Why India Bangladesh relations deteriorated: भारत और बांग्लादेश के संबंध लंबे समय से घनिष्ठ लेकिन जटिल रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका ने बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाई। शेख हसीना के शासनकाल (2009-2024) में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग, व्यापार, कनेक्टिविटी और ऊर्जा परियोजनाओं में मजबूती आई, जिससे बांग्लादेश भारत का करीबी पड़ोसी बना। हालांकि, अगस्त 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन से हसीना का पतन और उनकी भारत में शरण लेना संबंधों में बड़ा बदलाव लाया। दिसंबर 2025 तक, बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं बढ़ी हैं, अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं) पर हमले दर्ज हुए हैं और अंतरिम सरकार के तहत कट्टरपंथी तत्वों का प्रभाव बढ़ा है। यह बदलाव तेजी से हुआ, जिससे सवाल उठता है कि भारतीय विदेश नीति में क्या कमियां रहीं और "नेबरहुड फर्स्ट" दृष्टिकोण कैसे चुनौती का सामना कर रहा है।
भारतीय विदेश नीति की चुनौतियां : भारत की "नेबरहुड फर्स्ट" नीति बांग्लादेश में काफी हद तक शेख हसीना और अवामी लीग पर केंद्रित रही, जिससे सुरक्षा लाभ तो मिले (जैसे उत्तर-पूर्वी उग्रवाद के खिलाफ सहयोग), लेकिन अन्य पक्षकारों – जैसे विपक्षी दल (BNP, जमात-ए-इस्लामी), सिविल सोसाइटी, युवा और छात्र संगठनों – से संपर्क कम रहा। भारतीय संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति की दिसंबर 2025 रिपोर्ट में बांग्लादेश को 1971 के बाद भारत की सबसे गंभीर रणनीतिक चुनौती बताया गया, जिसमें युवा राष्ट्रवाद, इस्लामिस्ट ताकतों का मुख्यधारा में प्रवेश और चीन-पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव शामिल है।
MEA ने हसीना शासन की कमजोरियों – जैसे चुनाव अनियमितताएं, दमन और युवा असंतोष – को पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। 2024 के छात्र आंदोलन को 'आंतरिक मामला' मानकर सक्रिय भूमिका नहीं निभाई गई, लेकिन हसीना को शरण देने से बांग्लादेश में धारणा बनी कि भारत उन्हें संरक्षण दे रहा है। नवंबर 2025 में बांग्लादेशी अदालत ने हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई, जिससे तनाव बढ़ा। पुरानी शिकायतें जैसे तीस्ता जल बंटवारा (2011 से लंबित) और फरक्का बैराज से जल की कमी सुलझाने में देरी ने भारत-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया। सीमा पर अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सख्ती ने भी दोनों पक्षों में तनाव पैदा किया।
हसीना के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। यूनुस नोबेल विजेता हैं, लेकिन राजनीतिक अनुभव सीमित है। इस सरकार ने कानून-व्यवस्था में चुनौतियों का सामना किया, जबकि कट्टरपंथी तत्वों का प्रभाव बढ़ा। इस अशांति की प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से देखें तो यह टाइमलाइन दिखाती है कि कैसे एक फ्रेंडली पड़ोसी देश तेजी से एंटी-इंडिया स्टेट की ओर बढ़ा।
-
जून-जुलाई 2024 : छात्रों ने नौकरियों में कोटा सुधार की मांग की। पुलिस कार्रवाई से हिंसा फैली। UN रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई-अगस्त में सैकड़ों मौतें हुईं। भारत ने इसे आंतरिक मामला माना।
-
5 अगस्त 2024 : हसीना इस्तीफा देकर भारत आईं। यूनुस की अंतरिम सरकार बनी।
-
अगस्त-दिसंबर 2024 : अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े (रिपोर्ट्स में हजारों मामले)। अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा। यूनुस सरकार का चीन-पाकिस्तान की ओर झुकाव दिखा।
-
नवंबर 2025 : हसीना को मौत की सजा (अनुपस्थिति में)।
-
2025 शुरुआत : अल्पसंख्यक हमले जारी। यूनुस की चीन विजिट (मार्च 2025) में आर्थिक सहयोग बढ़ा।
-
11 दिसंबर 2025 : अंतरिम सरकार ने 12 फरवरी 2026 को चुनाव की घोषणा की।
-
12 दिसंबर 2025 : छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी पर हमला (हमलावरों को अवामी लीग से जोड़ा गया, वे भारत भागे)।
-
18 दिसंबर 2025 : हादी की सिंगापुर में मौत। इसके बाद हिंसा : ढाका में प्रोथोम आलो और डेली स्टार के दफ्तर जलाए गए; चटगांव में भारतीय असिस्टेंट हाई कमीशन पर पत्थरबाजी; "बॉयकॉट इंडिया" नारे।
-
18-20 दिसंबर 2025 : मैमनसिंह में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की लिंचिंग (ब्लास्फेमी आरोप में)। अन्य अल्पसंख्यक हमले। अंतरिम सरकार ने हिंसा की निंदा की और गिरफ्तारियां कीं, लेकिन शांति अपील की।
-
वर्तमान (दिसंबर 2025) : चुनाव से पहले अनिश्चितता। जमात-ए-इस्लामी जैसे समूह सक्रिय। यूनुस सरकार पर कानून-व्यवस्था की नाकामी के आरोप। अल्पसंख्यक सुरक्षा और सीमा स्थिरता भारत की चिंता।ये घटनाएं दिखाती हैं कि भारत-विरोधी भावनाएं कुछ समूहों में मजबूत हुई हैं, लेकिन पूरी मुख्यधारा में नहीं। हादी की मौत के बाद हिंसा में मीडिया और अल्पसंख्यक निशाने पर आए, जबकि सरकार ने इसे 'फ्रिंज एलिमेंट्स' की कार्रवाई बताया। अंतरिम सरकार ने शांति की अपील की, लेकिन एंटी-इंडिया भावना मुख्यधारा में आ गई। भारत ने वीजा सेंटर्स बंद किए।
-
दिसंबर 2025 (वर्तमान) : चुनाव से पहले अनिश्चितता, फरवरी 2026 के चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी और रेडिकल तत्व सड़कों पर ताकत दिखा रहे हैं। यूनुस सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकामी के आरोप। अल्पसंख्यक सुरक्षा और सीमा स्थिरता भारत की बड़ी चिंता बनी हुई है।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि एंटी-इंडिया भावना अब मुख्यधारा में है। जमात-ए-इस्लामी और अन्य रेडिकल ग्रुप चुनाव (फरवरी 2026) से पहले सड़क की ताकत दिखा रहे हैं। चीन और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ रहा है – यूनुस ने चीन को पहले विजिट दी और बे ऑफ बंगाल पर "गार्जियनशिप" का दावा किया।
भारतीय विदेश मंत्रालय की "ऑल एग्स इन वन बास्केट" नीति ने हमें कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया। अब चुनौती है कि यूनुस सरकार से व्यावहारिक संबंध बनाए रखें – अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और व्यापार पर जोर दें। हसीना की एक्सट्राडिशन पर सख्त रुख रखें, लेकिन सभी स्टेकहोल्डर्स (BNP सहित) से बात करें। तीस्ता और गंगा जैसे मुद्दों पर जल्द समाधान जरूरी है, वरना यह एंटी-इंडिया ट्रेंड स्थायी हो सकता है। भारत को साउथ एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अधिक संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी, नहीं तो पड़ोसी देशों में चीन का प्रभाव और बढ़ेगा।