चीन में बैठे सर्जन ने हैदराबाद में किया ऑपरेशन, क्या 5G और रोबोटिक्स बदल देंगे दुनिया की सर्जरी का भविष्य?
3,900 किलोमीटर दूर वुहान से हैदराबाद तक चला ऑपरेशन थिएटर
Publish Date: Tue, 26 May 2026 (16:26 IST)
Updated Date: Tue, 26 May 2026 (16:45 IST)
Remote Robotic Surgery: 18 मई 2026 को चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐसी सीमा पार की, जो अब तक विज्ञान-कथा फिल्मों का हिस्सा लगती थी। चीन के वुहान शहर में बैठे एक डॉक्टर ने भारत के हैदराबाद में मौजूद मरीज की सफल सर्जरी की — बिना ऑपरेशन थिएटर में मौजूद हुए, बिना मरीज को छुए और लगभग 3900 किलोमीटर दूर रहकर।
यह सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के वैश्विक भविष्य की झलक है। दुनिया तेजी से उस दौर में प्रवेश कर रही है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर भौगोलिक सीमाओं से मुक्त होकर किसी भी देश, किसी भी शहर और किसी भी अस्पताल में बैठे मरीज का ऑपरेशन कर सकेंगे।
हैदराबाद के एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेफ्रोलॉजी एंड यूरोलॉजी (AINU) में भर्ती एक मरीज की मूत्रवाहिनी (यूरेटर) को दोबारा मूत्राशय से जोड़ने की जटिल सर्जरी चीन के टोंगजी अस्पताल में बैठे रोबोटिक यूरोलॉजिकल सर्जन डॉ. सैयद मोहम्मद गाउस ने की। करीब 90 मिनट चली इस प्रक्रिया को अब दुनिया की पहली लंबी दूरी वाली रिमोट रोबोटिक यूरेटर रीइम्प्लांटेशन सर्जरी माना जा रहा है।
यह तकनीक आखिर काम कैसे करती है?
पहली नजर में यह किसी साइंस-फिक्शन तकनीक जैसा लगता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आधुनिक रोबोटिक सर्जरी पहले से ही “मानव हाथों के डिजिटल विस्तार” पर आधारित है।
रोबोटिक सर्जरी में डॉक्टर सीधे मरीज के शरीर के ऊपर खड़े होकर ऑपरेशन नहीं करते। इसके बजाय वे एक विशेष नियंत्रण कक्ष (कंसोल) में बैठते हैं, जहां उन्हें मरीज के शरीर के अंदर का हाई-रिजॉल्यूशन त्रि-आयामी दृश्य दिखाई देता है। डॉक्टर के हाथों की हर हरकत रोबोटिक भुजाओं तक पहुंचती है, जो उसी सटीकता के साथ मरीज के शरीर के भीतर कार्य करती हैं।
इस प्रणाली का मूल सिद्धांत था:
मानव निर्णय + मशीन की स्थिरता + डिजिटल संचार।
डॉ. गाउस के अनुसार, “रोबोटिक सर्जरी तकनीकी रूप से पहले से ही दूरस्थ सर्जरी का रूप है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब डॉक्टर और मरीज एक ही इमारत में नहीं, बल्कि अलग-अलग देशों में मौजूद थे।”
5G नेटवर्क ने कैसे संभव बनाया यह ऑपरेशन?
इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ थी अल्ट्रा-लो लेटेंसी 5G कनेक्टिविटी।
सर्जरी के दौरान डॉक्टर के हाथों की हर गतिविधि वुहान से हैदराबाद तक इंटरनेट नेटवर्क के जरिए भेजी जा रही थी। यदि इस डेटा ट्रांसमिशन में मामूली भी देरी होती, तो ऑपरेशन जोखिमपूर्ण हो सकता था। लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक ऑपरेशन के दौरान नेटवर्क विलंब केवल 63 मिलीसेकंड रहा।
तुलना के लिए:
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इंसान की पलक झपकने में लगभग 150–400 मिलीसेकंड लगते हैं।
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यानी मशीन की प्रतिक्रिया मानव रिफ्लेक्स से भी तेज थी।
यही कारण है कि 5G को केवल तेज इंटरनेट नहीं, बल्कि “मिशन-क्रिटिकल टेक्नोलॉजी” माना जा रहा है। भविष्य में यही तकनीक:
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स्वचालित वाहन
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ड्रोन नियंत्रण
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सैन्य संचालन
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और दूरस्थ चिकित्सा सेवाओं की आधारशिला बन सकती है।
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ऑपरेशन के दौरान वास्तव में क्या हुआ?
सर्जरी से पहले भारत और चीन की मेडिकल टीमों ने मरीज की रिपोर्टों का साझा अध्ययन किया। हैदराबाद के अस्पताल में मरीज को एनेस्थीसिया दिया गया और चीनी कंपनी मेडबॉट द्वारा विकसित रोबोटिक सर्जिकल सिस्टम से जोड़ा गया।
इसके बाद:
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छोटे चीरे लगाए गए
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कैमरे और रोबोटिक उपकरण शरीर में डाले गए
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और वुहान में बैठे डॉक्टर ने लाइव 3D विजुअल के आधार पर सर्जरी शुरू की
हालांकि पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय भारतीय सर्जिकल टीम ऑपरेशन थिएटर में मौजूद रही ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत हस्तक्षेप किया जा सके। डॉ. गाउस ने बाद में कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे अपने ही ऑपरेशन थिएटर में बैठे हों।
यह उपलब्धि इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जा रही है?
यह घटना सिर्फ तकनीकी प्रदर्शन नहीं है। इसका असली महत्व “विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं के लोकतंत्रीकरण” में छिपा है। भारत जैसे देशों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का बड़ा हिस्सा महानगरों तक सीमित है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर:
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अनुभवी सर्जन नहीं होते
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जटिल ऑपरेशन संभव नहीं होते
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और मरीजों को हजारों किलोमीटर यात्रा करनी पड़ती है
यदि किसी छोटे शहर के अस्पताल में रोबोटिक प्रणाली उपलब्ध हो, तो भविष्य में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या यहां तक कि विदेश में बैठे विशेषज्ञ डॉक्टर वहां मौजूद मरीज की सर्जरी कर सकेंगे। यानी भविष्य में “डॉक्टर का स्थान” उतना महत्वपूर्ण नहीं रहेगा, जितना “नेटवर्क और मशीन की उपलब्धता”।
लेकिन क्या यह पूरी तरह सुरक्षित है?
तकनीक जितनी क्रांतिकारी है, उतने ही बड़े इसके जोखिम और नैतिक प्रश्न भी हैं।
1. नेटवर्क विफलता का खतरा
यदि ऑपरेशन के बीच इंटरनेट बाधित हो जाए तो क्या होगा?
इसलिए अभी हर दूरस्थ सर्जरी में स्थानीय बैकअप टीम अनिवार्य रखी जाती है।
2. साइबर सुरक्षा
जब सर्जरी इंटरनेट पर निर्भर होगी, तो अस्पताल साइबर हमलों के संभावित लक्ष्य भी बन सकते हैं।
3. कानूनी और नियामकीय सवाल
यदि डॉक्टर दूसरे देश में बैठा हो और ऑपरेशन में त्रुटि हो जाए, तो कानूनी जिम्मेदारी किसकी होगी?
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डॉक्टर की?
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अस्पताल की?
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तकनीक प्रदाता कंपनी की?
यह वैश्विक चिकित्सा कानूनों के लिए नई चुनौती है।
4. तकनीकी असमानता
रोबोटिक सर्जरी अत्यंत महंगी है।
ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या यह तकनीक केवल अमीर अस्पतालों तक सीमित रह जाएगी?
चीन, भारत और मेडिकल टेक्नोलॉजी की नई साझेदारी
यह सर्जरी चीन के टोंगजी अस्पताल और भारत के AINU संस्थान के सहयोग से हुई।
यह सिर्फ चिकित्सा सहयोग नहीं, बल्कि भविष्य की “टेक्नो-डिप्लोमेसी” का संकेत भी है।
चीन पहले ही:
और मेडिकल हार्डवेयर में वैश्विक निवेश बढ़ा चुका है। अब वह हेल्थ-टेक क्षेत्र में भी अपनी तकनीकी क्षमता प्रदर्शित कर रहा है। भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश तेजी से डिजिटल हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेलीमेडिसिन मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
क्या भविष्य में डॉक्टर “डिजिटल नोमैड” बन जाएंगे?
यह घटना एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है। भविष्य में संभव है कि:
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दुनिया के शीर्ष सर्जन एक केंद्रीय नियंत्रण केंद्र से अलग-अलग देशों के मरीजों का ऑपरेशन करें
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युद्ध क्षेत्रों में दूरस्थ सर्जरी हो
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अंतरिक्ष मिशनों में पृथ्वी से डॉक्टर सर्जिकल सहायता दें
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और ग्रामीण अस्पतालों में विशेषज्ञता की कमी लगभग खत्म हो जाए
जो तकनीक आज “असाधारण उपलब्धि” लग रही है, वह अगले दशक में सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया बन सकती है।
सर्जरी अब सीमाओं से परे जा चुकी है
20वीं सदी में चिकित्सा विज्ञान ने शरीर के भीतर पहुंचने की कला सीखी। 21वीं सदी में चिकित्सा विज्ञान दूरी को समाप्त करना सीख रहा है।
वुहान से हैदराबाद तक हुई यह सर्जरी सिर्फ एक मरीज का ऑपरेशन नहीं थी — यह उस भविष्य की घोषणा थी, जहां डॉक्टर और मरीज के बीच की सबसे बड़ी बाधा, यानी “दूरी”, धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाएगी। और शायद आने वाले वर्षों में अस्पतालों की परिभाषा भी बदल जाएगी — क्योंकि ऑपरेशन थिएटर अब केवल एक कमरा नहीं, बल्कि एक वैश्विक डिजिटल नेटवर्क बनने जा रहा है।
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