Unnao rape case: भारत की न्याय व्यवस्था में अक्सर एक जुमला दोहराया जाता है— "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।" लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उन्नाव बलात्कार कांड के मुख्य दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित करने और उसे जमानत देने के फैसले ने इस जुमले पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
जब रक्षक ही भक्षक बना : याद कीजिए 2017 का वो साल, जब एक नाबालिग लड़की ने सत्ता के नशे में चूर एक विधायक के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत की थी। वह लड़ाई सिर्फ एक बलात्कार के खिलाफ नहीं थी, बल्कि एक पूरे सिस्टम के खिलाफ थी। उस पीड़िता ने अपने पिता को पुलिस हिरासत में खोया, अपने परिजनों को सड़क हादसों में गंवाया और खुद मौत के मुंह से लड़कर वापस आई। 2019 में जब ट्रायल कोर्ट ने सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई, तो लगा कि अंधेरे घर में इंसाफ की एक मोमबत्ती जली है। लेकिन सजा निलंबन (Sentence Suspension) के इस फैसले ने उस मोमबत्ती की लौ को ही थरथरा दिया है।
शर्तों की लक्ष्मण रेखा और जमीनी हकीकत : अदालत ने शर्त रखी है कि सेंगर पीड़िता के 5 किलोमीटर के दायरे में नहीं आएगा और उसे धमकाएगा नहीं। कागजों पर यह शर्त बहुत अच्छी लगती है, लेकिन क्या हम उस खौफ को भूल सकते हैं जो सेंगर के नाम मात्र से उन्नाव की गलियों में तैरता था? एक व्यक्ति जिस पर बलात्कार, अपहरण और पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ का आरोप हो, उसके लिए "5 किलोमीटर" की दूरी क्या वाकई पीड़िता को सुरक्षा का अहसास करा पाएगी? अहम बात तो यह है कि पीड़िता और उसके परिवार को को परोक्ष रूप से धमकियां मिलना शुरू हो गई हैं। पीड़िता ने कहा है कि इस निर्णय से उसकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। कुलदीप बाहुबली है। पिता की हत्या में जेल से छूटकर आए अन्य लोग धमकियां दे रहे हैं। कह रहे हैं कि अब तो कुलदीप भइया बाहर आ ही गए हैं, एक-एक से निपटा जाएगा।
न्याय में देरी और 'अपील' का अंतहीन सिलसिला : सेंगर ने 2019 के फैसले को चुनौती दी है और जब तक अपील लंबित है, वह बाहर रहेगा। भारतीय अदालतों में अपीलों के निपटारे में सालों, कभी-कभी दशक लग जाते हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या एक जघन्य अपराधी को सिर्फ इसलिए समाज में घूमने की अनुमति मिलनी चाहिए क्योंकि उसकी अपील पर अंतिम मुहर नहीं लगी है? क्या यह उस पीड़िता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा नहीं है, जिसने अपनी पूरी दुनिया इस इंसाफ की खातिर उजाड़ दी?
उल्लेखनीय है कि सेंगर को 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में दिसंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट (तीस हजारी कोर्ट, दिल्ली) ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके अलावा पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) मामले में भी उसे 10 साल की सजा मिली थी, जिसकी अपील अभी हाईकोर्ट में लंबित है।
सत्ता, समाज और हमारी जवाबदेही : यह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह एक संदेश है। जब एक ताकतवर अपराधी जेल से बाहर आता है, तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं होता; वह उस डर का प्रतीक होता है जो हर उस बेटी के मन में बैठ जाता है जो किसी रसूखदार के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटा रही होती है। 15 लाख का निजी मुचलका और जमानत की राशि सेंगर जैसे लोगों के लिए शायद एक मामूली कीमत है, लेकिन उस पीड़िता के लिए अपनी जान बचाए रखना एक भारी कीमत है जिसे वह हर दिन चुका रही है।
अदालतें तथ्य और सबूतों पर चलती हैं, यह सच है। लेकिन न्याय का एक नैतिक पक्ष भी होता है। कुलदीप सेंगर की रिहाई यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा सिस्टम इतना लचीला है कि वह रसूखदार गुनहगारों की सुविधा के लिए अपनी राहें बदल लेता है, जबकि पीड़ितों के लिए वही राहें कांटों भरी बनी रहती हैं?
अगर भक्षक "बाहुबली" बन बाहर घूमेंगे, तो बेटियां इंसाफ की उम्मीद किससे करेंगी? आज यह सवाल दिल्ली हाईकोर्ट के गलियारों से लेकर भारत के हर उस घर तक गूंज रहा है जहां एक बेटी सुरक्षित भविष्य का सपना देखती है।