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दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में भारत क्यों बना नंबर-1?

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heat in india
Heatwave in Indian Cities: दुनिया के टॉप 100 सबसे गर्म शहरों में अधिकांश भारत के है, इनमें भी 40 से ज्यादा शहर उत्तर प्रदेश के है। यह उस बदलती वास्तविकता का संकेत है, जिसमें भारत के शहर धीरे-धीरे ‘हीट ट्रैप’ बनते जा रहे हैं। जानिए कैसे विकास के नाम पर हो रही पेड़ों की कटाई और 'सुपर एल नीनो' भारत को तंदूर बना रहे हैं।
 
भारत इस समय एक गहरे विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है— एक तरफ रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, दूसरी तरफ रिकॉर्ड स्तर पर पेड़ों की कटाई। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि क्या यह विकास हमारे अस्तित्व की बुनियाद को ही खत्म कर रहा है? भारत केवल गर्म नहीं हो रहा—वह संरचनात्मक रूप से तप रहा है। और इस तपिश के पीछे सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत प्राथमिकताएं भी जिम्मेदार हैं। 
 
तमिलनाडु के कोविलंगुलम में पारा 49.6 डिग्री सेल्सियस रहा तो उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। मध्यप्रदेश का खजुराहो 47.4 डिग्री तापमान के साथ देश का तीसरा सबसे गर्म शहर रह। भारत में बढ़ता तापमान केवल मौसमी चरम नहीं, बल्कि मानव-निर्मित हीट इकोनॉमी के संकेत हैं।

वैज्ञानिकों ने पहले ही चेताया है कि El Nino के इस साल लंबे समय तक बने रहने की संभावना है। “सुपर एल नीनो” की आशंका भी जताई जा रही है—जो तापमान, सूखा और चरम मौसम को और बढ़ा सकता है। इतिहास में 1877 का अकाल और 1997-98 का सुपर एल नीनो ऐसे ही उदाहरण हैं, जब प्राकृतिक घटना ने मानवीय संकट को कई गुना बढ़ा दिया।
 
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत में हीटवेव अब मौसम की घटना नहीं, बल्कि नीति की विफलता का परिणाम बनती जा रही है। हाल ही में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कैंपबेल बे में स्थित ग्रेट निकोबार परियोजना “देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और गंभीर अपराधों में से एक है, उन्होंने आगे कहा कि सरकार यहां जो कर रही है उसे ‘परियोजना’ कहती है। मैंने जो देखा है वह कोई परियोजना नहीं है। यह कुल्हाड़ी के लिए चिन्हित किए गए लाखों पेड़ हैं। यह मरने के लिए अभिशप्त 160 वर्ग किलोमीटर का वर्षावन है। ये वे समुदाय हैं जिन्हें उनके घर छीनते समय नजरअंदाज कर दिया गया है। यह विकास नहीं है। यह विकास की भाषा में लिपटा विनाश है।”
 

जब पेड़ विकास में ‘अड़चन’ बन जाते हैं

इतिहास गवाह है कि विकसित सभ्यताओं ने शहरीकरण के साथ हरित आवरण को संरक्षित किया। भारत में इसके उलट, पेड़ों को अक्सर ‘अड़चन’ के रूप में देखा जाता है। इसी समय, देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। वजहें अलग-अलग हैं— मेट्रो, हाईवे, रिवरफ्रंट, धार्मिक पर्यटन, रेलवे—लेकिन नतीजा एक ही है: शहरों और जंगलों से हरियाली का तेज़ी से गायब होना।
 
कुछ हालिया उदाहरण देखें:
  • दिल्ली में बिजवासन रेल टर्मिनल के लिए 1,279 पेड़ों की कटाई
  • बेंगलुरु में मेट्रो विस्तार के लिए 6,800 पेड़
  • मुंबई में कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए 46,000 मैंग्रोव
  • अरुणाचल प्रदेश में एक परियोजना के लिए 23 लाख पेड़ों की संभावित कटाई
  • उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा मार्ग के लिए 17,000 पेड़
  • मध्य प्रदेश के चोरल क्षेत्र में रेलवे लाइन के लिए 5 लाख पेड़ों का प्रस्ताव
ये सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं। ये उन पारिस्थितिक तंत्रों की कहानी हैं, जो धीरे-धीरे टूट रहे हैं।
 
इन जंगलों में क्लाउडेड लेपर्ड, हूलॉक गिबन, पेंगोलिन, टाइगर और किंग कोबरा जैसे जीव रहते हैं। लेकिन अक्सर विकास की बहस में इनका ज़िक्र ही नहीं होता। और शायद इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण—पेड़ अकेले नहीं होते। वे जमीन के नीचे माइकोराइजा नेटवर्क के जरिए जुड़े होते हैं। जब एक जंगल कटता है, तो सिर्फ़ पेड़ नहीं गिरते—एक पूरा जीवित तंत्र टूट जाता है।
 

क्या हम ‘हीट आइलैंड’ बना रहे हैं?

शहरों में बढ़ती गर्मी को अब वैज्ञानिक Urban Heat Island Effect (शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव) के रूप में पहचानते हैं। जहां कंक्रीट और डामर गर्मी को सोखते और फिर छोड़ते हैं, जिससे तापमान आसपास के क्षेत्रों से ज्यादा हो जाता है। यही भारत के अधिकतर शहरों में हो रहा है। पेड़ इस प्रभाव को कम करते हैं। वे छाया देते हैं, हवा को ठंडा करते हैं और नमी बनाए रखते हैं।
 
  • लेकिन जब शहरों से पेड़ हटाए जाते हैं, तो:
  • तापमान कई डिग्री बढ़ जाता है
  • एयर कंडीशनिंग की मांग बढ़ती है
  • बिजली खपत और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है
पेड़ इस प्रभाव को कम करते हैं:
  • छाया प्रदान करते हैं
  • हवा को ठंडा करते हैं
  • नमी बनाए रखते हैं
इसके बावजूद, शहरी योजनाओं में पेड़ों को अक्सर ‘हटाने योग्य बाधा’ माना जाता है।
 
World Health Organization के अनुसार, जैव विविधता का नुकसान सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। हीटवेव के दौरान यह प्रभाव और घातक हो जाता है—खासतौर पर बुजुर्गों, बच्चों और निम्न-आय वर्ग के लिए। शहरों में रहने वाले गरीब और हाशिए के समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं—क्योंकि उनके पास न तो पर्याप्त हरित क्षेत्र होते हैं, न ही ठंडक के संसाधन। 
 

प्रतिपूरक वृक्षारोपण : समाधान या भ्रम?

प्रतिपूरक वृक्षारोपण अक्सर समाधान के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह अधूरा है। सैकड़ों साल पुराने पेड़ों की पारिस्थितिकी को कुछ वर्षों में लगाए गए पौधे प्रतिस्थापित नहीं कर सकते—यह संख्या का नहीं, गुणवत्ता का सवाल है।
 
एक सैकड़ों साल पुराना पेड़ और एक नया पौधा—दोनों को बराबर मान लेना वैज्ञानिक रूप से गलत है। नया पौधा न तो उतनी छाया देता है, न उतनी कार्बन अवशोषित करता है, न ही वह उसी जैविक नेटवर्क का हिस्सा होता है। 
 
इसके अलावा, कई जगहों पर लगाए गए पौधे जीवित ही नहीं रह पाते।
 
National Board for Wildlife द्वारा पिछले 12 वर्षों में 97% परियोजनाओं को मंजूरी दिए जाने का आंकड़ा यह सवाल उठाता है— क्या पर्यावरणीय मंजूरी वास्तव में एक जांच प्रक्रिया है, या सिर्फ़ एक औपचारिकता? 
 
न्याय पालिका ने कुछ मामलों में सख्ती दिखाई है, एक ओर सुप्रीम कोर्ट पेड़ों की कटाई को “मानव हत्या से भी बदतर” बताता है लेकिन वहीं बड़े प्रोजेक्ट्स में अक्सर संतुलन विकास के पक्ष में झुकता दिखता है।
 

ग्रीन कवर’ का आंकड़ा क्या सच बताता है?

सरकारी रिपोर्टें अक्सर बताती हैं कि भारत का वन क्षेत्र बढ़ रहा है। लेकिन विशेषज्ञ इस पर सवाल उठाते हैं। कारण यह है कि इन आंकड़ों में प्लांटेशन, बांस और बागानों को भी ‘वन’ माना जाता है। जबकि पुराने, प्राकृतिक जंगल—जो जैव विविधता के असली केंद्र हैं—तेजी से कम हो रहे हैं। यानी कागज पर हरियाली बढ़ रही है, लेकिन जमीन पर वह बदलती और कमजोर होती हरियाली है।
 
विकास का सवाल अब यह नहीं है कि हम कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं— बल्कि यह है कि क्या हम उस जमीन को ही खत्म कर रहे हैं, जिस पर खड़े हैं। 
 
भारत को अब:
  • पेड़ों को इंफ्रास्ट्रक्चर मानना होगा
  • संवेदनशील क्षेत्रों में ‘नो-गो ज़ोन’ तय करने होंगे
  • पर्यावरणीय मंजूरी को पारदर्शी बनाना होगा
अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले वर्षों में सवाल यह नहीं होगा कि शहर कितने विकसित हैं— बल्कि यह होगा कि क्या वे रहने लायक बचे हैं। और तब तक, शायद हमारे पास जवाब देने के लिए बहुत कम समय बचा होगा। 

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