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बिखरे सभी बारी-बारी : शिवसेना की तरह कैसे टूटी ममता की TMC, जानिए अंदर की कहानी

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टीएमसी में बगावत की अंदरूनी कहानी
TMC split inside story: पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर हुए अभी महज एक महीना ही बीता है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस वक्त अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट या कहें कि सबसे खराब दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनावों में 41% भारी-भरकम वोट शेयर हासिल करने वाली पार्टी इतनी तेजी से बिखर जाएगी, इसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। अब तो उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो गया है। बंगाल के राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि टीएमसी का हश्र भी कहीं महाराष्ट्र की शिवसेना या एनसीपी जैसा तो नहीं होने जा रहा। आइए जानते हैं ममता बनर्जी के इस अभेद्य किले में लगी इस सेंध की पूरी अंदरूनी कहानी।

4 मई से ही सुलग रही थी बगावत की चिंगारी

पार्टी के भीतर असंतोष की सुगबुगाहट 4 मई को विधानसभा चुनाव परिणाम के साथ ही शुरू हो गई थी, जब चुनावी नतीजों के रुझानों से यह साफ हो गया था कि टीएमसी सत्ता से बाहर होने जा रही है। हार सामने देख कुछ नेताओं ने दबी जुबान में नेतृत्व पर सवाल उठाए, लेकिन तब तक यह खुला विद्रोह नहीं था। ALSO READ: ममता बनर्जी की TMC में बड़ी टूट, ऋतब्रत बनर्जी के साथ 60 विधायक, चुने गए विपक्ष के नेता, स्पीकर ने बागी गुट को दी मंजूरी
 
असली धमाका दो दिन बाद 6 मई को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में हुआ। बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने सभी विधायकों से खड़े होकर अपने भतीजे और पार्टी के नंबर-2 नेता अभिषेक बनर्जी का तालियों के साथ (स्टैंडिंग ओवेशन) स्वागत करने को कहा। हार के गम में डूबे कई विधायकों को यह बात हजम नहीं हुई। 
 
एक वरिष्ठ बागी विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हार इतनी अपमानजनक थी, फिर भी नेतृत्व, खासकर अभिषेक बनर्जी का अहंकार सातवें आसमान पर था। जब उनसे जहांगीर खान के संवेदनशील मामले पर पूछा गया, तो उन्होंने रूखेपन से कहा—'पार्टी का ट्वीट देख लीजिए।' वहीं ममता बनर्जी ने भी साफ कर दिया कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी। बस इसी अहंकार ने विद्रोह के बीज बो दिए। हालांकि अभी भी विधायकों के जो बयान आ रहे हैं, वे ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं हैं। उनका विरोध अभिषेक को लेकर ही है। वे अभी भी ममता बनर्जी को अपना संरक्षक मानने को तैयार हैं। टीएमसी के विधायक किसी भी सूरत में अभिषेक का नेतृत्व स्वीकार करने को राजी नहीं हैं। ALSO READ: बंगाल में महाराष्ट्र जैसा 'खेला' होने की आहट! क्या ममता बनर्जी के हाथ से भी छिन जाएगी असली TMC?

साजिश के केंद्र में ऋतब्रत बनर्जी और उनका सीक्रेट 'दिल्ली दौरा'

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सूत्रों के मुताबिक, इस बगावत की पूरी स्क्रिप्ट उलुबेरिया पूरब के विधायक और पूर्व राज्यसभा सांसद ऋतब्रत बनर्जी ने लिखी है, जिन्हें अब विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता भी दे दी गई है। इस योजना को असली रफ्तार तब मिली जब पिछले हफ्ते ऋतब्रत ने दिल्ली का दौरा किया और वहां उन्होंने बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी से मुलाकात की। दिल्ली से लौटते ही ऋतब्रत ने बंगाल के विधायकों के साथ गुप्त बैठकों का दौर शुरू कर दिया। निष्क्रिय और शांत बैठे केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ विधायकों को एकजुट किया जाने लगा।

'फर्जी हस्ताक्षर' विवाद ने आग में घी डाला

बंगाल का यह राजनीतिक ड्रामा तब और गंभीर हो गया जब इसमें 'हस्ताक्षर जालसाजी' का एंगल जुड़ गया। दरअसल, टीएमसी नेतृत्व ने 1 जून को विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नामित किया था। इस बीच, मुख्‍यमंत्री अधिकारी ने दावा किया कि ऋतब्रत और एंटली के विधायक संदीपन साहा ने शिकायत दर्ज कराई है कि उस पत्र पर उनके फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। हद तो तब हो गई जब सीआईडी जांच के दौरान विधायक अरूप रॉय और बहारुल इस्लाम ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्होंने उस पत्र पर साइन नहीं किए थे।
 
एक वरिष्ठ विधायक ने अभिषेक बनर्जी और उनकी चुनावी रणनीति संभालने वाली एजेंसी आई-पैक (I-PAC) पर निशाना साधते हुए कहा कि इस हस्ताक्षर विवाद में जो कुछ हुआ है, उससे हम बेहद अपमानित महसूस कर रहे थे। हम ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं, लेकिन अभिषेक या किसी बाहरी एजेंसी को पार्टी चलाने की इजाजत नहीं दे सकते।

क्या है विधायकों की मजबूरी?

दिलचस्प बात यह है कि इस बगावत में शामिल कुछ विधायक अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मदद के लिए पाला बदल रहे हैं। दक्षिण 24 परगना के कुलपी से विधायक बरनाली धारा ने अपनी मजबूरी जाहिर करते हुए कहा कि मैं कोई मंजी हुई राजनेता नहीं हूं। हमारे कार्यकर्ता जमीन पर भारी हिंसा का सामना कर रहे हैं और हमें प्रशासन से कोई मदद नहीं मिल रही थी। मुझे लगा कि इस बागी गुट के साथ जाने से ही मैं अपने लोगों के लिए काम कर पाऊंगी और प्रशासन से मदद ले पाऊंगी। वहीं अल्पसंख्यक समुदाय के विधायकों का कहना है कि वे भाजपा के साथ नहीं जाना चाहते, लेकिन अभिषेक के रहते पार्टी में बने रहना भी उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा है।

ममता बनर्जी का पलटवार : दिल्ली से रची गई साजिश

बढ़ते संकट को देखते हुए टीएमसी ने सोमवार को त्वरित कार्रवाई करते हुए ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को "पार्टी विरोधी गतिविधियों" के आरोप में निष्कासित कर दिया। ममता बनर्जी ने एक फेसबुक लाइव के जरिए भावुक और आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि दिल्ली में हमारी पार्टी को तोड़ने की बड़ी साजिश रची गई है। एक व्यक्ति (ऋतब्रत बनर्जी) जो पहले सीपीएम में था, वह यह सब कर रहा है। हमने अपनों का हक मारकर इन्हें टिकट दिया, जिसके लिए मैं माफी मांगती हूं। हमारे 2500 दफ्तरों में तोड़फोड़ की गई है, पुलिस हमारे विधायकों को धमका रही है और उन्हें निष्कासित नेता का साथ देने के लिए मजबूर कर रही है।

क्या टीएमसी सांसद भी टूटेंगे?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी को पंगु करने के बाद, अब असली खतरा दिल्ली में मंडरा रहा है। पार्टी के भीतर कयास लगाए जा रहे हैं कि एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के संसदीय दल (लोकसभा और राज्यसभा) में भी बड़ी टूट हो सकती है। टीएमसी के ही एक वरिष्ठ सांसद ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि विधायक दल टूटने के बाद भाजपा शांत नहीं बैठेगी। संसद में भी अभिषेक बनर्जी को अलग-थलग करने की तैयारी है। हमारे दो-तिहाई (2/3) सांसद बहुत जल्द विद्रोह करने वाले हैं। यह टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील होगी।
 
महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की तरह, यह बागी गुट ही असली टीएमसी होने का दावा करेगा और पार्टी के नाम व चुनाव चिन्ह (जोड़ा फूल) पर कब्जा कर लेगा। विधानसभा अध्यक्ष भी इस गुट को मान्यता देने में देर नहीं लगाएंगे। बंगाल की राजनीति इस समय बेहद संवेदनशील मोड़ पर है, जहां ममता बनर्जी का करीब दो दशक पुराना साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखरता नजर आ रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने में सफल होंगी या फिर उनका हश्र शरद पवार और उद्धव ठाकरे से भी बुरा होगा?
Edited by: Vrijendra Singh 

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