“तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख…” फिल्म दामिनी में Sunny Deol का यह संवाद केवल अदालत की सुस्ती पर व्यंग्य नहीं था, बल्कि उस भारतीय व्यवस्था का आईना था जहां कानून की किताब सबके लिए एक जैसी दिखती है, लेकिन उसका इस्तेमाल सबके लिए बराबर नहीं होता।
आज यह संवाद फिर प्रासंगिक लगता है— क्योंकि एक तरफ देश की जेलों में हजारों विचाराधीन कैदी सालों तक सुनवाई का इंतजार करते रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर मामलों में दोषी करार दिया गया Gurmeet Ram Rahim Singh बार-बार पैरोल और फरलो पाकर जेल से बाहर आता है, सत्संग करता है, गाने लॉन्च करता है, वीडियो संदेश देता है और राजनीतिक मौसम के साथ उसकी “आध्यात्मिक सक्रियता” भी अचानक बढ़ जाती है।
सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां “सजा” और “सुविधा” के बीच की रेखा रसूख देखकर तय होती है।
जेल या वीआईपी वेटिंग लाउंज?
भारतीय जेल व्यवस्था का सिद्धांत कहता है कि पैरोल एक मानवीय राहत है — परिवार में मृत्यु, बीमारी, सामाजिक संकट या मानसिक पुनर्वास जैसे कारणों के लिए। लेकिन जब पैरोल बार-बार मिलने लगे, उसकी टाइमिंग राजनीतिक रूप से सुविधाजनक दिखने लगे, और जेल से बाहर आकर दोषी व्यक्ति सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन करने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
क्या पैरोल सुधार का माध्यम है या प्रभावशाली लोगों के लिए “कानूनी छुट्टी पैकेज”?
भारत की जेलों में ऐसे लाखों कैदी हैं जिन्हें मामूली जमानत तक नहीं मिलती। कई लोग उस अपराध की अधिकतम संभावित सजा से भी ज्यादा समय विचाराधीन कैदी के रूप में काट देते हैं। उनके लिए कानून धीमा है, कठोर है, और लगभग बहरा है। लेकिन कुछ लोगों के लिए वही कानून आश्चर्यजनक रूप से लचीला हो जाता है।
कानून की आंखों पर पट्टी है… या चयनात्मक दृष्टि?
भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह मानी जाती है कि कानून “अंधा” होता है — यानी सबको बराबर देखता है। लेकिन वास्तविकता में भारतीय जनता का अनुभव कुछ और कहता है।
आम नागरिक के लिए:
• अदालत = इंतजार
• पुलिस = दबाव
• जेल = दंड
लेकिन रसूखदार के लिए:
• अदालत = प्रक्रिया
• कानून = व्याख्या
• जेल = अस्थायी व्यवधान
यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र धीरे-धीरे “कानूनी समानता” से “कानूनी विशेषाधिकार” की ओर खिसकने लगता है।
फ्रांसीसी दार्शनिक Michel Foucault ने लिखा था: “कानून केवल न्याय का उपकरण नहीं होता, वह सत्ता का प्रदर्शन भी होता है।” भारत में यह प्रदर्शन अब बेहद आम दृश्य हो चुका है।
जब अपराधी इन्फ्लुएंसर बन जाए
सबसे विचित्र बात यह नहीं कि पैरोल मिली। सबसे विचित्र बात यह है कि जेल से बाहर आने के बाद एक दोषी व्यक्ति सार्वजनिक मंचों पर लगभग सेलिब्रिटी की तरह सक्रिय रहता है।
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वीडियो संदेश।
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भक्तों की भीड़।
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राजनीतिक संकेत।
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यूट्यूब संस्कृति।
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डिजिटल ब्रांडिंग।
यह सब उस देश में हो रहा है जहां पीड़ितों को अक्सर अपनी पहचान छिपानी पड़ती है।
भारत का सामाजिक मनोविज्ञान भी यहां कटघरे में खड़ा है। हम अपराध और प्रसिद्धि के बीच की रेखा खो चुके हैं। टीआरपी, सोशल मीडिया और राजनीतिक लाभ ने “दोषी” को भी “प्रभावशाली” बना दिया है।
क्या न्याय अब सिर्फ प्रक्रिया बनकर रह गया है?
भारतीय न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट देरी नहीं है। सबसे बड़ा संकट है — जनता का घटता भरोसा।
जब लोग देखते हैं कि:
• गरीब जमानत के लिए वर्षों भटकता है,
• किसान कर्ज के लिए जेल जाता है,
• छात्र सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तार हो जाता है,
• लेकिन प्रभावशाली दोषी बार-बार राहत पा लेते हैं,
तब संविधान की किताब से ज्यादा असर जनता की निराशा करती है।
लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र इस विश्वास पर चलता है कि कानून सबके लिए समान है। और जब यह विश्वास टूटने लगता है, तब नागरिक कानून का सम्मान नहीं, बल्कि उससे दूरी बनाना शुरू कर देते हैं।
भारत को किस तरह की न्याय व्यवस्था चाहिए?
यह बहस किसी एक बाबा, एक पार्टी या एक केस की नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न की बहस है:
क्या भारत में न्याय व्यवस्था व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक ताकत से प्रभावित हो रही है?
अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर हर बार वही चेहरे विशेष राहत क्यों पाते हैं?
और अगर जवाब “हां” है, तो फिर लोकतंत्र की नैतिक नींव कितनी सुरक्षित बची है?
लेखक George Orwell ने Animal Farm में लिखा था: “All animals are equal, but some animals are more equal than others.
भारतीय लोकतंत्र का सबसे खतरनाक क्षण वह होगा जब जनता यह मान ले कि यह पंक्ति अब केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि वास्तविकता है।
अंतिम सवाल
जब जेल से बाहर आने वाला दोषी व्यक्ति खुद कानून से ज्यादा शक्तिशाली दिखने लगे,
तो फिर असली कैद में कौन है?
वह व्यक्ति… या भारत का न्यायबोध?
About Writer
संदीप सिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो:
IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC, DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से....
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