विकास की चकाचौंध और स्मार्ट सिटी के दावों के बीच, इंदौर के भागीरथपुरा इलाके से आई तस्वीरें और कहानियाँ रूह कंपा देने वाली हैं। यहाँ मौत किसी बीमारी या हादसे के रूप में नहीं, बल्कि सीधे नल की टोंटी से बहकर आई। जिस पानी से प्यास बुझनी थी, उसने घरों के चिराग बुझा दिए।
यह विडंबना ही है कि जिस क्षेत्र का नाम माँ गंगा को धरती पर लाने वाले 'भागीरथ' के नाम पर हो और जो 'बाणगंगा' थाने की सरहदों में आता हो, वहाँ लोग पानी की एक-एक बूंद में घुले ज़हर से मर रहे हैं।
10 साल का इंतज़ार और 6 महीने की ज़िंदगी: इस त्रासदी का सबसे मासूम चेहरा वह छह महीने का बच्चा है, जिसका नाम रखने से पहले ही कुदरत (या प्रशासनिक लापरवाही) ने उसे छीन लिया। सुनील और उनकी पत्नी ने एक बेटे के लिए 10 लंबे साल तक प्रार्थनाएँ की थीं। सुनील की कांपती आवाज़ इस सिस्टम की विफलता की गवाही देती है: “उसे सिर्फ दस्त और बुखार था... अचानक रात में उसने उल्टी की और वह हमें छोड़कर चला गया।” एक दशक की प्रतीक्षा का अंत महज कुछ घंटों की उल्टी-दस्त ने कर दिया। क्या उस पिता को कभी यह समझाया जा सकेगा कि उसके बेटे की जान की कीमत पाइपलाइन में घुले गंदे पानी से भी कम थी?
चंद घंटों में उजड़ गए कई घर: 31 वर्षीय उमा कोरी की कहानी रोंगटे खड़े कर देती है। रविवार की रात उन्होंने परिवार के साथ सामान्य भोजन किया था, लेकिन सोमवार तड़के 3 बजे काल ने दस्तक दी। उनके पति बिहारी कोरी उन्हें बाइक पर अस्पताल ले जा रहे थे, लेकिन अस्पताल की दहलीज नसीब होने से पहले ही उमा ने दम तोड़ दिया।
74 वर्षीय मंजुला वाधे और 50 वर्षीय सीमा प्रजापत की मौत ने यह साफ कर दिया कि यह केवल 'फूड पॉइजनिंग' का मामला नहीं था, बल्कि एक सामूहिक नरसंहार जैसी स्थिति थी, जहाँ हथियार दूषित पानी था।
'कार्डियक अरेस्ट' या सिस्टम की विफलता? हैरानी की बात यह है कि शुरुआत में अस्पताल प्रशासन ने मौत का कारण 'कार्डियक अरेस्ट' बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक ही इलाके के स्वस्थ लोगों के दिल अचानक एक साथ धड़कना बंद कर सकते हैं? बाद में हुई पुष्टि ने सच उजागर कर दिया—मौत की वजह वह पानी था जिसमें ड्रेनेज का जहर मिल चुका था।
"हमने सोचा था कि उन्होंने कुछ गलत खा लिया होगा; हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जो पानी हम रोज पीते हैं, वह उन्हें मार डालेगा।" सिद्धार्थ (मृतक नंदलाल के पुत्र)
प्रशासन की चुप्पी और जनता का आक्रोश: स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पिछले एक सप्ताह से नलों में बदबूदार पानी आ रहा था। शिकायतें हुईं, लेकिन फाइलों के बोझ तले दबी रहीं। जब तक प्रशासन जागा, तब तक कई घर वीरान हो चुके थे।
शहरों को 'स्मार्ट' बनाने का दावा करने वाले हुक्मरानों की आपसी खींचतान और भ्रष्टाचार ने जमीन के अंदर बिछी नसों (पाइपलाइनों) को सड़ा दिया है। पीने के पानी और ड्रेनेज की लाइनें आपस में मिल चुकी हैं, और 'होशियार जिम्मेदार' एसी कमरों में बैठकर मीटिंग्स कर रहे हैं।
सवाल है कि हमारे शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर इतना खोखला हो चुका है कि पीने के पानी और ड्रेनेज की लाइनें आपस में मिल रही हैं और इन्हें खबर ही नहीं?
क्या गरीब बस्तियों में रहने वाले लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है? मौत के बाद 'जांच का आश्वासन' या कुछ लाख रुपर का चेक क्या उन परिवारों को इंसाफ दे पाएगा जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया?
भागीरथपुरा की यह आपबीती केवल एक क्षेत्र का दर्द नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के लिए चेतावनी है जो बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करने में विफल रही है। आज भागीरथपुरा रो रहा है, कल कोई और इलाका हो सकता है।