UGC के नए नियमों पर जानें क्यों हो रहा बवाल, पिछड़ा बनाम अगड़ा की सियासत में भी उबाल
UGC के नए नियमों को लेकर आमने-सामने NDA के दिग्गज नेता
UGC के नए नियम को लेकर देश में बवाल बढ़ता जा रहा है। मंगलवार को सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों ने दिल्ली में UGC मुख्यालय का घेराव किया। नए नियमों को सामान्य वर्ग विरोधी और काला कानून बताते हुए प्रदर्शनकारियों ने इसे तत्काल वापस लेने की मांग की। वहीं दूसरी ओर बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अंलकार अग्निहोत्री जिन्होंने UGC के नए नियम के विरोध में इस्तीफा दिया था,उनका इस्तीफा सरकार ने नामंजूर करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया है। वहीं UGC के नए नियमों के विरोध में एक फरवरी को भारत बंद का भी आव्हान भी सोशल मीडिया पर किया जा रहा है।
क्या हैं UGC का नया नियम?-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026' को लागू किया है। UGC ने 2012 के नियमों में बदलवाल और नए नियमों को लागू करने का उद्देश्य यूनिवर्सिटी और कॉलेज कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकना और सभी वर्गों के लिए समान, सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करना बताया है।
UGC के नए नियम में प्रवाधान किया गया है कि जाति आधारित भेदभाव अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के खिलाफ होने वाले जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को माना जाएगा। UGC का कहना है कि इन नियमों से कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में अनुसूचित जाति (SC), नुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने में मदद मिलेगी। UGC के नए नियमों के मुताबिक हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में अब एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ बनाना अनिवार्य होगा। इसके साथ यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी। इस समिति में ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी। UGC का तर्क है कि नए नियमों से यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को रोकने में मदद मिलेगी। नए नियमों से शिकायतों की निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी।
UGC के नए नियम का विरोध क्यों?- UGC के नए नियम का सवर्ण समाज खुलकर विरोध कर रहा हैं। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का दावा हैं कि इस नए नियम से सामान्य वर्ग के शिक्षकों और स्टूडेंट को झूठे मामलों में फंसाकर उन्हें आसानी से शिकार बनाया जा सकता हैं। UGC के नए नियम को लेकर विरोध सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हो रहा है। सोशल मीडिया पर #RollbackUGC लगातार ट्रेंड कर रहा है। सोशल मीडिया पर इसे काला कानून बताकर विरोध किया जा रहा है। UGC के नए नियम का विरोध करने वालों का तर्क है कि नए नियम के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को संभावित अपराधी करार दे दिया गया है। मशूहर कवि और लेखक कुमार विश्वास ने UGC के नए नियमों को वापस लेने की मांग की है।
UGC के 2012 के नियमों के मुताबिक अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से एससी और एसटी समुदाय तक ही सीमित मानी जाती थीं। वहीं अब नए नियमों के तहत ओबीसी वर्ग को भी स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है. इसका मतलब यह है कि अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज करा सकेंगे। जबकि अब यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में सामान्य और ओबीसी वर्ग को एक कैटेगरी में माना जाता था।
वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् विष्णु राजगढिया कहते हैं कि UGC के नए नियम को सवर्ण समाज चिंतित क्यों है, इसका कारण समता नियमावली की धारा-8 है। UGC के नए नियमों के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में समता नियमावली की धारा 8 खतरनाक है। कोई भी पीड़ित 'समता हेल्पलाइन' में किसी भेदभाव की शिकायत कर सकता है। यदि प्रथमदृष्टया किसी दंड विधि के तहत मामला बनता है, तो इस शिकायत को संबंधित पुलिस अधिकारियों के पास भेज दिया जाएगा। संस्थान के प्रमुख के पास कोई शिकायत आए, तो उसे भी पुलिस अधिकारियों को तत्काल सूचित करना होगा।
विष्णु राजगढिया कहते है कि आम तौर पर किसी मामूली विवाद में भी पीड़ित द्वारा शिकायत में कुछ मिर्च-मसाला लगाया जाता है। अब तक सामान्य मामलों को संस्थान के स्तर पर निपट लिया जाता था। लेकिन अब तत्काल पुलिस को सूचना देना हर संस्थान का दायित्व होगा। अगर संस्थान ऐसा न करे, तो खुद संस्थान के खिलाफ ही कार्रवाई हो जाएगी। इसलिए संस्थान हर मामले की सूचना पुलिस को भेजकर अपना बचाव करेगा। इससे मामूली विवाद भी गहरे होंगे। संस्थान के अपने अधिकार कमजोर होंगे और पुलिस की ताकत बढ़ेगी। पहले सुनने को मिलता था कि स्टूडेंट्स के आंतरिक मामलों में पुलिस को हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दी जाती थी। अब वीसी खुद ही बच्चों को पुलिस के हवाले कर देगा।
वहीं सपाक्स अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा13 जनवरी को जारी गजट नोटिफिकेशन में रैगिंग रोकने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे पत्र हीरालाल त्रिवेदी ने मांग की है कि इन नियमों में संशोधन किए जाना चाहिए। रैगिंग को स्पष्ट परिभाषित किया जाए। सीनियर और जूनियर छात्र-छात्राओं की भी परिभाषा दी जाए क्योंकि उच्च शिक्षा परिसरों में सामान्यतः सीनियर छात्र ही जूनियर छात्र-छात्राओं को परेशान करते हैं जाति से इसका कोई संबंध नहीं है। दूसरा बलवान छात्र एवं समूह में रहने वाले छात्रगण ही जूनियर छात्र-छात्राओं को परेशान करते हैं यहां भी जाति से कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह आवश्यक है कि छात्र-छात्राओं को किन प्रकारों से परेशान किया जा सकता है उसकी भी छानबीन कर उसका भी परिभाषा में उल्लेख किया जाना उचित होगा। विनियम केवल वर्ग विशेष के संरक्षण के लिए ना हो वरन् सभी वर्गों के समान रूप से संरक्षण के लिए हो। विशेषकर छात्राओं की सुरक्षा के लिए हो।
UGC के नए नियम पर अगड़ा बनाम पिछड़ा की सियासत- UGC के नए नियमों को लेकर देश में सियासत शुरु हो गई है। उत्तर प्रदेश जहां अगले साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने है वहां पर इस पर अगड़ा बनाम पिछड़ा की सियासत शुरु हो गई है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर जहां लखनऊ में कऱणी सेना समेत कई ब्राह्मण संगठन विरोध कर रहे है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हो रहे विरोध प्रदर्शन में निशाना भाजपा से जुड़े सवर्ण समाज के नेता हो रहे है। वहीं UGC के नए नियमों के विरोध में यूपी में भाजपा नेता भी विरोध में खुलकर समाने आ रहे है। UGC के नए नियमों को लेकर अब खुलकर अगड़ा बनाम पिछड़ा की सियासत शुरु हो गई है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने UGC के नए नियमों को सहीं बताते हुए कहा कि यह बदलाव पहले हो जाना चाहिए। ओबीसी समुदाय को यह हक पहले मिल जाना चाहिए।
वहीं भाजपा सांसद निशिकांत दूबे UGC के नए नियमों को सवर्ण समाज के विरोध की बातों को नकारते है। वह कहते है कि 2005 में सवर्ण ग़रीबों की स्थिति पर सीनों कमीशन कॉंग्रेस,राजद, झामुमो,डीएमके,बसपा,कम्युनिस्ट पार्टी ने बनवाया,2010 पॉंच साल में रिपोर्ट आया। सवर्ण समाज के बच्चों के हाथ में झुनझुना मिला ।मोदी जी ने ही EWS आरक्षण दिया,आज गरीब IAS,IPS,doctors,professors हैं,उच्च शिक्षा में भी आरक्षण पाकर पढ़ाई कर रहे हैं ।जो काम करे उसी का विरोध,इस UGC की भ्रांति भी लोगों के सामने आएगी,संविधान की धारा 14-15 पूर्णतया लागू होगा।काश इतनी आक्रामकता अल्पसंख्यक संस्थानों के मिले अधिकारों पर होता जो संविधान की धारा 25 से 29 तक पढ़ पाते।
वहीं UGC के नए नियम पर निशिकांत दुबे कहते है कि UGC नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियों को दूर किया जाएगा। संविधान को आर्टिकलों 14 एवं 15 के अनुसार अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति,पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग में कोई फर्क नहीं है। 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी के कारण मिला।1990 मंडल कमीशन लागू होने के बाद इस देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने सरकार बनाई,लेकिन न्याय केवल मोदी जी ने दिया। इंतज़ार कीजिए UGC की भ्रांतियां भी ख़त्म होगी।
उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष समेत कई नेताओं ने सोमवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। श्रावस्ती में भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष उदय प्रकाश तिवारी ने UGC के नए नियमों को गलत बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात का भी विरोध किय। अपने विरोध को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी शेयर किया है। वहीं मीडिया से बात करते हुए उदय प्रकाश तिवारी ने कहा कि UGC हमारे बच्चों के लिए काफी नुकसानदेह है और यह कानून के कुछ नियम हमारे बच्चों के लिए खासतौर से हित में नहीं है जिसका हम विरोध करते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री के मन की बात सुनना कोई जरूरी नहीं है।