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कश्मीर में शुष्क रही सर्दियां, 5 ग्लेशियर झीलें फटने का खतरा!

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सुरेश एस डुग्गर

नई दिल्ली , सोमवार, 12 जनवरी 2026 (14:45 IST)
Jammu Kashmir news in hindi : कश्मीर में ग्लेशियर झील फटने का खतरा मंडरा रहा है। एक शोध में इसका खुलासा हुआ है। शोध में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस बार कश्मीर में सर्दियां असामान्य रूप से शुष्क रहीं, जिससे ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियर झील फटने की घटनाओं का खतरा बढ़ गया है।
 
यह चेतावनी प्रतिष्ठित जर्नल आफ ग्लेशियोलाजी में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोध में दी गई है, जिसे कश्मीर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इंटरनेशनल ग्लेशियोलाजिकल सोसाइटी और कैम्ब्रिज के सहयोग से अंजाम दिया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कश्मीर हिमालय की कम से कम 5 ग्लेशियर झीलें अत्यंत उच्च जोखिम की श्रेणी में आ चुकी हैं, जहां कभी भी विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
 
एक खबर के अनुसार, ग्लेशियर झील फटने की घटनाएं तब होती हैं, जब ढीली मोरेन से बनी झील की दीवार अचानक टूट जाती है और भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह निकलता है। इससे निचले इलाकों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हो सकता है।
 
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शोध के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के कारण कश्मीर के कई प्रमुख ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। कोलाहोई, थाजीवास, होक्सर, नेहनार, शीशराम और हरमुख क्षेत्र के आसपास के ग्लेशियरों में तेज पिघलाव देखा जा रहा है। इससे नई ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो रहा है, जो भविष्य में बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं।
 
अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. सैयद दानिश रफीक काशानी के अनुसार, 1992 से 2024 के बीच कश्मीर क्षेत्र में बर्फ से जुड़ी झीलों का क्षेत्रफल लगभग 26 प्रतिशत बढ़ चुका है। उपग्रह डेटा और आधुनिक माडलिंग तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने 10 अलग-अलग जोखिम कारकों, जैसे भूकंपीय गतिविधि, ढलान की स्थिरता, पर्माफ्रास्ट का पिघलना और झीलों की संरचनाकृके आधार पर आकलन किया है।
 
शोध में बताया गया है कि ब्रामसर, चिरसर, भागसर, नुंदकोल और गंगाबल जैसी झीलें टिक-टिक करता टाइम बम बन चुकी हैं। अकेले गंदरबल जिले में नुंदकोल और गंगाबल झीलों से एक हजार से अधिक इमारतें, चार पुल और एक जलविद्युत परियोजना खतरे में हैं। वहीं दक्षिण कश्मीर के शोपियां और कुलगाम जिलों में सैकड़ों इमारतें और पुल जोखिम में बताए गए हैं।
 
हालांकि वैज्ञानिकों ने जोर दिया है कि यह कोई डर फैलाने वाली बात नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित चेतावनी है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि उच्च जोखिम वाली झीलों पर रियल-टाइम सेंसर, अर्ली वार्निंग सिस्टम, सामुदायिक अलर्ट और इंजीनियरिंग सुरक्षा उपाय तुरंत लागू किए जाएं।

वैसे जम्मू कश्मीर सरकार ने भी खतरे को देखते हुए फोकस्ड मानिटरिंग कमेटी का गठन किया है। अब तक 14 उच्च जोखिम, तीन मध्यम और सात कम जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों की पहचान की जा चुकी है। शेषनाग और सनासर जैसी झीलों पर विशेष अभियान भी चलाए गए हैं।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर को भविष्य में सिक्किम 2023 जैसी त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है, जहां 100 से अधिक लोगों की जान चली गई थी।
edited by : Nrapendra Gutpa 

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