Dharma Sangrah

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

विकास से विद्या बनने की दर्दभरी दास्‍तां से वॉशिंगटन पोस्‍ट के शटडाउन की आहट तक, गांधी के आश्रम में सार्थक संवाद

Advertiesment
Viksa sanvad wardha
  • महाराष्‍ट्र में गांधी आश्रम सेवाग्राम में विकास संवाद का तीन दिवसीय आयोजन संपन्‍न
  • संविधान बनने से लेकर इसके मूल्‍यों की प्रासंगिकता पर विमर्श के तीन दिन
  • पत्रकार, अधिवक्‍ता और देशभर के कई विशेषज्ञों ने लिया हिस्‍सा
जिस दुनिया में हम सामान्‍य लोग अभी जी रहे हैं, मुख्‍य धारा में काम कर रहे हैं, उठते हैं, बैठते हैं, उस दुनिया के परे भी, उसके सामानांतर भी एक दुनिया है— संघर्ष की दुनिया। जिसमें अपनी पहचान के लिए संघर्ष है, न्‍याय के लिए संघर्ष है, अपने अधिकार, समानता और मुख्‍यधारा का हिस्‍सा बनने का संघर्ष है। उनकी जिंदगी हमारी जिंदगी की तरह आसान नहीं, उन्‍हें अपने हर हक के लिए एक लड़ाई लड़ना पड़ती है, एक लंबी और चुनौतियों से भरी लड़ाई। जिसमें कई बार तिरस्‍कार होता है, अपमान होता है, कई बार हमले होते हैं और यहां तक कि कई बार इसे लड़ते- लड़ते उम्र का एक बड़ा हिस्‍सा ही खप जाता है।

दुखद यह है कि जो लड़ पाते हैं, वे कुछ हद तक अपनी लड़ाई में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन जो यह लड़ाई नहीं लड़ते, उनकी जिंदगी उसी अंधेरे और घुटन में रह जाती है, जिससे बाहर निकलने के लिए वे छटपटाते रहे हैं।
बात चाहे लैंगिक असमानता की हो, जातीय भेदभाव, छुआछुत की हो, अपने हक के लिए न्‍याय की हो, संवैधानिक मूल्‍यों के हनन की हो या निष्‍पक्ष पत्रकारिता की वजह से मिलने वाली सजा की हो। लडाई चाहे शिक्षा के अधिकार की हो, या अभिव्यक्ति की आज़ादी की। महिला सुरक्षा का मुद्दा हो या बच्चों के अधिकार, उनके संरक्षण की बात हो। ‘संविधान’ नाम का पवित्र दस्‍तावेज इन लड़ाइयों के अंधेरे में किसी ‘टॉर्च’ की तरह काम कर रहा है।

संविधान और इसके मूल्‍यों से लड़ी जाने वाली कहानी : देशभर से आए वक्‍ता, पत्रकार, अधिवक्‍ता और सामाजिक संगठनों के विशेषज्ञों ने अपने उदबोधन से यहां अपने विचारों, तर्कों, तथ्‍यों और जमीन पर अपने संघर्षों की जो कहानी बयां की वो झकझोर देने वाली थी। संविधान लागू होने के करीब 77 साल बाद भी देश के कई हिस्सों से वर्ग, धर्म, समुदाय, संप्रदाय और लिंग के आधार पर भेदभाव, असमानता, गरिमा के हनन और न्याय में पक्षपात की खबरें आती रहती हैं। ऐसे में संविधान के मूल्यों का महत्व, उसकी उपयोगिता और ज़्यादा महसूस होती है। विकास संवाद के वर्धा में गांधी के आश्रम सेवाग्राम में वक्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने संविधान के मूल्यों के महत्व की बात की। उन्होंने देश के तमाम इलाकों में जमीनी हकीकत से अवगत कराया। शिक्षा, न्याय, और समता- समानता के क्षेत्र में कितना और किस तरह से इनका पालन हो रहा है, इस बारे में विस्तार से चर्चा की और उपस्थित फैलो और नागरिकों से सवाल जवाब से चिंतन किया।

विकास से विद्या बनने की दर्दभरी दास्‍तां : अपनी इंडिविजुअलिटी और पहचान के लिए ट्रांस वुमेन विद्या राजपूत और उनके पति ट्रांसमेन पॉपी देबनाथ ने जो कहानी सुनाई वो किसी की भी रूह को झकझोर देने वाली है। अपने जेंडर की पहचान कर विकास से विद्या बनने के सफर में विद्या ने कितनी और किस तरह की यातनाएं भोगी, उसकी बानगीभर सुनकर आश्रम की दीवारें भी सहम गईं। आजादी के इतने साल बाद और संविधान बनने के 77 साल बाद आज भी लैंगिक समानता के लिए एलजीबीटीक्‍यू समुदाय को किस तरह का शोषण झेलना पड़ रहा है, यह सुनकर हैरानी होती है। विद्या पहले विकास थीं, लेकिन जिस दिन उन्‍हें अपने सेक्‍सुअल प्रिफरेंस का आभास हुआ उसी दिन उनका संघर्ष शुरू हो गया। इसके बाद से वे तमाम उम्र अपने लोगों, अपने समाज, कानून और तय नियम-कायदों से लड़ती आ रही हैं।

घर से निष्‍कासन और सर्जरी का दर्द : इससे भी भयावह कहानी उनके पति पॉपी देबनाथ की है जो एक लड़की से पुरुष बने। पॉपी को तो अपने परिवार से ही अलग होना पड़ा। इसके बाद समाज का दंश, अपने घर से निष्‍कासन और सर्जरी की बेहद दर्दभरी प्रक्रिया से गुजरने का दौर। यह सब सुनने और देखने में बेहद आसान लगता है, लेकिन जिस तरह से दोनों इतने साल में इस पूरे संघर्ष से गुजरे वो एक असहनीय कहानी है। लेकिन दोनों ने अपनी पहचान को स्‍थापित करने और समाज में खुद को मान्‍यता दिलाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और आज वो गांधी के सेवाग्राम आश्रम में विकास संवाद के मंच पर खड़े होकर अपने पीछे आने वाले उन्‍हीं की तरह के लोगों के लिए ही एक मिसाल पेश कर रहे थे।

संविधान से बदलाव की बयार : लैंगिक समानता और सोच पर विद्या राजपूत और पॉपी देबनाथ का यह सेशन सबसे दिलचस्प और महत्‍वपूर्ण रहा। इस सत्र में उन्होंने अपने जेंडर आइडेंटिटी को खोजने की यात्रा के दौरान किस तरह के दर्द से गुजरना पड़ा उस दंश के बारे में बेहद भावुक करने वाली अपनी कहानी बयां की। उन्होंने अपने जेंडर अस्तित्व को खोजने में आने वाली चुनौतियों, पारिवारिक हमलों की दर्दभरी कहानियां सुनाई। एक पुरुष जिसकी आत्मा में एक औरत बसती है या एक औरत जिसमें मर्द की देह जगह बनाती महसूस होती है ऐसे अपनी पहचान खोजने वाले समाज के दबे छुपे नागरिकों को अपने जीवन में कितना संघर्ष करना पड़ता है इसका जीता जागता उदाहरण विद्या राजपूत और पॉपी ने दिया। उन्‍होंने बताया कि किस तरह से वे अपने एनजीओ और संगठनों की मदद से समाज में थर्ड जेंडर के लिए कैसे और कितना बदलाव ला पाए हैं।

विकास संवाद के इस बेहद गंभीर और गरिमामय आयोजन में पहले दिन गांधीवादी चिन्मय मिश्र, विकास संवाद के प्रमुख सचिन कुमार जैन, किशोर, न्याय और अधिनियम की जानकार भारती अली और संविधान प्रचार प्रसार करने वाले नागेश जाधव, पत्रकार अरूण त्रिपाठी और पुष्‍यमित्र ने अपने- अपने व्‍यक्‍तव्‍य दिए।

गांधी के आश्रमों का संविधान में योगदान : गांधीवादी चिंतक चिन्मय मिश्र ने सेवाग्राम के इतिहास, महत्व और गांधी के अपने तमाम आश्रमों में अपने योगदान को लेकर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विकास संवाद का यह मैत्री मेला कोई हंसी मजाक की जगह नहीं, बल्कि वो स्थान है जहां हम संविधान के महत्व को जानकर, गांधी की अवधारणा को समझकर इसे कैसे आगे बढ़ाए। उन्होंने मैत्री मेले की अवधारणा और उसके भावार्थ के बारे में बताया। उन्होंने गांधी के सभी आश्रमों, उनके आविष्कार, उनके महत्‍व, समाज और संविधान के मूल्‍यों में उनके योगदान के साथ ही ' नई तालीम ' का महत्व और उनकी गतिविधियों के बारे में कई किस्से और तथ्य बताए। उन्होंने एआई के दौर में बौद्धिक चिंतन का महत्व बताया। सेवाग्राम आश्रम के बारे में उन्‍होंने कहा कि यही वो जगह है जहां आज भी गांधी की आत्‍म बसती है।

विकास संवाद के प्रमुख सचिन कुमार जैन ने अपने विषय संवाद से बना संविधान विषय के बहाने संविधान बनने की प्रक्रिया, संविधान सभा की बैठकों, उनके चिंतन के साथ ही धर्म संप्रदाय, पंथ निरपेक्षता, बंधुत्व की भावना, समानता का महत्व के बारे में बेहद प्रभावी बाते कहीं। उन्होंने संविधान बनने के दौर में इसके प्रचार प्रसार, इसके ड्राफ्ट और कई भाषाओं में अनुवाद को लेकर तथ्यात्मक जानकारी दी। कैसे संविधान बनने के बाद उसके प्रचार प्रसार में रेडियो, अखबार, पत्र पत्रिका और उस समय के नागरिकों ने अपना योगदान दिया। संविधान के प्रचार प्रसार के लिए उस वक्‍त करीब 20 किताबों का प्रकाशन हुआ। संविधान सभा की 164 बैठकें हुईं। हर स्‍तर पर बहस, विमर्श और आलोचनाओं के बाद संविधान ने आकार लिया। उन्‍होंने बताया कि तमाम सहमति और असहमतियों के बाद संविधान बनने की प्रक्रिया का इस तरह का उदाहरण पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलता है।

क्‍यों संविधान मूल्‍यों को अपनाना जरूरी है : संविधान पर काम कर रहे विशेषज्ञ नागेश जाधव ने संविधान के मूल्यों और उसके प्रति अपने दृष्टिकोण पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने सभी फैलो को बताया कि जीवन में मूल्यों को अपनाना क्यों जरूरी है, सिर्फ पढ़ने से काम नहीं चलेगा, उसे जीवन में कैसे उतारे, समाज में कैसे योगदान दे इस बारे में अपने ज़मीनी स्तर पर काम किए गए प्रयोगों के आधार पर खाका खींचा।

वॉशिंगटन पोस्‍ट बंद हो रहा है लेकिन, आप जिंदा रहे : पत्रकार लेखक अरुण त्रिपाठी ने पत्रकारिता के नैतिक पतन के बारे में बेहद प्रभावशाली उद्बोधन दिया। उन्होंने बताया कि कैसे उनके दौर से लेकर आज व्हाट्सएप और फिर एआई के जमाने तक पत्रकारिता पूरी तरह से बदल गई है। बावजूद इसके कैसे पत्रकारिता को बचाया जा सकता है। नैतिक स्तर और ईमानदारी और संवेदनशीलता की मदद से आज की जूझती पत्रकारिता को बचाया जा सकता है। कैसे पत्रकारिता को संविधान की नजर से देखकर इसे धंधा या नौकरी नहीं मानकर इसकी आत्मा को बचाया जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि यूं तो आज पत्रकारिता की यह हालत हो गई है कि वॉशिंगटन पोस्‍ट बंद होने की कगार पर आ गया है, लेकिन हम अपनी जगह से अपनी लडाई जारी रख सकते हैं और इमानदारी से मिलने वाली सुकून की नींद सो सकते हैं।

कुल जनसंख्‍या का 37 प्रतिशत रह गए, कहां गायब हो रहे हैं बच्‍चे : किशोर न्‍याय और अधिनियम की जानकार भारती अली ने बच्‍चों के लिए काम करने वाली न्‍यायिक प्रणाली और उनके अधिकारों के कई पहलुओं को उजागर किया। उन्‍होंने बच्‍चों की कम होती संख्‍या और लड़कियों के हैरतअंगेज तरीके से गायब होने के बारे में तथ्‍य पेश किए। आज बच्‍चे कुल जनसंख्‍या का 37 प्रतिशत रह गए हैं। कभी बच्‍चे जनसंख्‍या का 42 प्रतिशत हिस्‍सा थे। उन्‍होंने सवाल उठाया कि आखिर बच्‍चे कहां गायब हो रहे हैं। इन कम होती संख्‍या के बारे में कोई शोध और रिसर्च नहीं हो रही है। उन्‍होंने बताया कि बच्‍चों के अधिकारों की नींव संविधान से बनती है। बच्‍चों के लिए कई कानून बने हैं, लेकिन क्‍या वे वाकई में बच्‍चों को हक दिला पा रहे हैं। क्‍या उनके साथ सही न्‍यायिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है। उन्‍होंने दिल्‍ली के निर्भया गैंग रेप और पुणे के पोर्श कार हादसे के उदाहरण देते हुए कई बातें समझाईं। उन्‍होंने सवाल उठाया कि अलग उम्र के बच्‍चों के लिए अलग कानून क्‍यों हैं। भारती अली ने किशोर न्याय और अधिनियम में बच्चों के लिए बने कानूनों की विसंगतियों पर चर्चा की। बच्चों के अधिकार, उनकी आज़ादी, शिक्षा और उनके न्यायिक ट्रायल पर अपने अनुभव साझा किए। भारती अली ने किशोर न्याय अधिनियम में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाया। फैलो से सवाल जवाब से उन्होंने बच्चों से जुड़े मसलों पर गंभीर चिंतन किया और उसके समाधान के लिए सुझाव दिए।

विकास संवाद पुस्‍तकों का विमोचन और फैलो प्रदर्शनी : पूरे तीन दिनों के दौरान विकास संवाद की पूजा सिंह ने संवैधानिक मूल्‍यों पर अधारित पुस्तकों की जानकारी दी बताया कि उन्हें क्यों पढ़ा जाना चाहिए। उन्‍होंने कई महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकों के बारे में गहराई से जानकारी दी। संविधान को जानने समझने की प्रक्रिया के बारे में बताया। वहीं विकास संवाद पंकज शुक्‍ला ने पूरे आयोजन की रूपरेखा, आयोजन के संचालन, फैलो साथियों के साथ कई तरह की चर्चाओं, कॉर्डिनेशन, समय संतुलन, तमाम सुविधाओं, आगामी आयोजनों के साथ ही फैलो साथियों के रिसर्च वर्क में मदद और मार्गदर्शन दिया।

संविधान संवाद प्रदर्शनी : इन तीन दिनों के दौरान कई फैलो साथियों ने अपने पोस्टर प्रदर्शनी के माध्यम से संविधान के प्रचार-प्रसार के साथ ही उसके बनने की कहानी और विभिन्न जिलों में संविधान से आ रहे बदलाव की बानगी पेश की। रंग बिरंगे पोस्टर और अपने क्रिएटिव काम के जरिए संवैधानिक मूल्यों की उपयोगिता और महत्व को बखूबी प्रस्तुत किया गया। इनमें उमेश यादव की शहीद ए आजम भगत सिंह एवं आजाद क्रांति युवा मंडल की प्रदर्शनी, कृष्‍ण जाटव की संविधान प्रचारक प्रदर्शनी, राहुल पठारे की संविधान जागरूकता अभियान प्रदर्शनी और सयाली की नाइफडा समुदाय के संवैधानिक प्रावधानों पर लगाई गई प्रदर्शनी ने कई तरह की जानकारियां दीं।

किसी भी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में उस देश के संविधान और संवैधानिक मूल्‍यों का बहुत महत्व है। संविधान राज्य और देश की नींव है। इसके बगैर किसी भी समाज, समुदाय और वर्ग का विकास नहीं हो सकता है। इन समुदायों, समाजों और वर्गों में महिला, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग, थर्ड जेंडर आदि सभी आते हैं। संविधान के बगैर किसी भी देश, समाज, समुदाय और लिंग का विकास और प्रगति संभव नहीं। संविधान के मूल्यों और उसकी स्वीकार्यता पर ही किसी भी देश और राज्य की नींव टिकी होती है। 

(विकास संवाद की मैत्री फैलोशिप के वर्धा में तीन दिवसीय सत्र पर नवीन रांगियाल की रिपोर्ट)

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

स्टार्टअप हब बनने की ओर मजबूती से आगे बढ़ रहा उत्तर प्रदेश