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ईरान-अमेरिका युद्ध से गुजरात के 2 औद्योगिक 'इंजन' ठप, सूरत में श्रमिकों का पलायन और मोरबी में सन्नाटा

पश्चिम एशिया संघर्ष से कच्चे तेल-गैस कीमतें आसमान छू रही हैं, सप्लाई चेन टूटी, सूरत की मिलें सप्ताह में दो दिन बंद, हजारों मजदूर घर लौट रहे

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Gujarat Industrial Crisis
Gujarat Industrial Crisis: पश्चिम एशिया में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने गुजरात की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों का आवागमन ठप है और गैस-एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे सूरत का टेक्सटाइल हब और मोरबी का सिरेमिक क्लस्टर दोनों ही गंभीर संकट में फंस गए हैं।

सूरत टेक्सटाइल उद्योग : सप्ताह में दो दिन बंदी, लागत दोगुनी 

सूरत की टेक्सटाइल प्रोसेसिंग मिलें—जो सिंथेटिक कपड़े, डाइंग और प्रिंटिंग पर निर्भर हैं—पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल और ऊर्जा के दामों में भारी उछाल से जूझ रही हैं। धागा, कोयला/गैस और अन्य इनपुट्स की कीमतें 15-20% तक बढ़ चुकी हैं। सप्लाई चेन बाधित होने से स्टॉक घट रहा है—कई मिलों के पास अब सिर्फ 10-20 दिनों का कोयला/गैस बचा है। इस दोहरे संकट (बढ़ती लागत + कम मांग) से निपटने के लिए साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन (SGTPA) ने फैसला किया है कि मिलें हर सप्ताह दो दिन बंद रहेंगी। 
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एसजीटीपीए के अध्यक्ष जीतु वखारिया ने कहा कि ग्रे कपड़े की कीमतें बढ़ने से मार्केट पार्टियां अब प्रसंस्करण के लिए माल नहीं दे रही हैं। ऐसी स्थिति में मिलें चलाना घाटे का सौदा हो गया है। हम अगले सप्ताह से यह कदम उठा रहे हैं ताकि नुकसान कम हो और संसाधन बचे रहें। सूरत में करीब 400-500 प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं, जो सीधे 3 लाख से अधिक श्रमिकों की आजीविका चलाती हैं। ऑपरेशन कम होने से वेतन प्रभावित हो रहा है और मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। हजारों उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों के श्रमिक रोज़ाना सूरत छोड़कर घर लौट रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संकट लंबा खिंचा तो मांग लौटने पर श्रमिकों की भारी कमी हो सकती है, जो उद्योग की रिकवरी के लिए बड़ा झटका साबित होगा।
 
यह संकट नोटबंदी और कोविड के बाद उबरते सूरत के लिए एक नया झटका है। उद्योग बांग्लादेश संकट को अवसर मानकर तैयारी कर रहा था, लेकिन अब वैश्विक अस्थिरता ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है।

मोरबी सिरेमिक उद्योग : गैस संकट से सैकड़ों यूनिटें बंद

संकट की लहरें सूरत से आगे मोरबी तक पहुंच गई हैं—भारत का सिरेमिक हब, जहां देश की 80-90% टाइल्स और सैनिटरीवेयर बनती हैं। ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने और गैस आपूर्ति में कटौती से सैकड़ों इकाइयां (कुछ रिपोर्ट्स में 400+ तक) बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर हैं। यदि हालात नहीं सुधरते हैं तो यह आंकड़ा 600 के पार भी जा सकता है। निर्यात मार्ग अवरुद्ध हैं—दुबई, ओमान, कतर, शारजाह जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर व्यवधान से कंटेनर फंसे हुए हैं।
 
सिरामिक ही नहीं, मोरबी की लगभग 52 पेपर मिलें भी आर्थिक संकट में घिर गई हैं। कच्चे माल की कमी और बिक्री में 50% की गिरावट के कारण पूरा मोरबी फिलहाल आर्थिक चिंता के माहौल में है। एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज एरवाडिया के अनुसार, गैस की उपलब्धता और कीमतों में स्थिरता आने के बाद ही नए रेट कार्ड के साथ उत्पादन फिर से शुरू किया जाएगा।

लाखों नौकरियां खतरे में

फ्रेट चार्जेस 20-30 गुना तक बढ़ गए हैं। इससे उद्योग का नकदी प्रवाह थम गया है और लाखों नौकरियां खतरे में हैं। मोरबी का सालाना टर्नओवर हजारों करोड़ का है, जो अब ठप होने की कगार पर है।
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कुल मिलाकर यह सिर्फ एक क्षेत्रीय सुस्ती नहीं, बल्कि गुजरात की पूरी विनिर्माण अर्थव्यवस्था पर वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर है। राज्य का सबसे बड़ा आर्थिक इंजन परीक्षा की घड़ी से गुजर रहा है। यदि युद्ध लंबा चला तो मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और प्रवासन की नई लहर पैदा हो सकती है। उद्योग जगत सरकार से तत्काल राहत पैकेज, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और निर्यात सहायता की मांग कर रहा है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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