सूची की सफाई : अधिकारी का दावा है कि बंगाल की मतदाता सूची में करीब 1 करोड़ फर्जी और घुसपैठिए मतदाता हैं।
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सख्त कार्रवाई : उन्होंने घोषणा की है कि इन लोगों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर निकाला जाएगा, ताकि बंगाल को 'वृहद बांग्लादेश' बनने से बचाया जा सके।
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विवादास्पद बयान : दिसंबर 2025 में उन्होंने बांग्लादेश को 'इजराइल-गाजा' जैसा सबक सिखाने की बात कहकर राजनयिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया था।
असम मॉडल और 90 लाख नामों का कटना
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और सुवेन्दु अधिकारी की जुगलबंदी ने सीमावर्ती क्षेत्रों में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है। हाल ही में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के माध्यम से लगभग 90 लाख नाम हटाए गए हैं, जिनमें से एक-तिहाई मुस्लिम समुदाय से हैं। बांग्लादेश इसे एक 'व्यवस्थित पूर्वाग्रह' के रूप में देख रहा है।
तीस्ता जल विवाद : क्या समाधान निकलेगा?
राजनीतिक तनाव के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारे का मुद्दा भी फिर से गर्मा गया है। 2011 से ममता बनर्जी के विरोध के कारण लंबित यह समझौता अब भाजपा सरकार के पाले में है।
बांग्लादेश की उम्मीद : रहमान ने कहा कि यह देखना होगा कि नई सरकार का रुख क्या रहता है।
संकट : तीस्ता के किनारे रहने वाले लोग पारिस्थितिक और आर्थिक मार झेल रहे हैं, जिससे बांग्लादेश पर घरेलू दबाव बढ़ रहा है।
कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने जहां एक ओर वैचारिक विजय का बिगुल फूंका है, वहीं दूसरी ओर 'पड़ोसी पहले' (Neighbor First) की विदेश नीति के लिए चुनौती पेश कर दी है। एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा है, तो दूसरी ओर बांग्लादेश जैसा रणनीतिक साझेदार। क्या भारत सरकार कड़े फैसलों और कूटनीतिक संयम के बीच संतुलन बना पाएगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala
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